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नियुक्ति पत्र में मुंबई कोर्ट का क्षेत्राधिकार तय होने पर भी राजस्थान ट्रिब्यूनल सुन सकेगा कर्मचारी का मामला-राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Big Ruling: Mumbai Jurisdiction Clause Cannot Bar Employee’s Statutory Remedy in Rajasthan
वेदांता फाउंडेशन और रींगस के वेदांता पीजी गर्ल्स कॉलेज की प्रबंधन समितियों को झटका; हाईकोर्ट ने कहा-अनुबंध की शर्त से नहीं छीने जा सकते कर्मचारी के वैधानिक अधिकार

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने कर्मचारी और शैक्षणिक संस्थान के बीच सेवा विवादों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि नियुक्ति पत्र में मुंबई की अदालतों का अधिकार क्षेत्र निर्धारित करने वाली शर्त के आधार पर राजस्थान गैर-सरकारी शैक्षणिक संस्था अधिनियम, 1989 के तहत गठित ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को समाप्त नहीं किया जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कि कोई भी संविदात्मक शर्त कानून के तहत कर्मचारी को प्राप्त अधिकारों और वैधानिक उपचारों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने वेदांता फाउंडेशन की प्रबंधन समिति और रींगस, सीकर स्थित वेदांता पीजी गर्ल्स कॉलेज की प्रबंधन समिति की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए यह फैसला दिया हैं.

इसके साथ ही खंडपीठ ने एकलपीठ के 1 सितंबर 2026 के फैसले को बरकरार रखा।

यह विवाद नियुक्ति पत्र में शामिल क्षेत्राधिकार संबंधी शर्त और राजस्थान के कानून के तहत कर्मचारी को उपलब्ध वैधानिक उपायों के बीच टकराव से जुड़ा था।

क्या हैं पूरा मामला?

मामले में अपीलकर्ता वेदांता फाउंडेशन की प्रबंधन समिति और वेदांता पीजी गर्ल्स कॉलेज, रींगस की प्रबंधन समिति थीं।

कॉलेज में कार्यरत डॉ. शुभा शर्मा ने अपने नियुक्ति पत्र में उस क्लॉज को चुनौति दी जिसके तहत किसी भी विवाद के होने पर मुंबई न्यायालय क्षेत्राधिकार में विवाद सुलझाने की बात कही गयी.

डॉ शुभा शर्मा ने कानूनी बिंदू उठाया कि क्या नियुक्ति पत्र में मुंबई की अदालतों का क्षेत्राधिकार तय कर देने मात्र से राजस्थान गैर-सरकारी शैक्षणिक संस्था अधिनियम, 1989 के तहत गठित ट्रिब्यूनल का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो सकता है?

इस मामले में ट्रिब्यूनल ने 8 जून 2026 को आदेश पारित करते हुए राजस्थान गैर-सरकारी शैक्षणिक संस्था अधिनियम, 1989 के तहत गठित ट्रिब्यूनल का अधिकार क्षेत्र माना था.

इसके बाद हाईकोर्ट एकलपीठ ने 1 सितंबर 2026 को निर्णय दिया। एकलपीठ के फैसले को चुनौती देते हुए प्रबंधन समितियों ने खंडपीठ के समक्ष विशेष अपील दायर की।

अपीलकर्ताओं का मुख्य कानूनी आधार नियुक्ति पत्र में मुंबई की अदालतों के क्षेत्राधिकार से संबंधित शर्त थी। वहीं, विवाद के केंद्र में यह प्रश्न था कि क्या ऐसी संविदात्मक शर्त के जरिए अधिनियम के तहत उपलब्ध वैधानिक मंच और कर्मचारी के अधिकारों को सीमित किया जा सकता है।

अपीलकर्ताओं का पक्ष: नियुक्ति पत्र में मुंबई के न्यायालयों का क्षेत्राधिकार

वेदांता फाउंडेशन और कॉलेज की प्रबंधन समितियों की ओर से अधिवक्ता नमन पारीक ने पैरवी की।

अपीलकर्ताओं ने नियुक्ति पत्र में शामिल मुंबई की अदालत के क्षेत्राधिकार संबंधी प्रावधान के आधार पर विवाद उठाया और ट्रिब्यूनल के 8 जून 2026 के आदेश को बहाल किए जाने के संबंध में एकलपीठ के फैसले को चुनौती दी।

अपील में मूल विवाद यह था कि नियुक्ति पत्र में तय क्षेत्राधिकार की शर्त का क्या कानूनी प्रभाव होगा और क्या उसके आधार पर राजस्थान गैर-सरकारी शैक्षणिक संस्था अधिनियम, 1989 के तहत गठित ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति की जा सकती है।

अनुबंध कानून से ऊपर नहीं हो सकता

प्रतिवादी डॉ. शुभा शर्मा और राजस्थान सरकार के कॉलेज शिक्षा आयुक्त की ओर से अधिवक्ता अश्विनी कुमार जैमन के साथ अधिवक्ता केशव पाराशर और अधिवक्ता मोइन खान ने पैरवी की।

सरकार और मामले में प्रतिवादी का समर्थन उस कानूनी स्थिति से जुड़ा था, जिसके अनुसार नियुक्ति पत्र में शामिल कोई शर्त कर्मचारी को अधिनियम के तहत प्राप्त वैधानिक अधिकारों और उपचारों से वंचित नहीं कर सकती।

खंडपीठ ने भी इसी कानूनी प्रश्न पर विचार करते हुए माना कि किसी अनुबंध में मुंबई की अदालतों का क्षेत्राधिकार निर्धारित कर देने से राजस्थान के कानून के तहत उपलब्ध वैधानिक उपाय स्वतः समाप्त नहीं हो जाते।

