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32 साल पुराने सड़क हादसे के केस में राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सरकार की अपील खारिज, आरोपी की बरी होने की राहत बरकरार; कहा-‘सिर्फ गाड़ी चलाना लापरवाही का सबूत नहीं’

Driving the Vehicle Alone Does Not Prove Negligence: Rajasthan High Court Upholds Acquittal in 1994 Accident Case

जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने करीब 32 साल पुराने सड़क हादसे के मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए आरोपी को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल गाड़ी चलाने की बात स्वीकार कर लेने से यह साबित नहीं होता कि चालक ने वाहन लापरवाही से चलाया था।

जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 279, 337 और 304-A के तहत दोष साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को लापरवाही से वाहन चलाने और उससे जुड़े अपराध के जरूरी तत्वों को संदेह से परे साबित करना होगा।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सरकार की अपील खारिज कर दी और आरोपी को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया।

राज्य सरकार की ओर से पब्लिक प्रॉसिक्यूटर एस.एस. राठौड़ ने पैरवी करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। वहीं, आरोपी की ओर से अधिवक्ता हर्षवर्धन सिंह ने पक्ष रखा।

1994 में जीप की टक्कर से घायल हुआ था व्यक्ति

सरकार की ओर से पेश वकील ने बताया कि 16 अगस्त 1994 को शाम करीब 4:30 बजे आरोपी समर्थाराम जीप नंबर RRT 4864 चला रहा था।

आरोप था कि उसने जीप लापरवाही से चलाई और अजी नाम के व्यक्ति को टक्कर मार दी। टक्कर के बाद वह नीचे गिर गया और जीप के बंपर में फंस गया, जिससे उसे चोटें आईं। इसके बाद दिनेश कुमार और शिवनाथ सिंह घायल को कालंद्री अस्पताल ले गए।

मामले की जांच के बाद आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 279, 337 और 304-A के तहत मामला दर्ज किया गया। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी ने लापरवाही से वाहन चलाया जिसके चलते हादसा हुआ था।

ट्रायल कोर्ट ने तीन धाराओं में किया था बरी

सिरोही के सिविल जज (जूनियर डिवीजन) एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने 29 अगस्त 1997 को फैसला सुनाया था।

ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के बयानों और सबूतों को देखने के बाद पाया कि आरोपी ने जीप किस तरह चलाई थी, इसे साबित करने के लिए पर्याप्त सबूल नहीं हैं। गवाहों के घटनास्थल से दूरी और वहां उनकी स्थिति को लेकर बयानों में अंतर भी सामने आया।

कोर्ट ने माना कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी ने जीप लापरवाही से चलाई थी। इस आधार पर कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 279, 337 और 304-A के आरोपों से बरी कर दिया।

हालांकि, आरोपी ने स्वीकार किया था कि घटना के समय वह जीप चला रहा था और उसके पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था। इसलिए कोर्ट ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 3/181 के तहत उसे दोषी ठहराते हुए 300 रुपये जुर्माना लगाया था।

राजस्थान सरकार ने फैसले को हाईकोर्ट में दी चुनौती

ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ राजस्थान सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। सरकारी पक्ष ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन के गवाहों के बयानों का सही आकलन नहीं किया।

गवाहों की स्थिति और घटनास्थल से उनकी दूरी को लेकर सामने आए अंतर को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया।

सरकार का कहना था कि आरोपी ने खुद जीप चलाने की बात स्वीकार की थी। ऐसे में गवाहों की गवाही और अन्य सबूतों को देखते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए।

सिर्फ जीप चलाने से लापरवाही साबित नहीं होती- हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और गवाहों के बयान देखने के बाद कहा कि मामले में सवाल सिर्फ यह नहीं था कि घटना के समय जीप कौन चला रहा था।

अभियोजन को यह भी साबित करना था कि वाहन लापरवाही से चलाया जा रहा था और उसी से संबंधित अपराध के जरूरी तत्व पूरे होते हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी का जीप चलाना स्वीकार करना और उसके पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं होना, अपने आप में लापरवाही से वाहन चलाने का सबूत नहीं है।

IPC की धारा 279, 337 और 304-A के तहत अपराध साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को आरोपों से जुड़े जरूरी तत्वों को संदेह से परे साबित करना होता है।

जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू ने गवाहों हिमाराम, शांतिलाल और शिवनाथ सिंह के बयानों पर गौर किया। कोर्ट ने पाया कि इन बयानों से यह स्पष्ट रूप से साबित नहीं होता कि आरोपी ने वाहन इस तरह चलाया था, जिससे मानव जीवन या दूसरों की सुरक्षा को खतरा पैदा हुआ।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यह साबित होना कि आरोपी घटना के समय वाहन चला रहा था, लापरवाही के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

‘बरी करने के फैसले को पलटने के लिए ठोस आधार जरूरी’

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘बाबू साहेबगौड़ा रुद्रगौड़र बनाम कर्नाटक राज्य‘ का हवाला देते हुए कहा कि बरी किए जाने के बाद आरोपी के निर्दोष होने की धारणा और मजबूत हो जाती है।

अपीलीय अदालत सबूतों का दोबारा आकलन कर सकती है, लेकिन अगर ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संभव है, तो सिर्फ इसलिए उसमें दखल नहीं दिया जा सकता कि कोई दूसरा निष्कर्ष भी निकाला जा सकता था।

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए ठोस वजह होनी चाहिए। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि निचली अदालत ने किसी अहम सबूत को नजरअंदाज किया या फैसला सुनाने में गंभीर कानूनी गलती की।

हाईकोर्ट ने सरकार की अपील खारिज की

हाईकोर्ट को ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला, जिससे साबित हो कि ट्रायल कोर्ट ने किसी अहम सबूत को नजरअंदाज किया या फैसला सुनाने में गंभीर कानूनी गलती की। कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सबूतों के आधार पर ट्रायल कोर्ट का फैसला सही था।

इसलिए हाईकोर्ट ने राजस्थान सरकार की अपील खारिज करते हुए आरोपी को IPC की धारा 279, 337 और 304-A के आरोपों से बरी करने का 1997 का फैसला बरकरार रखा।

वहीं, वैध ड्राइविंग लाइसेंस के बिना वाहन चलाने के मामले में लगाया गया 300 रुपये का जुर्माना भी बरकरार रहा।

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