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सिर्फ शक के आधार पर ट्रायल का सामना करने के लिए मजबूर करना अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन- राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court: Trial Cannot Be Based on Mere Suspicion, Requires Grave Suspicion

हाईकोर्ट ने कहा BNSS के प्रावधान Article 14 और 21 के तहत आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का हिस्सा,

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक रिपोर्टेबल फैसले के जरिए यह स्पष्ट किया है कि केवल शक या अनुमान के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

अदालत ने कहा कि ट्रायल शुरू करने के लिए “गंभीर संदेह” आवश्यक है, जो ठोस साक्ष्यों या परिस्थितियों पर आधारित हो और आरोपी व अपराध के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करे।

कोर्ट ने यह भी कहा कि रीविजन कोर्ट ट्रायल कोर्ट के आदेश को बिना उचित कारण और स्वतंत्र विश्लेषण के पलट दिया, जबकि उसका अधिकार सीमित है और वह अपीलीय अदालत की तरह कार्य नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट ने जोर दिया कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के किसी व्यक्ति को ट्रायल में भेजना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के खिलाफ है।

यह फैसला जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने अनुज कुमार एवं अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनाया है, जिसमें अदालत ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए आरोपियों को बड़ी राहत दी।

क्या है पूरा मामला?

मामले की शुरुआत वर्ष 2012 से होती है, जब श्रीगंगानगर जिले में याचिकाकर्ताओं के बीज गोदामों पर प्रशासन ने कार्रवाई की।

25 अक्टूबर 2012 को अधिकारियों ने निरीक्षण कर बीज जब्त किए, यह कार्रवाई आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत की गई।

बाद में जिला कलेक्टर ने जब्त बीजों की नीलामी का आदेश दिया। जनवरी 2013 में प्रशासन की निगरानी में प्रक्रिया पूरी हुई।

लेकिन बाद में एक चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया जब गोदामों की दोबारा जांच हुई तो सील टूटी हुई मिली और कुछ सामान गायब पाया गया।

इसके बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ IPC की धाराओं 454 (घर में घुसकर चोरी), 457 (रात्रि में घर में घुसना), 380 (चोरी) और 201 (सबूत मिटाना) के आरोप में FIR दर्ज की।

ट्रायल कोर्ट का फैसला

मामले की जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट पेश की, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए 18 मार्च 2015 को आरोपियों को आरोपों से डिस्चार्ज (मुक्त) कर दिया।

ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस prima facie सबूत नहीं है, मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं बनता।

सेशन कोर्ट ने बदला फैसला

ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सेशन कोर्ट में फैसले को चुनौती देते हुए पुनरीक्षण याचिका दायर की।

24 मार्च 2018 को सेशन कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश पलटते हुए आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश दिया।

यहां तक कि गिरफ्तारी वारंट जारी करने के निर्देश भी दिए।

हाईकोर्ट में क्या हुआ?

सेशन कोर्ट के आदेश के खिलाफ आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी।

याचिकाकर्ता अनुज कुमार व अन्य की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील पेश करते हुए कहा कि रीविजन कोर्ट ने अधिकार सीमा का उल्लंघन किया है।

अधिवक्ता ने कहा कि सेशन कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया है और उसने ट्रायल कोर्ट के सुविचारित आदेश को बिना पर्याप्त कारण पलट दिया।

अधिवक्ता ने कहा कि रीविजन कोर्ट को केवल यह देखना था कि आदेश में कोई गंभीर त्रुटि (illegality या perversity) है या नहीं, लेकिन उसने स्वयं साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन कर दिया, जो कानूनन गलत है।

अधिवक्ताओं ने कहा कि अभियोजन के पास ठोस साक्ष्य का अभाव है, कि आरोप केवल संदेह और अनुमान पर आधारित हैं। यह साबित करने के लिए कोई प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य नहीं है कि आरोपियों ने गोदाम में घुसपैठ की या चोरी की या सबूत मिटाए।

अधिवक्ताओं ने कहा कि FIR और चार्जशीट में ठोस लिंक नहीं हैं और जांच में आरोपियों और कथित अपराध के बीच कोई स्पष्ट संबंध स्थापित नहीं हुआ।

अधिवक्ता ने कहा कि कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि सील तोड़ने में याचिकाकर्ताओं की भूमिका थी या गायब सामान उन्होंने लिया।

अधिवक्ताओं ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) का उल्लंघन— बिना पर्याप्त आधार के मुकदमे का सामना करना— यह व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा पर सीधा आघात है। कानून का उद्देश्य किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक मुकदमे में फंसाना नहीं है।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि चार्ज फ्रेम करने के लिए “grave suspicion” आवश्यक है और केवल “mere suspicion” पर्याप्त नहीं है।

अधिवक्ता ने कहा कि अदालत को स्वतंत्र रूप से विचार करना चाहिए, न कि पुलिस की राय पर निर्भर होना चाहिए, और यह “mechanical order” है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से डिप्टी गवर्नमेंट एडवोकेट ने याचिका का विरोध करते हुए दलील दी कि जांच के दौरान एकत्रित सामग्री से यह स्पष्ट होता है कि गोदाम की सील तोड़ी गई और सामान गायब हुआ। यह गंभीर अपराध है और इसमें आरोपियों की संलिप्तता की संभावना है, इसलिए मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

सरकार ने कहा कि चार्ज फ्रेमिंग के स्तर पर विस्तृत जांच जरूरी नहीं है और इस चरण पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि prima facie मामला बनता है या नहीं, और साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन ट्रायल के दौरान होता है।

