जयपुर। करीब 15 साल पहले पुराने क्रिमिनल केस के आधार पर नौकरी से हटाए गए कर्मचारी को राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ी राहत दी है।
हाईकोर्ट ने 2011 में अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (एवीवीएनएल) की ओर से जारी सेवा समाप्ति का आदेश रद्द कर दिया और कैलाश चंद रैगर को दोबारा उसी पद पर लेने के निर्देश दिए।
जस्टिस आनंद शर्मा ने 2017 में कैलाश चंद की नौकरी बहाल करने की मांग खारिज करने वाला आदेश भी रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने माना कि कैलाश चंद को पुराने क्रिमिनल केस में प्रोबेशन का लाभ मिल चुका था और नौकरी के आवेदन फॉर्म में पुराने क्रिमिनल केस की जानकारी देने की कोई शर्त भी नहीं थी। ऐसे में इस आधार पर उनकी सेवा खत्म करना सही नहीं था।
कैलाश चंद की ओर से अधिवक्ता आर.के. गौत्तम, जी.एस. गौत्तम, आरती बाई मीणा और साक्षी मीणा ने पैरवी की। अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की ओर से अधिवक्ता प्रिया रस्तोगी ने पक्ष रखा।
पिता की मौत के बाद मिली थी अनुकंपा नियुक्ति
कैलाश चंद को उनके पिता की मौत के बाद अनुकंपा के आधार पर 25 मार्च 2011 को अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में हेल्पर ग्रेड-II/प्यून के पद पर नौकरी मिली थी।
नौकरी मिलने के बाद पुलिस वेरिफिकेशन हुआ। इसमें कैलाश चंद के पुराने क्रिमिनल केस की जानकारी सामने आई। इसके बाद निगम ने 24 नवंबर 2011 को उनकी सेवा खत्म कर दी।
कैलाश चंद ने नौकरी खत्म करने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। बाद में कोर्ट के निर्देश पर उन्होंने अपनी बात रखी, लेकिन 20 फरवरी 2017 को निगम ने उनकी मांग खारिज कर दी।
2008 के क्रिमिनल केस में क्या हुआ था?
कैलाश चंद के खिलाफ IPC की धारा 143, 341, 323 और 34 के तहत केस चला था। 3 जुलाई 2008 को क्रिमिनल कोर्ट ने धारा 147 के तहत उन्हें दोषी माना।
हालांकि, उन्हें जेल नहीं भेजा गया। कोर्ट ने प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट की धारा 3 का लाभ देते हुए चेतावनी देकर छोड़ दिया। वहीं, धारा 341 और 323 के आरोपों में उन्हें समझौते के आधार पर राहत मिली थी। यही बात बाद में हाईकोर्ट के फैसले में महत्वपूर्ण बनी।
‘आवेदन फॉर्म में पुराना केस बताने का कॉलम ही नहीं था’
मामले में कैलाश चंद की ओर से एक और अहम बात कही गई। उन्होंने बताया कि जिस आवेदन फॉर्म के आधार पर उन्हें नौकरी मिली थी, उसमें पुराने क्रिमिनल केस या आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी देने का कोई कॉलम नहीं था।
ऐसे में बाद में यह आरोप लगाकर सेवा समाप्त करना कि कर्मचारी ने अपने आपराधिक मामले की जानकारी छिपाई, उचित नहीं था।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि नौकरी के आवेदन फॉर्म में पुराने क्रिमिनल केस की जानकारी देने के लिए कोई कॉलम या शर्त नहीं थी। जब कर्मचारी से यह जानकारी मांगी ही नहीं गई थी, तो यह कहना सही नहीं होगा कि उसने जानबूझकर जानकारी छिपाई।
2011 में यह आरोप नहीं था, 2017 में जोड़ दिया
हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि 2011 में कैलाश चंद की नौकरी खत्म करते समय उन्हें यह कहकर नहीं हटाया गया था कि उन्होंने अपने पुराने क्रिमिनल केस की जानकारी छिपाई है। लेकिन 2017 में उनकी नौकरी बहाल करने की मांग खारिज करते समय अधिकारियों ने जानकारी छिपाने की बात भी जोड़ दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि नौकरी खत्म करते समय जो वजह बताई ही नहीं गई थी, उसे बाद में जोड़कर पुराने फैसले को सही नहीं ठहराया जा सकता।
‘प्रोबेशन का लाभ मिला तो दोषसिद्धि से अयोग्यता नहीं‘
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट की धारा 12 का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि कैलाश चंद को पुराने क्रिमिनल केस में धारा 3 के तहत प्रोबेशन का लाभ मिल चुका था। ऐसे मामले में उस दोषसिद्धि के आधार पर व्यक्ति को नौकरी के लिए अयोग्य नहीं माना जा सकता।
कैलाश चंद को पुराने केस में दोषी ठहराया गया था, लेकिन उन्हें प्रोबेशन का लाभ देकर रिहा किया गया था। ऐसे में हाईकोर्ट ने माना कि सिर्फ उस पुराने केस में हुई दोषसिद्धि को आधार बनाकर उनकी नौकरी खत्म करना सही नहीं था।
‘पुराना क्रिमिनल केस देखते समय सिर्फ दोषसिद्धि नहीं देखी जाएगी‘
हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पवन कुमार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और उमेश चंद्र यादव बनाम इंस्पेक्टर जनरल एवं चीफ सिक्योरिटी कमिश्नर, आरपीएफ के फैसलों का भी हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी के पुराने क्रिमिनल केस को देखते समय सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि उसे कभी दोषी ठहराया गया था। यह भी देखना जरूरी है कि मामला कितना गंभीर था, कर्मचारी किस पद पर है और उसकी जिम्मेदारियां क्या हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में कैलाश चंद को प्रोबेशन का लाभ मिल चुका था। इसलिए पुराने केस की दोषसिद्धि को उनकी नौकरी खत्म करने का आधार बनाना सही नहीं था।
15 साल बाद फिर नौकरी पर लौटेंगे कैलाश चंद
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कैलाश चंद की याचिका स्वीकार करते हुए 24 नवंबर 2011 का सेवा समाप्ति आदेश और 20 फरवरी 2017 का उनकी मांग खारिज करने वाला आदेश रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड को कैलाश चंद को उसी पद और उन्हीं शर्तों पर दोबारा सेवा में लेने के निर्देश दिए हैं। उनकी सेवा में निरंतरता भी बनी रहेगी।
बीच की अवधि के लिए उन्हें वेतन निर्धारण और वरिष्ठता जैसे नॉशनल लाभ मिलेंगे। हालांकि, इस अवधि का वास्तविक वेतन या कोई अन्य आर्थिक लाभ नहीं मिलेगा। कोर्ट ने आदेश की प्रमाणित कॉपी मिलने के 60 दिन के भीतर इसकी पालना करने के निर्देश दिए हैं।