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JK Lakshmi Cement को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका, डीजल सप्लाई को ‘बिक्री’ मानने पर राजस्थान हाईकोर्ट की मुहर,

Rajasthan High Court Denies Relief to JK Lakshmi Cement in Diesel Supply Tax Case

डीजल सप्लाई के मामले में 3 करोड़ से अधिक के टैक्स और 11.35 करोड़ के टर्नओवर पर कार्रवाई बरकरार

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में JK Lakshmi Cement लिमिटेड को बड़ी राहत देने से इनकार करते हुए Commercial Tax Department की कार्रवाई को उचित ठहराया है।

हाईकोर्ट ने कंपनी की ओर से दायर याचिका को निस्तारित करते हुए कंपनी को विभाग की कार्रवाई का सामना करने को कहा है।

मामला कंपनी द्वारा अपने ठेकेदारों को हाई स्पीड डीजल (HSD) उपलब्ध कराने और उस आपूर्ति को ‘बिक्री’ मानते हुए कर, सेस, ब्याज और पेनल्टी लगाने की प्रस्तावित कार्रवाई से जुड़ा है।

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि विभाग द्वारा जारी निरीक्षण/सर्वे रिपोर्ट और कारण बताओ नोटिस प्रथमदृष्टया वैध हैं तथा इस स्तर पर न्यायिक हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

क्या है मामला

याचिकाकर्ता कंपनी JK Lakshmi Cement लिमिटेड, सिरोही जिले में अपने सीमेंट निर्माण संयंत्र और कैप्टिव लाइमस्टोन खदानों का संचालन करती है।

खनन, आंतरिक सामग्री हैंडलिंग और क्लिंकर परिवहन जैसे कार्य कंपनी विभिन्न ठेकेदारों के माध्यम से कराती है। इन कार्यों में भारी मशीनरी का उपयोग होता है, जिसके लिए डीजल की आवश्यकता होती है।

कंपनी का कहना था कि वह डीजल केवल कार्य सुविधा हेतु ठेकेदारों को उपलब्ध कराती है, न कि बिक्री के रूप में। डीजल की लागत किसी स्वतंत्र लेनदेन के तहत नहीं ली जाती, बल्कि यह समग्र सेवा अनुबंध का हिस्सा है।

विभाग का आरोप

व्यावसायिक कर विभाग की एंटी-इवेज़न टीम ने 6 सितंबर 2019 को सर्वे किया और 18 फरवरी 2020 की सर्वे रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया कि ठेकेदारों को दो तरह की दरें दी जाती थीं।

जिसमें कहा गया कि डीजल उपलब्ध कराने पर भुगतान की दर कम थी, जबकि डीजल न देने पर दर अधिक थी।

इस अंतर को विभाग ने ‘डीजल के बदले समायोजित भुगतान’ माना और कहा कि यह वस्तुतः डीजल की बिक्री है, जो राजस्थान वैट अधिनियम, 2003 की धारा 2(35) के अंतर्गत ‘सेल’ की परिभाषा में आती है।

विभाग ने वित्तीय वर्ष 2015-16 के लिए 11,35,90,985 रुपये को करयोग्य टर्नओवर मानते हुए लगभग 2.49 करोड़ रुपये टैक्स तथा लगभग 50.87 लाख रुपये सेस की गणना की। इसके साथ ब्याज और दोगुनी पेनल्टी की भी संस्तुति की गई।

JK Lakshmi Cement कंपनी की दलीलें

कंपनी की ओर से विभाग की कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में दलील दी कि याचिकाकर्ता कंपनी सीमेंट एवं क्लिंकर के निर्माण में संलग्न है।

इसकी अपनी कैप्टिव लाइमस्टोन खदानें हैं, जिनमें खनन, आंतरिक हैंडलिंग, क्रशिंग, ट्रांसपोर्ट आदि कार्य ठेकेदारों के माध्यम से कराए जाते हैं और इन कार्यों में प्रयुक्त मशीनरी के संचालन हेतु डीजल की आवश्यकता होती है।

कंपनी ने कहा कि वह डीजल केवल कार्य निष्पादन की सुविधा के लिए उपलब्ध कराती थी।

डीजल बिक्री नहीं, सुविधा मात्र

कंपनी की ओर से दलील दी गई कि डीजल बिक्री के आवश्यक तत्व अनुपस्थित हैं — न कोई स्वतंत्र विक्रय अनुबंध हुआ है, न ही स्वामित्व हस्तांतरण हुआ है और डीजल का कोई अलग से बिल नहीं दिया गया।

कंपनी ने कहा कि विभाग ने डीजल सहित व डीजल रहित दरों में अंतर को बिक्री का संकेत माना।

कंपनी ने कहा कि यह केवल दर पुनरीक्षण तंत्र (rate revision mechanism) है, जो इनपुट लागत में बदलाव के आधार पर दर समायोजित होती थी और इससे बिक्री सिद्ध नहीं होती।

आकलन पुनः खोलना अवैध

कंपनी ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2015-16 का आकलन पहले ही पूरा हो चुका था और कोई नई ठोस (incriminating) सामग्री नहीं है और विभाग का यह केवल “change of opinion” है, जिसमें धारा 25 के तहत ‘reason to believe’ का अभाव है।

