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पति के कर्ज की गारंटी में दिया चेक बाउंस हुआ तो पत्नी के खिलाफ भी चलेगा मुकदमा? राजस्थान हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

Rajasthan High Court: Guarantor Wife Cannot Seek Quashing of Cheque Bounce Case Merely on Security Cheque Ground
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी-सिर्फ गारंटर होने या चेक को सिक्योरिटी बताने से नहीं मिलेगी राहत; ₹2.10 लाख के कर्ज से जुड़े मामले में ट्रायल कोर्ट ही तय करेगा कानूनी देनदारी

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने चेक बाउंस के एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला ने अपने पति के कर्ज की गारंटी के लिए अपने बैंक खाते से चेक जारी किया है, तो केवल गारंटर होने या चेक को सिक्योरिटी चेक बताने के आधार पर उसके खिलाफ नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह देखना आवश्यक है कि संबंधित चेक के पीछे उस समय कोई कानूनी रूप से वसूली योग्य ऋण या अन्य देनदारी मौजूद थी या नहीं। इस प्रश्न का निर्णय सबूतों के आधार पर ट्रायल कोर्ट करेगा।

जस्टिस सुनील बेनीवाल की एकलपीठ ने मंगलेश कंवर की ओर से दायर आपराधिक विविध याचिका खारिज करते हुए यह फैसला दिया है।

याचिका में ट्रायल कोर्ट के 14 मार्च 2018 के आदेश को निरस्त करने और चेक बाउंस मामले में राहत देने की मांग की गई थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में आपराधिक कार्यवाही निरस्त करने का पर्याप्त आधार नहीं है। हालांकि, याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट के समक्ष कानून के तहत उपलब्ध सभी दलीलें उठाने की स्वतंत्रता दी गई है।

क्या है पूरा मामला?

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता मंगलेश कंवर के पति धीरज सिंह चौहान ने शिकायतकर्ता रॉयल फाइनेंस के प्रोपराइटर जयदत्त शर्मा से 13 अप्रैल 2015 को ₹1 लाख और 8 अगस्त 2015 को ₹1.10 लाख उधार लिए थे। इस प्रकार कुल कर्ज ₹2.10 लाख था। ऋण पर 2.25 प्रतिशत प्रतिमाह ब्याज निर्धारित था।

याचिका के अनुसार, पति के कर्ज की अदायगी की गारंटी मंगलेश कंवर ने दी थी। इस लेनदेन के संबंध में पति ने ₹2.10 लाख का चेक जारी किया, जबकि मंगलेश कंवर ने भी समान राशि का चेक सिक्योरिटी के तौर पर दिया।

दोनों चेक बैंक में प्रस्तुत किए गए, लेकिन खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण वे अनादरित हो गए। इसके बाद शिकायतकर्ता ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत पति और पत्नी दोनों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

ट्रायल कोर्ट ने 3 अगस्त 2016 को मामले में संज्ञान लिया। 14 मार्च 2018 को मंगलेश कंवर और उनके पति को आरोप की मूल प्रकृति बताई गई। दोनों ने आरोप स्वीकार नहीं किए और मुकदमे का सामना करने का विकल्प चुना।

वैवाहिक विवाद के कारण मायके में रहने लगीं, फिर जारी हुआ स्थायी वारंट

याचिका के अनुसार, वैवाहिक विवाद के कारण मंगलेश कंवर अपने मायके में रहने लगी थीं।

उन्हें ट्रायल कोर्ट में होने वाली सुनवाइयों की जानकारी नहीं थी, जिसके चलते वह अदालत में उपस्थित नहीं हुईं।

इसके बाद 19 जुलाई 2019 को ट्रायल कोर्ट ने उन्हें फरार घोषित कर दिया और उनके खिलाफ स्थायी वारंट जारी किया।

दूसरी ओर, उनके पति के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई जारी रही।

