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कोर्ट आदेश के बावजूद ग़ैर मुमकिन नाले पर अतिक्रमण पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार को नोटिस, 30 अप्रैल को अगली सुनवाई

Rajasthan High Court Issues Notice Over Encroachment on Natural Drain in Khatwara, Hearing on April 30

जयपुर। राजस्थान में जल स्रोतों पर हो रहे अवैध अतिक्रमण के मामलों को लेकर एक बार फिर न्यायपालिका ने सख्त रुख अपनाया है। जयपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट ने ग्राम खटवाड़ा (तहसील सांगानेर, जिला जयपुर) के खसरा नंबर 220 की भूमि पर स्थित ग़ैर मुमकिन नाले पर किए गए कथित अवैध अतिक्रमण के मामले में जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार सहित संबंधित अतिक्रमणकर्ता को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

यह आदेश कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एस.पी. शर्मा और न्यायमूर्ति शुभा मेहता की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता गोविन्दराम द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।

नाले के अस्तित्व पर संकट, ग्रामीणों की बढ़ी चिंता

याचिका में बताया गया है कि ग्राम खटवाड़ा स्थित खसरा नंबर 220 की भूमि पर वर्ष 1955 से एक प्राकृतिक ग़ैर मुमकिन नाला बहता आ रहा है। यह नाला केवल जल निकासी का साधन ही नहीं, बल्कि आसपास के किसानों के लिए सिंचाई और जल संचयन का महत्वपूर्ण स्रोत भी रहा है।

वर्षों से इस नाले के पानी का उपयोग स्थानीय कृषक करते आए हैं, जिससे उनकी कृषि गतिविधियाँ निर्भर रही हैं।

लेकिन हाल के समय में इस नाले पर कथित रूप से अवैध अतिक्रमण कर दिया गया। आरोप है कि संबंधित खातेदार हरी नारायण जांगिड़ ने नाले के बहाव क्षेत्र में मिट्टी और रोड़ी डालकर उसे समतल कर दिया, जिससे नाले का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध हो गया।

इससे न केवल जल प्रवाह बाधित हुआ बल्कि आसपास के खेतों में जलभराव और सिंचाई संकट की स्थिति उत्पन्न होने लगी।

भूमि को बेचने की तैयारी, मामला हुआ गंभीर

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सिद्धार्थ जैन मूथा ने अदालत को बताया कि नाले की भूमि को समतल करने के बाद अब उसे बेचने की तैयारी की जा रही है। यदि ऐसा होता है, तो यह न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से हानिकारक होगा बल्कि सार्वजनिक संपत्ति के दुरुपयोग का गंभीर मामला भी बन जाएगा।

ग्रामीणों ने इस संबंध में तहसीलदार सांगानेर, पुलिस थाना सेज और मुख्यमंत्री कार्यालय तक कई शिकायतें दर्ज करवाईं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। प्रशासन की इस निष्क्रियता को ही जनहित याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई है।

राजस्व रिकॉर्ड में गड़बड़ी का आरोप

याचिका में यह भी गंभीर आरोप लगाया गया है कि ग़ैर मुमकिन नाले की भूमि को नियमों के विरुद्ध खातेदारी में दर्ज कर दिया गया।

जबकि राज्य सरकार के स्पष्ट निर्देश हैं कि इस प्रकार की भूमि का न तो आवंटन किया जा सकता है और न ही इसका नियमन संभव है।

उल्लेखनीय है कि राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ द्वारा वर्ष 2012 में दिए गए महत्वपूर्ण निर्णय (सुओ मोटो बनाम राज्य सरकार) में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि ग़ैर मुमकिन नालों, जोहड़ों, तालाबों आदि जल स्रोतों की भूमि का किसी भी प्रकार का आवंटन प्रतिबंधित रहेगा।

इसके पालन में राज्य सरकार ने 26 जून 2012 को एक सर्कुलर जारी कर सभी विभागों को सख्त निर्देश दिए थे।

इसके बावजूद यदि ऐसी भूमि को खातेदारी में दर्ज किया गया है, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और मिलीभगत की ओर भी संकेत करता है।

हाईकोर्ट ने मांगा जवाब, प्रशासन पर सवाल

खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार, जिला प्रशासन और संबंधित अतिक्रमणकर्ता को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल एक गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य में जल स्रोतों पर हो रहे अतिक्रमण की व्यापक समस्या का हिस्सा है।

इससे पहले भी अदालत ने विभिन्न मामलों में यह कहा है कि जल स्रोतों पर अतिक्रमण न केवल पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ता है, बल्कि भविष्य में जल संकट को भी बढ़ावा देता है।

जनहित याचिका में उठाए गए प्रमुख बिंदु

जनहित याचिका में निम्नलिखित प्रमुख बिंदु उठाए गए हैं:

  • ग़ैर मुमकिन नाले की भूमि पर अवैध अतिक्रमण और निर्माण
  • नाले के प्राकृतिक प्रवाह को अवरुद्ध करना
  • प्रशासन द्वारा शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करना
  • राजस्व रिकॉर्ड में नियमों के विपरीत बदलाव
  • पर्यावरण और किसानों के हितों की अनदेखी

याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो इससे न केवल कृषि व्यवस्था प्रभावित होगी बल्कि क्षेत्र में जल संकट और पर्यावरणीय क्षति भी बढ़ेगी।

दस्तावेजों और साक्ष्यों का हवाला

याचिका के साथ प्रस्तुत दस्तावेजों में जमाबंदी, नक्शे, फोटोग्राफ्स और विभिन्न अधिकारियों को दी गई शिकायतों की प्रतियां शामिल हैं। इनमें स्पष्ट रूप से नाले के अस्तित्व और उस पर किए गए अतिक्रमण को दर्शाया गया है।

विशेष रूप से पटवारी द्वारा की गई साइट निरीक्षण रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया है कि बिना अनुमति के नाले के बहाव क्षेत्र में मिट्टी डालकर उसका रास्ता रोका गया है, जो कानूनन गलत है।

पर्यावरण और जल संरक्षण से जुड़ा बड़ा मुद्दा

यह मामला केवल एक भूमि विवाद नहीं, बल्कि जल संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। राजस्थान जैसे जल संकटग्रस्त राज्य में प्राकृतिक नालों और जल स्रोतों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे अतिक्रमणों को समय रहते नहीं रोका गया, तो भविष्य में भूजल स्तर में गिरावट, बाढ़ और सूखे जैसी समस्याएं और बढ़ सकती हैं।

30 अप्रैल को अगली सुनवाई

हाईकोर्ट ने मामले में अगली सुनवाई के लिए 30 अप्रैल की तारीख निर्धारित की है। इस दौरान राज्य सरकार और अन्य पक्षों को अपना जवाब प्रस्तुत करना होगा।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या अवैध अतिक्रमण को हटाने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।

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