जयपुर। राजधानी जयपुर के बीटू बाइपास स्थित श्रीराम कॉलोनी की बहुचर्चित 42 बीघा जमीन अवाप्ति विवाद में राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अहम हस्तक्षेप करते हुए एकलपीठ के 9 अप्रैल के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने यह राहत श्रीराम कॉलोनी-बी विकास समिति की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए दी है।
इस फैसले से इलाके में रह रहे करीब 300 परिवारों को बड़ी राहत मिली है, जिन पर बेदखली का खतरा मंडरा रहा था।
300 परिवारों को अंतरिम राहत, बेदखली पर लगी रोक
खंडपीठ के इस आदेश के बाद फिलहाल जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं।
इससे उन सैकड़ों परिवारों को राहत मिली है, जो पिछले चार दशकों से इस क्षेत्र में निवास कर रहे हैं।
इस आदेश का सीधा असर उन परिवारों पर पड़ा है, जिनके मकानों को हाल ही में हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी गई थी।
कोर्ट के हस्तक्षेप से अब तत्काल बेदखली पर रोक लग गई है और मामले की विस्तृत सुनवाई तक स्थिति स्थिर रहेगी।
एकलपीठ के आदेश के बाद शुरू हुई थी कार्रवाई
गौरतलब है कि इससे पहले हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 9 अप्रैल को दिए अपने आदेश में जमीन से जुड़े विक्रय पत्रों और स्वामित्व को लेकर गंभीर टिप्पणियां की थीं।
इस आदेश के बाद राजस्थान हाउसिंग बोर्ड ने 16 अप्रैल को मौके पर कब्जा लेने की कार्रवाई शुरू कर दी थी।
इस दौरान प्रशासन ने करीब 20 परिवारों के अस्थायी ढांचे और कुछ पक्के निर्माणों को भी ध्वस्त कर दिया था।
अचानक हुई इस कार्रवाई से इलाके में तनाव की स्थिति बन गई थी और प्रभावित परिवारों में भारी आक्रोश देखा गया था।
अब खंडपीठ के आदेश के बाद हाउसिंग बोर्ड को पूर्व स्थिति बहाल करनी होगी, जिससे प्रभावित परिवारों को राहत मिल सकती है।
चार दशक से बसे परिवार, दस्तावेजों को लेकर विवाद
अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आशीष शर्मा ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि एकलपीठ ने उन बिंदुओं पर निर्णय दिया है, जिन पर पहले ही सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट निर्णय दे चुका है।
उन्होंने कोर्ट को बताया कि श्रीराम कॉलोनी में करीब 40 वर्षों से 300 से अधिक परिवार रह रहे हैं। इन परिवारों के पास वर्ष 1981 के विक्रय पत्र मौजूद हैं, जिन्हें एकलपीठ द्वारा शून्य घोषित करना न्यायसंगत नहीं है।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि हाउसिंग बोर्ड ने अपीलकर्ताओं पर धोखाधड़ी के आरोप लगाए थे, लेकिन ये आरोप पूर्व में न्यायिक कार्यवाहियों में खारिज किए जा चुके हैं। ऐसे में पुराने मामलों को आधार बनाकर नागरिकों को बेदखल करना कानून के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
जेडीए की योजना स्वीकृति को बताया गया था अवैध
इस मामले की जड़ में जयपुर विकास प्राधिकरण (जयपुर विकास प्राधिकरण) द्वारा 29 मई 1995 को दी गई योजना स्वीकृति भी शामिल है।
एकलपीठ ने अपने आदेश में इस योजना स्वीकृति और उसके बाद जारी आदेशों को अवैध करार दिया था।
साथ ही यह भी कहा था कि केवल विक्रय पत्र के आधार पर स्वामित्व का अधिकार स्थापित नहीं होता है।
यही टिप्पणी इस पूरे विवाद का मुख्य कारण बनी, जिसके बाद हाउसिंग बोर्ड ने जमीन पर अपना दावा मजबूत करते हुए कब्जा लेने की कार्रवाई शुरू कर दी।
अंतिम फैसला बाकी
खंडपीठ द्वारा लगाई गई रोक को फिलहाल अंतरिम राहत माना जा रहा है।
मामले में अंतिम निर्णय अभी होना बाकी है और आने वाली सुनवाई में दोनों पक्षों के तर्कों के आधार पर विस्तृत फैसला दिया जाएगा।
क्या है पूरा विवाद?
बीटू बाइपास चौराहे से लेकर द्रव्यवती नदी तक फैली इस जमीन को लेकर विवाद की जड़ें करीब चार दशक पुरानी हैं।
राजस्थान हाउसिंग बोर्ड ने वर्ष 1989 में इस जमीन को अधिग्रहित (अवाप्त) करने की प्रक्रिया शुरू की थी और वर्ष 1991 में यह प्रक्रिया पूरी भी कर ली गई थी।
हालांकि, अधिग्रहण के बावजूद उस समय जमीन पर वास्तविक कब्जा नहीं लिया गया। यही वह चूक थी, जिसने आगे चलकर पूरे विवाद को जन्म दिया।
भूमाफियाओं का खेल और सहकारी समिति की भूमिका
कब्जा नहीं लिए जाने का फायदा उठाते हुए कुछ भूमाफियाओं ने कथित तौर पर जवाहरपुरी भवन निर्माण सहकारी समिति के नाम पर इस जमीन पर कॉलोनी विकसित कर दी।
बताया जाता है कि इस जमीन के भूखंडों का बेचान वर्ष 1981 में कथित खरीद के आधार पर दिखाया गया, जबकि हकीकत में अधिग्रहण प्रक्रिया बाद में पूरी हो चुकी थी।
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले में कई प्रभावशाली और रसूखदार लोगों को बेहद कम कीमत पर प्लॉट आवंटित किए गए। इससे यह मामला केवल जमीन विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संभावित बड़े घोटाले की शक्ल भी लेने लगा।