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आमेर स्थित फाइव स्टार ताज होटल को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत, वन्यजीव क्लीयरेंस रद्द करने का आदेश निरस्त

Rajasthan High Court Grants Relief to Taj Amer Hotel, Quashes Wildlife Clearance Rejection

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने आमेर स्थित फाइव स्टार होटल ताज आमेर को बड़ी राहत देते हुए वन्यजीव क्लीयरेंस रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया है।

हाईकोर्ट ने 28 फरवरी 2024 को पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत होटल को वन्यजीव मंजूरी देने से इनकार किया गया था।

जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने कान्हा होटल्स एंड स्पा प्राइवेट लिमिटेड की याचिका को स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया कि नए नियमों को पुराने और पहले से स्थापित प्रोजेक्ट्स पर लागू नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा मामला

मामला आमेर क्षेत्र में स्थित एक फाइव स्टार होटल से जुड़ा है, जिसे राज्य की पर्यटन नीति 2006 के तहत मंजूरी मिली थी।

होटल परियोजना के लिए विभिन्न सरकारी विभागों से समय-समय पर आवश्यक अनुमतियां ली गई थीं और निर्माण कार्य भी इको सेंसिटिव जोन (ESZ) अधिसूचना लागू होने से पहले ही पूरा हो चुका था।

हालांकि, वर्ष 2024 में नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ की स्टैंडिंग कमेटी ने इस होटल को वन्यजीव क्लीयरेंस देने से इनकार कर दिया था।

इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।

याचिकाकर्ता होटल का पक्ष

कान्हा होटल्स एंड स्पा प्राइवेट लिमिटेड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर.बी. माथुर ने हाईकोर्ट में दलीलें पेश करते हुए कहा कि संबंधित होटल परियोजना पूरी तरह वैध है और इसे गलत तरीके से “नई परियोजना” मानकर वन्यजीव क्लीयरेंस से वंचित किया गया।

परियोजना पहले से स्थापित (Existing Unit) है

याचिकाकर्ता ने कहा कि होटल परियोजना को वर्ष 2006 की पर्यटन नीति के तहत मंजूरी मिली थी और इसके लिए आवश्यक सभी अनुमतियां समय-समय पर ली गई थीं।

  • पर्यावरण स्वीकृति (Environmental Clearance) वर्ष 2017 में मिल चुकी थी
  • निर्माण कार्य 2019 तक पूरा हो गया था

इसलिए इसे “existing unit” माना जाना चाहिए, न कि “fresh proposal”।

ESZ अधिसूचना का पूर्व प्रभाव नहीं

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि 8 मार्च 2019 की इको सेंसिटिव जोन (ESZ) अधिसूचना को पूर्व प्रभाव (retrospective effect) से लागू नहीं किया जा सकता। कानून का सिद्धांत है—नए नियम पुराने मामलों पर लागू नहीं होते।

सभी वैधानिक अनुमतियां पहले से प्राप्त

याचिकाकर्ता ने बताया कि भूमि उपयोग परिवर्तन (Land Conversion), पर्यटन विभाग की स्वीकृति, जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) से बिल्डिंग प्लान अनुमोदन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति और फायर विभाग से NOC—सभी आवश्यक स्वीकृतियां विधिवत ली गई थीं।

राज्य वन्यजीव बोर्ड की सिफारिश

राज्य वन्यजीव बोर्ड ने स्वयं होटल परियोजना के पक्ष में सिफारिश की थी और वन विभाग ने भी निरीक्षण के बाद क्लीयरेंस की अनुशंसा की थी।

नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ की स्टैंडिंग कमेटी ने बिना सुनवाई का अवसर दिए निर्णय लिया, जो “non-speaking” और मनमाना है।

अधिवक्ता ने कहा कि होटल में करोड़ों रुपये का निवेश किया गया है, सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला है और यह एक चालू (operational) इकाई है। ऐसे में क्लीयरेंस रद्द करना अत्यंत अनुचित और हानिकारक होगा।

सरकार और प्रतिवादियों का जवाब

मामले में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ और अन्य विभागों की ओर से पेश वकीलों ने याचिका का विरोध करते हुए इसे खारिज करने की मांग की।

प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि—

विशेषज्ञ संस्था के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं

प्रतिवादियों ने कहा कि नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (NBWL) एक विशेषज्ञ संस्था है, जिसमें पर्यावरण और वन्यजीव विशेषज्ञ शामिल हैं। इसलिए कोर्ट को उसके निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

पूर्व अनुमति (Prior Clearance) आवश्यक थी

प्रतिवादियों के अनुसार, होटल परियोजना 20,000 वर्गमीटर से अधिक निर्माण क्षेत्र की है। ऐसे में EIA Notification 2006 के तहत पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति और NBWL की अनुमति आवश्यक थी और निर्माण से पहले वन्यजीव क्लीयरेंस नहीं ली गई।

प्रतिवादियों ने कहा कि होटल का निर्माण 2019 के आसपास शुरू हुआ, जबकि वन्यजीव क्लीयरेंस के लिए आवेदन बाद में किया गया। इससे स्पष्ट है कि निर्माण बिना आवश्यक अनुमति के किया गया।

परियोजना “Existing Unit” नहीं बल्कि “New Unit”

प्रतिवादियों का तर्क था कि होटल का कंप्लीशन सर्टिफिकेट 2023 में मिला और इसका मतलब यह परियोजना ESZ अधिसूचना के बाद भी निर्माणाधीन थी। इसलिए इसे “existing unit” नहीं माना जा सकता।

पर्यावरणीय शर्तों का उल्लंघन

प्रतिवादियों ने यह भी कहा कि पर्यावरण स्वीकृति की शर्तों (विशेषकर Condition No. 10) का पालन नहीं किया गया। NBWL से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य था।

प्रतिवादियों ने जोर देकर कहा कि पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के मामलों में आर्थिक निवेश या व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।

तथ्य छिपाने का आरोप

प्रतिवादियों ने यह भी आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने निर्माण में कुछ अनियमितताएं कीं।
सभी तथ्यों को पूरी तरह कोर्ट के सामने प्रस्तुत नहीं किया।

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि नई शर्तें पुराने प्रोजेक्ट पर लागू नहीं होंगी और होटल का निर्माण इको सेंसिटिव जोन अधिसूचना से पहले पूरा हो चुका था।

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य वन्यजीव बोर्ड पहले ही होटल के पक्ष में सिफारिश कर चुका था।
पूर्व विद्यमान इकाइयों पर नई पाबंदियां लागू नहीं की जा सकतीं।

अदालत ने यह भी माना कि संबंधित प्राधिकरण द्वारा लिया गया निर्णय पर्याप्त कारणों के बिना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था।

कोर्ट ने क्या कहा

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का सिद्धांत “lex prospicit non respicit” (कानून आगे देखता है, पीछे नहीं) इस मामले में लागू होता है। यानी किसी नए नियम को पहले से स्थापित परियोजनाओं पर पीछे जाकर लागू नहीं किया जा सकता।

फैसले में यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता की परियोजना एक “existing unit” (पूर्व विद्यमान इकाई) है, इसलिए उसे नई अधिसूचनाओं के आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता

अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता कान्हा होटल्स एंड स्पा प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 28 फरवरी 2024 को जारी वन्यजीव क्लीयरेंस अस्वीकृति (rejection) के आदेश को निरस्त (quash) कर दिया।

कोर्ट ने नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ की स्टैंडिंग कमेटी के निर्णय को मनमाना, गैर-तर्कसंगत (non-speaking) और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत माना।

यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की परियोजना को गलत तरीके से “fresh proposal” माना गया।

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