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राजस्थान हाईकोर्ट में आज खास सुनवाई: महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर लार्जर बेंच करेगी सुनवाई, मुख्य न्यायाधीश सहित 3 जजों की बेंच तय करेगी रिट याचिकाओं के वर्गीकरण का विवाद

Rajasthan High Court Constitutes Larger Bench to Decide Crucial Questions on Classification of Criminal Writ Petitions

जयपुर/जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक मामलों से जुड़े संवैधानिक रिट याचिकाओं के पंजीकरण और वर्गीकरण को लेकर उठे महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर आज विशेष सुनवाई होगी.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के अग्रवाल की अध्यक्षता वाली तीन जजो की विशेष लार्जर बेंच इस मामले पर सुनवाई कर विचार करेगी कि आपराधिक प्रकृति से जुड़े मामलों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिकाओं को सिविल रिट याचिका के रूप में पंजीकृत किया जा सकता है या उन्हें आपराधिक रिट याचिका के रूप में ही दर्ज किया जाना आवश्यक है।

हाईकोर्ट में आज की डेली काउज लिस्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली लार्जर बेंच शाम 4 बजे इस मामले में सुनवाई करेगी।

इस बेंच मुख्य न्यायाधीश के साथ जस्टिस समीर जैन और जस्टिस अनुरूप सिंघी शामिल हैं।

यह मामला सिविल रिट याचिका संख्या 16049/2026, रवि कुमार बनाम राजस्थान राज्य से संबंधित सिविल रेफरेंस संख्या 2/2026 में उठे कानूनी प्रश्नों से जुड़ा है।

क्या है पूरा मामला?

रवि कुमार बनाम राजस्थान राज्य मामले में उठे प्रश्नों को वृहद पीठ के समक्ष संदर्भित किया गया है।

इन प्रश्नों का संबंध राजस्थान हाईकोर्ट नियम, 1952 के नियम 315(1)(h) की व्याख्या और आपराधिक प्रकृति के मामलों में रिट याचिकाओं के पंजीकरण से है।

मामले में यह विचार किया जाना है कि यदि किसी आपराधिक मामले से संबंधित विवाद में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर की जाती है, तो क्या उसका रजिस्ट्रेशन सिविल रिट याचिका के रूप में किया जा सकता है या उसे आपराधिक रिट याचिका के रूप में ही दर्ज किया जाना चाहिए।

लार्जर बेंच के सामने होंगे ये पांच अहम सवाल

लार्जर बेंच को मुख्य रूप से पांच कानूनी प्रश्नों पर विचार करना है।

  1. आपराधिक मामले से जुड़ी रिट याचिका का पंजीकरण:

क्या किसी आपराधिक मामले से संबंधित विवाद में अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका को सिविल रिट याचिका के रूप में पंजीकृत करना आवश्यक है या उसे आपराधिक रिट याचिका के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए?

साथ ही, क्या ऐसी याचिका को सिविल रिट याचिका मानने से पहले उसके पंजीकरण, वर्गीकरण और उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया का पालन आवश्यक है?

  1. याचिका का नाम या उसका वास्तविक स्वरूप:

क्या किसी याचिका को ‘क्रिमिनल रिट पिटिशन’ या ‘सिविल रिट पिटिशन’ नाम देना केवल रजिस्ट्री का प्रशासनिक वर्गीकरण है, या इससे मामले की वास्तविक कानूनी प्रकृति और सुनवाई की प्रक्रिया भी निर्धारित होती है?

  1. हाईकोर्ट नियमों की प्रभावशीलता:

क्या राजस्थान हाईकोर्ट नियम, 1952 के नियम 315(1)(h) को किसी न्यायिक निर्देश के माध्यम से अप्रभावी या अनुपयोगी बनाया जा सकता है, जबकि उस नियम को असंवैधानिक घोषित करने का स्पष्ट निर्णय न दिया गया हो?

  1. पूर्व खंडपीठ के आदेश का प्रभाव:

क्या 7 जुलाई 2026 को जिया एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य मामले में पारित खंडपीठ के आदेश को, जिसमें आपराधिक रिट याचिकाओं के पंजीकरण से संबंधित निर्देश दिए गए थे, नियम 315(1)(h) के अनुरूप माना जा सकता है?

  1. विरोधाभासी निर्णय की स्थिति में प्रक्रिया:

यदि नियम 315(1)(h) और पूर्व खंडपीठ के आदेश के बीच ऐसा विरोधाभास सामने आता है, जिसे साथ-साथ लागू करना संभव नहीं है, तो क्या इस स्थिति में मामले को लार्जर बेंच के समक्ष भेजना आवश्यक है, ताकि कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सके?

बार के सदस्यों से भी मांगे गए लिखित सुझाव

राजस्थान हाईकोर्ट की ओर से इस मामले में सलाह के लिए बार के अधिवक्ताओं से भी सुझाव मांगे गये हैं.

हाईकोर्ट ने अनुरोध किया हैं कि बार के जो सदस्य इन कानूनी प्रश्नों पर अदालत की सहायता करना चाहते हैं, वे संबंधित न्यायिक फैसलों और कानूनी आधारों के साथ अपने लिखित तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं।

इससे मामले में दोनों पक्षों की कानूनी स्थिति के साथ-साथ बार के सदस्यों के विचारों पर भी न्यायालय को विचार करने का अवसर मिलेगा।

क्यों महत्वपूर्ण है यह सुनवाई?

इस मामले में वृहद पीठ का निर्णय राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक मामलों से संबंधित संवैधानिक रिट याचिकाओं के पंजीकरण, वर्गीकरण और सूचीबद्धता की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

इससे यह स्पष्ट होने की संभावना है कि ऐसी याचिकाओं को किस श्रेणी में दर्ज किया जाए और संबंधित नियमों तथा पूर्व न्यायिक आदेशों के बीच सामंजस्य किस प्रकार स्थापित किया जाए।

हालांकि, इन प्रश्नों पर अंतिम कानूनी स्थिति लार्जर बेंच के फैसले के बाद ही स्पष्ट होगी।

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