सरकार ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा डिस्चार्ज करना जल्दबाजी थी और रीविजन कोर्ट का आदेश सही है और सेशन कोर्ट ने सही तरीके से हस्तक्षेप किया।

सरकार ने कहा कि मामला चोरी, घर में घुसपैठ और सबूत मिटाने से जुड़ा है। यह गंभीर अपराध हैं, जिनकी जांच और ट्रायल आवश्यक है और अभियोजन को ट्रायल का अवसर मिलना चाहिए। यदि इस स्तर पर आरोपियों को छोड़ दिया जाए, तो न्याय प्रक्रिया बाधित होगी।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बिंदुवार कई कानूनी बिंदु तय किए।

चार्ज फ्रेमिंग के चरण पर न्यायिक परीक्षण का दायरा

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चार्ज फ्रेमिंग (आरोप तय करने) के चरण पर अदालत को साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन (detailed appreciation) नहीं करना होता, लेकिन यह देखना आवश्यक है कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से prima facie अपराध बनता है या नहीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायालय केवल अभियोजन (prosecution) का “माउथपीस” या “पोस्ट ऑफिस” नहीं बन सकता, उसे स्वतंत्र रूप से यह जांचना होगा कि क्या आरोप वास्तविक हैं और क्या साक्ष्य अपराध के आवश्यक तत्वों को दर्शाते हैं।

“संक्षिप्त आदेश” बनाम “यांत्रिक आदेश” (Mechanical Order)

हाईकोर्ट ने कहा कि चार्ज फ्रेम करते समय लंबा आदेश लिखना जरूरी नहीं, लेकिन आदेश में यह दिखना चाहिए कि न्यायालय ने अपने दिमाग का प्रयोग (application of mind) किया है।

केवल यह लिख देना कि “prima facie केस बनता है” पर्याप्त नहीं है, आदेश में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन सा साक्ष्य आरोप को समर्थन देता है और किन तथ्यों के आधार पर अदालत संतुष्ट हुई। अन्यथा ऐसा आदेश “mechanical” माना जाएगा और अवैध होगा।

BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के तहत प्रक्रिया का महत्व

अदालत ने कहा कि BNSS के प्रावधान (Sections 230, 249, 250, 251) केवल औपचारिकताएं (formalities) नहीं हैं, बल्कि यह आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार (fair trial) का हिस्सा हैं।

यदि इनका पालन नहीं किया जाता तो यह Article 14 और 21 का उल्लंघन होगा।

आरोपी को दस्तावेज उपलब्ध कराना (Section 230 BNSS)

हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी को सभी दस्तावेज सही तरीके से उपलब्ध नहीं कराए गए, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (CD आदि) की वैध कॉपी नहीं दी गई।

कोर्ट ने कहा कि यह गंभीर प्रक्रिया संबंधी त्रुटि है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले (P. Gopalakrishnan केस) का हवाला देते हुए कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की प्रमाणित कॉपी देना अनिवार्य है।

अभियोजन द्वारा केस “ओपन” करने की अनिवार्यता (Section 249 BNSS)

अदालत ने कहा कि अभियोजन को यह बताना होता है कि वह किस साक्ष्य से अपराध सिद्ध करेगा, इसे “opening of case” कहा जाता है।

कोर्ट ने कहा कि लेकिन रिकॉर्ड में यह नहीं दिखा कि ऐसा किया गया।

इससे अदालत को सही तरीके से निर्णय लेने का आधार नहीं मिला।

डिस्चार्ज का अधिकार (Section 250 BNSS)

हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपी को 60 दिन का अधिकार है कि वह डिस्चार्ज की अर्जी दे सके, यह एक कानूनी अधिकार (statutory right) है।

कोर्ट ने कहा कि लेकिन इस केस में आरोप तय करने की प्रक्रिया 50 दिन में ही पूरी कर दी गई और आरोपी को पूरा समय नहीं दिया गया। यह अधिकार छीनना कानून के उद्देश्य के विपरीत है।

कारण दर्ज करना आवश्यक

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि डिस्चार्ज नहीं दिया जाता तो कारण दर्ज करना जरूरी है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया।

इससे आदेश अपूर्ण (incomplete) और कानून के विपरीत हो जाता है।

“मात्र संदेह” बनाम “गंभीर संदेह” सिद्धांत

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मात्र संदेह (Mere Suspicion):
अनुमान या शक मुकदमा चलाने के लिए कोई ठोस आधार नहीं।

कोर्ट ने कहा कि गंभीर संदेह (Grave Suspicion): ठोस साक्ष्य या परिस्थितियां— आरोपी और अपराध के बीच स्पष्ट संबंध ही मुकदमे का ठोस आधार हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि “मुकदमा चलाने के लिए गंभीर संदेह होना जरूरी है, मात्र संदेह नहीं।”

हाईकोर्ट ने पाया कि रीविजन कोर्ट ने यह नहीं बताया कि ट्रायल कोर्ट का आदेश क्यों गलत था, उसने कोई स्वतंत्र विश्लेषण नहीं किया और केवल आदेश पलट देना पर्याप्त नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि रीविजन कोर्ट का अधिकार सीमित है और वह अपीलीय अदालत की तरह कार्य नहीं कर सकता।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण

हाईकोर्ट ने कहा कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के किसी व्यक्ति को ट्रायल में भेजना उसकी स्वतंत्रता (liberty) का उल्लंघन है।

यह संविधान के अनुच्छेद 21 के खिलाफ है।

अंतिम फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे आरोपियों की संलिप्तता सिद्ध हो सके, जिससे उन्हें ट्रायल पर भेजा जा सके।

हाईकोर्ट ने आरोपियों को आरोपमुक्त करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए रिवीजन कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है।

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