ट्रायल कोर्ट ने 2 दिसंबर 2019 को धीरज सिंह चौहान को दोषी ठहराते हुए छह महीने के साधारण कारावास और ₹2.65 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई।

जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में दो महीने के अतिरिक्त साधारण कारावास का भी आदेश दिया गया। आदेश के अनुसार, पति अपनी सजा भुगत चुके हैं।

स्थायी वारंट की जानकारी मिलने के बाद मंगलेश कंवर ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण किया और जमानत प्राप्त की।

इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपने खिलाफ चल रही कार्यवाही को चुनौती दी।

पति ने लिया था कर्ज, पत्नी ने केवल गारंटी दी

याचिकाकर्ता पत्नी की ओर से अधिवक्ता श्रेयांश रामदेव ने दलील दी कि ऋण उनके पति ने अपने कारोबार के लिए लिया था और मंगलेश कंवर की भूमिका केवल गारंटर की थी।

एक ही ₹2.10 लाख की देनदारी के लिए पति और पत्नी से अलग-अलग चेक लिए गए थे।

सिक्योरिटी चेक का तर्क: अधिवक्ता ने कहा कि पत्नी का चेक केवल गारंटी या सुरक्षा के उद्देश्य से दिया गया था, इसलिए उसके आधार पर धारा 138 के तहत आपराधिक कार्यवाही नहीं चलनी चाहिए।

एक ही देनदारी के लिए दो चेक: दोनों चेक एक ही ऋण से संबंधित थे। शिकायतकर्ता ने दोनों चेक प्रस्तुत किए और पति-पत्नी को संयुक्त कानूनी नोटिस भेजकर संयुक्त शिकायत दर्ज की, जिसे याचिकाकर्ता ने अनुचित बताया।

कानूनी देनदारी पर सवाल: याचिकाकर्ता का कहना था कि ऋण पति ने लिया था, इसलिए पत्नी के खिलाफ कानूनी रूप से वसूली योग्य देनदारी स्थापित किए बिना धारा 139 के तहत अनुमान लागू नहीं किया जा सकता।

पति की सजा पूरी होने का तर्क: पति पहले ही सजा भुगत चुके हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, बकाया राशि की वसूली के लिए शिकायतकर्ता उचित दीवानी कार्यवाही कर सकता है।

गारंटर की आपराधिक जिम्मेदारी: अधिवक्ता ने Dilip Hariramani v. Bank of Baroda तथा Shantaram Namdeo Sathe v. State of Maharashtra के फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि केवल गारंटर होने या सिक्योरिटी चेक देने से आपराधिक जिम्मेदारी स्वतः निर्धारित नहीं हो जाती।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवाद के चलते वह मायके में रह रही थीं और सुनवाई की जानकारी नहीं होने के कारण अदालत में उपस्थित नहीं हो सकीं।

इन परिस्थितियों और कानूनी आधारों पर उन्होंने अपने खिलाफ कार्यवाही निरस्त करने तथा दोषमुक्ति की राहत मांगी।

शिकायतकर्ता का पक्ष: अपने खाते से जारी चेक के लिए जवाबदेही तय होगी

शिकायतकर्ता रॉयल फाइनेंस की ओर से अधिवक्ता विकास हेडाऊ ने पक्ष रखा, जबकि राज्य की ओर से लोक अभियोजक श्रीराम चौधरी ने पैरवी की।

शिकायतकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मंगलेश कंवर ने स्वयं अपने बैंक खाते से चेक जारी किया था और उस पर हस्ताक्षर थे।

ऐसे में केवल यह कहना कि चेक पति के ऋण की गारंटी के लिए दिया गया था, धारा 138 के तहत कार्यवाही समाप्त करने का पर्याप्त आधार नहीं है।

प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को तलब किया था और आरोप की प्रकृति बताकर सुनवाई शुरू की थी।

मंगलेश कंवर की अनुपस्थिति के कारण उनके जमानत मुचलके जब्त हुए और उनके खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 82 के तहत कार्रवाई की गई।