संविदात्मक शर्त वैधानिक अधिकार खत्म नहीं कर सकती

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एकलपीठ ने अधिनियम की वैधानिक व्यवस्था के संदर्भ में पूरे विवाद की जांच की थी और अपने निष्कर्षों के लिए उचित कारण दिए थे।

खंडपीठ ने कहा कि एकलपीठ फैसले में कोई ऐसी त्रुटि नहीं मिली, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाना आवश्यक हो।

हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि नियुक्ति पत्र में मुंबई के न्यायालयों का क्षेत्राधिकार निर्धारित करने वाली शर्त राजस्थान गैर-सरकारी शैक्षणिक संस्था अधिनियम, 1989 के तहत गठित ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को समाप्त कर सकती है या नहीं।

इस पर खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि संविदात्मक प्रावधान को अधिनियम के तहत उपलब्ध वैधानिक उपचार को निष्प्रभावी करने या कानून द्वारा ट्रिब्यूनल को प्राप्त अधिकार क्षेत्र छीनने के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अधिनियम की संबंधित धाराओं को एक साथ पढ़ना आवश्यक है, ताकि कर्मचारियों को कानून के तहत उपलब्ध उपचारों को प्रभावी बनाया जा सके।

धारा 19, 20 और 21 का महत्व

हाईकोर्ट ने राजस्थान गैर-सरकारी शैक्षणिक संस्था अधिनियम, 1989 की तीन महत्वपूर्ण धाराओं का उल्लेख किया।

धारा 19—अपील का प्रावधान: अधिनियम में आदेशों के विरुद्ध अपील की व्यवस्था की गई है।

धारा 20—कर्मचारी के अधिकारों की सुरक्षा: किसी मान्यता प्राप्त संस्था और कर्मचारी के बीच ऐसा अनुबंध, जहां तक वह अधिनियम के तहत कर्मचारी को प्राप्त अधिकारों को छीनता है, उस सीमा तक शून्य और अमान्य होगा।

धारा 21—सेवा विवादों का समाधान: यह धारा सेवा शर्तों से संबंधित विवादों के निस्तारण के लिए वैधानिक व्यवस्था को दर्शाती है।

खंडपीठ ने इन प्रावधानों को एक साथ पढ़ते हुए कहा कि कानून के तहत कर्मचारी को उपलब्ध अधिकारों और शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था को केवल अनुबंध की शर्त के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

अदालत ने धारा 20 को विशेष महत्व देते हुए कहा कि यदि अनुबंध की कोई शर्त अधिनियम के तहत प्राप्त अधिकारों को छीनती है, तो उस सीमा तक वह अमान्य होगी।

सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का हवाला

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण फैसलों का भी हवाला दिया।

  1. महाराष्ट्र चेस एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया

Maharashtra Chess Association v. Union of India, (2020) 13 SCC 285 में सुप्रीम कोर्ट ने किसी विशेष स्थान की अदालतों को विशिष्ट क्षेत्राधिकार देने वाली संविदात्मक शर्त और कानून द्वारा प्रदत्त अधिकार क्षेत्र के बीच संबंध पर विचार किया था।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस फैसले के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि अनुबंध में मौजूद क्षेत्राधिकार संबंधी शर्त अपने आप में कानून द्वारा प्रदत्त अधिकार क्षेत्र के इस्तेमाल पर पूर्ण रोक नहीं बन सकती।

उसका प्रभाव संबंधित वैधानिक और संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में तय किया जाना चाहिए।

  1. ए.वी.एम. सेल्स कॉरपोरेशन बनाम अनुराधा केमिकल्स

A.V.M. Sales Corporation v. Anuradha Chemicals (P) Ltd., (2012) 2 SCC 315 में सुप्रीम कोर्ट ने यह सिद्धांत दोहराया था कि पक्षकार आपसी समझौते से ऐसे मंच को अधिकार क्षेत्र नहीं दे सकते, जिसके पास कानूनन वह अधिकार क्षेत्र नहीं है।

हालांकि, जहां एक से अधिक न्यायालयों के पास पहले से ही विवाद सुनने का अधिकार हो, वहां उपयुक्त परिस्थितियों में किसी एक सक्षम न्यायालय का चयन किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने इन सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए कहा कि अनुबंध की शर्तों को कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही प्रभावी माना जा सकता है।

ट्रिब्यूनल का अधिकार क्षेत्र समाप्त करने का आधार नहीं

खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि नियुक्ति पत्र में मुंबई की अदालतों के अधिकार क्षेत्र का उल्लेख मात्र इस आधार पर राजस्थान के ट्रिब्यूनल को कानून के तहत प्राप्त अधिकार क्षेत्र से वंचित नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं की ओर से ऐसी कोई कानूनी त्रुटि या अन्य आधार प्रदर्शित नहीं किया गया, जिसके कारण एकलपीठ के फैसले में अपीलीय स्तर पर हस्तक्षेप किया जाना आवश्यक हो।

खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अपीलकर्ताओं की आपत्ति ट्रिब्यूनल के 8 जून 2026 के आदेश को बहाल करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार प्रदान नहीं करती।

विशेष अपील खारिज, एकलपीठ का फैसला बरकरार

सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने वेदांता फाउंडेशन और वेदांता पीजी गर्ल्स कॉलेज की प्रबंधन समितियों की विशेष अपील खारिज कर दी।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इसके साथ 1 सितंबर 2026 के एकलपीठ के फैसले पर मुहर लगा दी हैं.

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