लंबी सेवा पर्याप्त नहीं, वैधानिक नियमों के तहत नियमितीकरण ही समयबद्ध वेतनमान और सेवा लाभ का आधार; पटवारी की याचिका खारिज
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने सेवा मामलों में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए महत्वपूर्ण फैसला दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एडहॉक (ad hoc) नियुक्ति के आधार पर कार्यरत कर्मचारी नियमित नियुक्ति से पूर्व की अवधि के लिए 9, 18 और 27 वर्ष के चयन वेतनमान (Selection Scale) तथा उससे जुड़े लाभों का दावा नहीं कर सकते।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि समयबद्ध वेतनमान और अन्य सेवा लाभ के लिए केवल लंबी सेवा अवधि पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैधानिक नियमों के अनुरूप नियमित नियुक्ति अनिवार्य है।
हाईकोर्ट ने कहा कि समयबद्ध वेतनमान और सेवा लाभ केवल नियमित नियुक्ति की तिथि से ही देय होंगे।
चयन वेतनमान जैसी योजनाएं वित्तीय दायित्व से जुड़ी होती हैं, इसलिए इनका लाभ नियमों के सख्त पालन के साथ ही दिया जा सकता है।
जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकलपीठ ने यह फैसला पटवारी इंदर सिंह सैनी की ओर से दायर याचिका पर दिया है।
क्या था मामला?
भरतपुर निवासी याचिकाकर्ता इंदर सिंह सैनी को 5 अप्रैल 1980 को पटवारी पद पर एडहॉक आधार पर नियुक्त किया गया था।
याचिकाकर्ता ने लिखित परीक्षा भी उत्तीर्ण की। बाद में उनकी सेवाएं 14 सितंबर 2004 को नियमित (Regularize) की गईं।
याचिकाकर्ता ने सरकार से आवेदन कर प्रारंभिक नियुक्ति (05.04.1980) से ही 9 और 18 वर्ष की सेवा का चयन वेतनमान लागू करने की मांग की।
साथ ही नियमित वेतनमान में वार्षिक वेतनवृद्धि (Annual Grade Increment) प्रारंभिक नियुक्ति से ही स्वीकृत करने और समस्त बकाया राशि (Arrears) सहित अन्य परिणामी लाभ देने की मांग की, जिसे विभाग द्वारा खारिज कर दिया गया।
याचिकाकर्ता की दलीलें
हाईकोर्ट में दायर याचिका में याचिकाकर्ता की ओर से दलीलें दी गईं कि नियुक्ति भले ही एडहॉक थी, लेकिन उन्होंने निर्धारित लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की थी।
अधिवक्ता ने कहा कि राजस्थान भूमि राजस्व (भू-अभिलेख) नियम, 1957 के नियम 4 के अनुसार, 15 वर्ष की सेवा पूर्ण करने वाले व्यक्तियों को पटवार परीक्षा से छूट दी जाती है।
पूर्व में पारित कुछ निर्णयों में कर्मचारियों को प्रारंभिक नियुक्ति से चयन वेतनमान का लाभ दिया गया है।
उन्होंने समर्थन में ‘गोरधन सिंह बनाम राज्य’, ‘जमालुद्दीन बनाम राज्य’ तथा ‘स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम फारूक अहमद’ जैसे निर्णयों का हवाला दिया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने 1980 से निरंतर सेवा दी है, अतः सेवा अवधि को प्रारंभिक नियुक्ति से ही गिना जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने कहा कि जब उन्होंने परीक्षा पास कर ली और वर्षों तक सेवा दी, तो केवल नियुक्ति के प्रारूप (ad hoc) के आधार पर लाभ से वंचित करना अनुचित है।
राज्य सरकार का जवाब
याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति वर्ष 1980 में केवल एडहॉक आधार पर हुई थी और उनकी सेवाएं 14.09.2004 को नियमित की गईं।
सरकार ने कहा कि वित्त विभाग के परिपत्रों के अनुसार केवल नियमित नियुक्त कर्मचारी ही 9, 18 और 27 वर्ष की चयन वेतनमान योजना के पात्र हैं।
एडहॉक, दैनिक वेतनभोगी या अस्थायी कर्मचारी इस योजना के दायरे में शामिल नहीं किए जा सकते।
सरकार ने कहा कि 25.01.1992 और 17.02.1998 के सरकारी आदेशों में स्पष्ट है कि 9, 18 और 27 वर्ष की चयन वेतनमान योजना केवल नियमित कर्मचारियों के लिए है।
राज्य का कहना था कि परीक्षा पास करना नियमित नियुक्ति का स्वतः आधार नहीं बनता। नियमितीकरण वैधानिक भर्ती नियमों के अनुरूप ही होता है।
सरकार ने कहा कि एडहॉक नियुक्ति आवश्यकता के आधार पर अस्थायी रूप से की जाती है और यह संवर्ग (Cadre) में विधिवत नियुक्ति नहीं होती।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि एडहॉक नियुक्ति नियमित सेवा नहीं मानी जाएगी।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले State of Rajasthan & Anr. vs. Surendra Mohnot (2014) तथा State of Rajasthan vs. Jagdish Narain Chaturvedi (2009) का हवाला देते हुए कहा कि समयबद्ध वेतनमान का लाभ नियमितीकरण (Regularisation) की तिथि से ही देय होता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि नियमित नियुक्ति के लिए चार शर्तें आवश्यक हैं, जिनमें नियुक्ति पद के विरुद्ध स्थायी (Substantive) हो, सेवा या संवर्ग (Cadre) के अंतर्गत हो, वैधानिक भर्ती नियमों के अनुरूप हो और निर्धारित कोटे के भीतर हो।
कोर्ट ने कहा कि एडहॉक नियुक्ति इन शर्तों को पूरा नहीं करती, इसलिए इसे नियमित सेवा नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि 25 जनवरी 1992 तथा 17 फरवरी 1998 के सरकारी आदेशों और 3 अप्रैल 1993 के स्पष्टीकरण में स्पष्ट किया गया है कि चयन वेतनमान केवल नियमित कर्मचारियों को मिलेगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए फैसलों का हवाला वर्तमान मामले में लागू नहीं माना जा सकता, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के ताजा और स्पष्ट विधिक सिद्धांत इस विषय पर अंतिम हैं।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता द्वारा दायर याचिका को खारिज करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता 9, 18 या 27 वर्ष के चयन वेतनमान का लाभ एडहॉक नियुक्ति की तिथि से नहीं ले सकते।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि समयबद्ध वेतनमान और अन्य सेवा लाभ के लिए केवल लंबी सेवा अवधि पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैधानिक नियमों के अनुरूप नियमित नियुक्ति अनिवार्य है।
चयन वेतनमान जैसी योजनाएं वित्तीय दायित्व से जुड़ी होती हैं, इसलिए इनका लाभ नियमों के सख्त पालन के साथ ही दिया जा सकता है।