शिकायतकर्ता के अनुसार, बाद में मंगलेश कंवर अदालत में उपस्थित हुईं।

उनकी ओर से शिकायतकर्ता से जिरह की गई और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत उनका बयान भी दर्ज हुआ।

शिकायतकर्ता की अंतिम बहस पूरी हो चुकी थी और मामला आरोपी पक्ष की अंतिम बहस तथा निर्णय के लिए लंबित था।

प्रतिवादी पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि 14 मार्च 2018 के आदेश को लगभग पांच वर्ष की देरी से चुनौती दी गई।

चेक बाउंस के मामलों में समन प्रकरण की प्रक्रिया लागू होती है, जिसमें औपचारिक आरोप तय करने के बजाय आरोपी को आरोप की मूल प्रकृति बताई जाती है और उससे पूछा जाता है कि वह दोष स्वीकार करता है या मुकदमे का सामना करना चाहता है।

शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के ICDS Ltd. v. Beemna Shabeer फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 138 में प्रयुक्त “किसी ऋण या अन्य देनदारी” की भाषा व्यापक है और गारंटर द्वारा जारी चेक को केवल गारंटी होने के आधार पर इस प्रावधान से बाहर नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट का फैसला: गारंटर होना अपने आप में राहत का आधार नहीं

जस्टिस सुनील बेनीवाल ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि इस मामले में दो प्रमुख प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है।

पहला, क्या पति के ऋण की गारंटी के तौर पर पत्नी द्वारा जारी चेक के आधार पर धारा 138 की कार्यवाही निरस्त की जा सकती है?

दूसरा, क्या उसी लेनदेन के संबंध में पति द्वारा सजा भुगत लेने से पत्नी के खिलाफ कार्यवाही समाप्त करने का आधार बनता है?

अदालत ने कहा कि धारा 138 के तहत चलने वाले मामलों में समन प्रकरण की प्रक्रिया लागू होती है।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 251 के तहत आरोपी को आरोप की मूल प्रकृति बताई जाती है और उससे पूछा जाता है कि वह दोष स्वीकार करता है या अपना बचाव प्रस्तुत करना चाहता है। वर्तमान मामले में 14 मार्च 2018 को यही प्रक्रिया अपनाई गई थी।

इसलिए, केवल इस आधार पर कि ट्रायल कोर्ट ने आरोप की मूल प्रकृति बताकर सुनवाई शुरू की, कोई प्रक्रियागत अवैधता नहीं मानी जा सकती। इस आदेश को चुनौती देने का आधार भी स्वीकार नहीं किया गया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला: गारंटर का चेक भी धारा 138 के दायरे में आ सकता है

हाईकोर्ट ने ICDS Ltd. v. Beemna Shabeer & Anr., AIR 2002 SC 3014 के फैसले का हवाला दिया।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि गारंटर द्वारा जारी चेक को केवल इस कारण धारा 138 के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता कि मूल लेनदेन किसी अन्य व्यक्ति ने किया था।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मंगलेश कंवर का गारंटर होना अपने आप में कार्यवाही निरस्त करने का आधार नहीं है, विशेषकर तब जब आरोप है कि चेक उनके अपने बैंक खाते से जारी हुआ और उस पर उनके हस्ताक्षर हैं।

अदालत ने Dilip Hariramani v. Bank of Baroda के फैसले को भी अलग परिस्थितियों वाला माना।

उस मामले में फर्म द्वारा जारी चेक के संबंध में प्रतिनिधिक आपराधिक जिम्मेदारी और धारा 141 की आवश्यकताओं का प्रश्न था।

वर्तमान मामले में आरोपित चेक स्वयं याचिकाकर्ता के बैंक खाते से जारी किया गया बताया गया है। इसलिए दोनों मामलों की परिस्थितियां समान नहीं हैं।

