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फर्जी डिग्री घोटाला : OPJS यूनिवर्सिटी के चेयरमैन जोगेंद्र सिंह की चौथी जमानत याचिका भी खारिज, हाईकोर्ट में कहा झूठा फंसाया गया

Rajasthan High Court Rejects 4th Bail Plea of OPJS University Chairman in Fake Degree Scam

कोर्ट ने कहा-गंभीर आरोप, सक्रिय संलिप्तता के प्रथम दृष्टया साक्ष्य; बिना नए आधार के राहत संभव नहीं

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने बहुचर्चित फर्जी डिग्री घोटाले में बड़ा फैसला सुनाते हुए OPJS यूनिवर्सिटी के चेयरमैन जोगेंद्र सिंह उर्फ जोगेंद्र दलाल की चौथी जमानत याचिका खारिज कर दी है।

जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता, आरोपों की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए स्पष्ट कहा कि इस स्तर पर आरोपी को जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता।

इससे पहले आरोपी जोगेंद्र सिंह राजस्थान हाईकोर्ट में तीन जमानत याचिकाएं दायर कर चुका है।

यह मामला एसओजी, जयपुर में दर्ज एफआईआर संख्या 12/2024 से जुड़ा है, जिसमें आरोपी के खिलाफ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ राजस्थान पब्लिक एग्जामिनेशन (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2022 और आईटी एक्ट के तहत आरोप लगाए गए हैं।

मामला क्या है?

मामले के अनुसार, आरोप है कि OPJS यूनिवर्सिटी के माध्यम से फर्जी डिग्री और मार्कशीट जारी की गईं, जिनका उपयोग सरकारी नौकरियों में चयन पाने के लिए किया गया।

जांच में सामने आया कि सह-आरोपी गणपत लाल ने ऐसी ही एक फर्जी डिग्री का उपयोग कर 2022 की शारीरिक शिक्षक भर्ती में चयन प्राप्त किया।

सिर्फ इतना ही नहीं, जांच एजेंसियों ने यह भी पाया कि फर्जी डिग्री के साथ-साथ नकली सत्यापन रिपोर्ट भी तैयार की गई, जिसमें रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर तक जाली बताए गए हैं।

यह रिपोर्ट शिक्षा विभाग को भेजी गई थी, जिससे पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए।

याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ता आरोपी चेयरमैन की ओर से अधिवक्ताओं ने जमानत याचिका के पक्ष में दलील देते हुए कहा कि जोगेंद्र सिंह को झूठा फंसाया गया है और उनके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जो यह साबित करे कि उन्होंने स्वयं किसी फर्जी डिग्री के निर्माण या वितरण का निर्देश दिया।

बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि आरोपी ने वर्ष 2015 में ही यूनिवर्सिटी के प्रबंधन से इस्तीफा दे दिया था और उसके बाद उनका संस्थान के प्रशासनिक कार्यों से कोई लेना-देना नहीं रहा।

इसके अलावा, वकीलों ने यह तर्क भी रखा कि केवल किसी दस्तावेज पर पुरानी तारीख डालना या उसका वितरण करना “फर्जीवाड़ा” नहीं माना जा सकता, जब तक कि वह “झूठा दस्तावेज” साबित न हो।

अधिवक्ताओं ने एक महत्वपूर्ण तकनीकी आपत्ति उठाते हुए कहा कि चार्जशीट सीधे विशेष न्यायालय में पेश की गई, जबकि कानून के अनुसार पहले मजिस्ट्रेट द्वारा कमिटमेंट आवश्यक है। इस प्रक्रिया के अभाव में ट्रायल अवैध है।

राज्य सरकार का पक्ष

सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि आरोपी की तीन पूर्व जमानत याचिकाएं पहले ही खारिज हो चुकी हैं और वर्तमान में कोई नया आधार सामने नहीं आया है।

सरकार ने यह भी कहा कि जोगेंद्र सिंह न केवल यूनिवर्सिटी के चेयरमैन थे, बल्कि संस्थान के मालिक और संचालक भी थे, इसलिए वे अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

सरकारी पक्ष के अनुसार, आरोपी ने अन्य कर्मचारियों के साथ मिलकर सुनियोजित साजिश के तहत फर्जी डिग्री और सत्यापन रिपोर्ट तैयार कीं, जिससे अयोग्य उम्मीदवारों को सरकारी नौकरी दिलाई गई।

सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि किसी अन्य मामले में मिली जमानत का इस केस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि हर मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करता है।

हाईकोर्ट का आदेश

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोपी यूनिवर्सिटी के संस्थापक, चेयरमैन और मास्टरमाइंड के रूप में सामने आता है।

कोर्ट ने कहा कि फर्जी डिग्री और दस्तावेज जारी करने में उसकी सक्रिय भूमिका प्रतीत होती है और सह-आरोपी गणपत लाल का नाम यूनिवर्सिटी रिकॉर्ड में नहीं मिला।

कोर्ट ने कहा कि नकली सत्यापन रिपोर्ट तैयार की गई और रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर जाली पाए गए।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कमिटमेंट की प्रक्रिया में कोई त्रुटि होना केवल एक प्रक्रियात्मक मुद्दा है, जो जमानत का आधार नहीं बन सकता।

“पैरिटी” का तर्क भी खारिज

याचिकाकर्ता ने यह दलील भी दी थी कि उन्हें एक अन्य मामले में जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता (Parity) के आधार पर यहां भी राहत दी जाए।

लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यह मामला अलग एफआईआर और अलग तथ्यों पर आधारित है, इसलिए पैरिटी लागू नहीं होती।

कोर्ट का अंतिम फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपी चेयरमैन की चौथी जमानत याचिका को खारिज करते हुए कहा कि पहले की तीन जमानत याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं और कोई नया या ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया।

आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और समाज पर व्यापक प्रभाव डालते हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से : अधिवक्ता स्वदीप सिंह होरा, वेदांत शर्मा, अधिवक्ता हिमांशु अग्रवाल, अधिवक्ता शिवम शर्मा

राज्य सरकार की ओर से : जीए-कम-एएजी राजेश चौधरी, लोक अभियोजक विवेक शर्मा

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