पूर्व निर्धारित मानसिकता का आरोप

कंपनी ने विभाग पर आरोप लगाया कि कारण बताओ नोटिस की भाषा से स्पष्ट है कि अधिकारी पहले ही निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं और नोटिस वस्तुतः पूर्व निर्णय (pre-decisional order) जैसा है, जो कि वास्तविक सुनवाई का अवसर दिए बिना जारी किया गया।

कंपनी ने कहा कि वर्षों से विभाग इस व्यवस्था से अवगत था और कभी इसे बिक्री नहीं माना गया। मामले में विभाग ने अचानक रुख बदला।

सेस लगाने पर आपत्ति

कंपनी ने कहा कि यदि बिक्री ही नहीं है, तो राजस्थान स्टेट रोड डेवलपमेंट फंड एक्ट, 2004 के तहत सेस भी लागू नहीं है। कंपनी ने कहा कि डीजल का उपयोग उत्पादन गतिविधि में हुआ, स्वतंत्र व्यापार में नहीं।

कंपनी ने यह भी कहा कि डीजल सी-फॉर्म के तहत रियायती दर पर खरीदा जाता है और उसका उपयोग खनन व निर्माण गतिविधियों में होता है, जो उत्पादन प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है।

विभाग का जवाब

कंपनी की याचिका का विरोध करते हुए राज्य के कर विभाग ने दलील दी कि रिट याचिका समयपूर्व दायर की गई है, क्योंकि केवल कारण बताओ नोटिस के खिलाफ रिट दायर की गई है और अभी तक कोई अंतिम आदेश पारित नहीं हुआ, जबकि कंपनी के पास वैधानिक अपील का उपाय उपलब्ध है।

विभाग ने कहा कि उसके पास कंपनी का 15 अप्रैल 2013 का पत्र है, जिसमें डीजल सहित दर और डीजल रहित दर का तुलनात्मक चार्ट था, जिसमें डीजल देने पर दर कम और न देने पर दर अधिक थी।

विभाग ने कहा कि डीजल मूल्य परिवर्तन पर दर संशोधन हो रहा है, जो कि डीजल की आपूर्ति को स्पष्ट रूप से अनुबंध का हिस्सा बनाता है।

विभाग ने कहा कि जांच में प्राप्त रिकॉर्ड में डीजल रजिस्टर, रिक्विजिशन स्लिप, इनवॉइस, मशीनरी संचालन विवरण शामिल किए गए हैं।

विभाग ने कहा कि कंपनी ने नकद भुगतान के स्थान पर डीजल के रूप में आंशिक भुगतान प्राप्त किया है, जो कि धारा 2(35) के तहत “sale” है।

विभाग ने कहा कि अधिकारी को prima facie विश्वास हो कि कर परिहार हुआ है, तो पुनर्मूल्यांकन संभव है और आकलन पुनः खोला जा सकता है, क्योंकि अधिनियम में पुनर्मूल्यांकन पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि सर्वे रिपोर्ट केवल अनुशंसा (recommendation) है और यह अंतिम कर निर्धारण नहीं है और इसे पूर्व निर्णय नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कारण बताओ नोटिस के बिंदु पर कहा कि नोटिस केवल स्पष्टीकरण मांगता है और इसमें अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि नोटिस की भाषा कठोर हो सकती है, परंतु इससे पूर्वनिर्णय सिद्ध नहीं होता।

कोर्ट ने कहा कि अधिनियम में पूर्ण निषेध नहीं है और धारा 25(1) के तहत शक्ति व्यापक है कि यदि prima facie सामग्री हो, तो पुनर्मूल्यांकन वैध है।

कोर्ट ने कहा कि अभी जांच लंबित है और अंतिम आदेश पारित नहीं हुआ है। याचिकाकर्ता को पूरा अवसर मिलेगा, इसलिए प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन सिद्ध नहीं होता।

हाईकोर्ट ने कहा कि तथ्यात्मक विवादों की जांच रिट क्षेत्राधिकार में नहीं है और साक्ष्य का मूल्यांकन आकलन अधिकारी करेगा, जिसमें अपील का वैधानिक उपाय उपलब्ध है।

अंतिम आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने कर विभाग द्वारा दिए गए कारण बताओ नोटिस को वैध मानते हुए कहा कि पुनर्मूल्यांकन विभाग की शक्ति के दायरे में है। इसलिए कंपनी की याचिका को निस्तारित करते हुए वाणिज्यिक कर विभाग के समक्ष जारी जांच में शामिल होने के आदेश दिए हैं।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि JK Lakshmi Cement कर विभाग की ओर से जारी नोटिस के संबंध में अपना स्पष्टीकरण पेश करे और कर विभाग उस पर जांच कर अपना निर्णय लेगा।

हाईकोर्ट ने JK Lakshmi Cement को छूट दी है कि यदि वह कर विभाग के फैसले से संतुष्ट नहीं होती है, तो वह नियमानुसार कानूनी कार्रवाई कर सकेगी।

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