सिक्योरिटी चेक होने का दावा भी अपने आप पर्याप्त नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी चेक को सिक्योरिटी चेक कह देने मात्र से यह तय नहीं हो जाता कि उस पर धारा 138 लागू नहीं होगी।

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि संबंधित समय पर चेक किसी कानूनी रूप से वसूली योग्य ऋण या अन्य देनदारी का प्रतिनिधित्व करता था या नहीं।

इसका निर्धारण लेनदेन की शर्तों और मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

अदालत ने पाया कि शिकायत के अनुसार, पति का चेक 14 जून 2016 को अनादरित हुआ था और पत्नी का चेक 15 जून 2016 को पेश किया गया।

इसलिए, दोनों चेक एक ही लेनदेन से जुड़े होने के आधार पर यह कहना पर्याप्त नहीं है कि पत्नी का चेक समय से पहले प्रस्तुत किया गया था।

हालांकि, चेक प्रस्तुत करने का क्रम अपने आप में यह अंतिम रूप से तय नहीं करता कि पत्नी के चेक के पीछे कानूनी रूप से वसूली योग्य देनदारी थी या नहीं। यह प्रश्न ट्रायल कोर्ट साक्ष्यों के आधार पर तय करेगा।

पति की सजा पूरी होने से पत्नी के खिलाफ मुकदमा खत्म नहीं होगा

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि उनके पति पहले ही सजा भुगत चुके हैं और उनके खिलाफ कार्यवाही जारी रहने से एक ही देनदारी के लिए दोहरी वसूली की आशंका है।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि चेक अनादरित होने से उत्पन्न आपराधिक जिम्मेदारी और मूल ऋण की वसूली दो अलग प्रश्न हैं।

पति द्वारा कारावास की सजा भुगत लेने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि शिकायतकर्ता को बकाया राशि का भुगतान हो चुका है या उसकी वसूली हो गई है।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता एक ही ऋण की राशि की वसूली एक से अधिक बार नहीं कर सकता।

मूल देनदारी के संबंध में वास्तव में जो भी राशि वसूल की गई हो, उसका कानून के अनुसार हिसाब रखा जाना आवश्यक है।

लेकिन, केवल दोहरी वसूली की आशंका के आधार पर पत्नी के अपने चेक से संबंधित कार्यवाही समाप्त नहीं की जा सकती।

ट्रायल कोर्ट ही तय करेगा कि पत्नी पर कानूनी देनदारी थी या नहीं

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि मंगलेश कंवर के मामले में शिकायतकर्ता से जिरह हो चुकी थी, उनका बयान दर्ज हो चुका था और मुकदमा अंतिम बहस के चरण में पहुंच गया था।

ऐसी स्थिति में लेनदेन की प्रकृति, चेक जारी करने का उद्देश्य और कानूनी रूप से वसूली योग्य देनदारी के अस्तित्व से जुड़े विवादित प्रश्नों का निर्णय ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों के आधार पर किया जाना उचित है।

अदालत ने कहा कि अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए हाईकोर्ट सामान्यतः विवादित साक्ष्यों का मूल्यांकन कर ट्रायल के दौरान तय किए जाने वाले प्रश्नों का समय से पहले निर्णय नहीं करता।

इसलिए, केवल गारंटर होने, ऋण पति द्वारा लिए जाने और चेक को सिक्योरिटी बताने के आधार पर कार्यवाही को कानूनन अस्थिर नहीं माना जा सकता।

याचिका खारिज, लेकिन बचाव के सभी कानूनी अधिकार सुरक्षित

सभी पक्षों की बहस और दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने मंगलेश कंवर की आपराधिक विविध याचिका खारिज कर दी।

अदालत ने उनके खिलाफ चल रही धारा 138 की कार्यवाही निरस्त करने से इनकार कर दिया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ट्रायल कोर्ट के समक्ष कानून के तहत उपलब्ध सभी आधार उठा सकती हैं।

ट्रायल कोर्ट उन दलीलों पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से विचार करेगा और हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना निर्णय करेगा।

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