जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने आपसी द्वेष और बदला लेने के लिए बिना किसी आधार के मुकदमा दर्ज कराने के मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि व्यक्तिगत द्वेष या प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराई गई FIR को कोर्ट बर्दाश्त नहीं कर सकता।
जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकल पीठ ने वर्ष 2015 के एक आपराधिक मामले में दर्ज FIR को रद्द करते हुए इसे “कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” बताया है।
यह मामला परिवहन विभाग से जुड़े एक अधिवक्ता और एक परिवहन अधिकारी के बीच विवाद से संबंधित है, जिसमें दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ FIR दर्ज कराई गई थी।
अदालत ने पूरे मामले का गहन विश्लेषण करते हुए पाया कि संबंधित FIR दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से दर्ज की गई थी और इसका उद्देश्य केवल प्रतिशोध लेना था।
मामला क्या था?
याचिकाकर्ता जयपुर के परिवहन विभाग में अधिवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे।
परिवहन विभाग के एक अधिकारी द्वारा याचिकाकर्ता अधिवक्ता को उनके दायित्व से बाहर का कार्य करने के लिए बाध्य किया गया, जो कि एक अधिवक्ता के कार्यक्षेत्र में नहीं आता था।
अधिवक्ता का आरोप है कि इसका विरोध करने पर न केवल उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया, बल्कि उनसे रिश्वत भी मांगी गई।
याचिकाकर्ता के अनुसार, 2 जून 2015 को उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया गया और उनसे लगभग 15,000 से 16,000 रुपये जबरन छीन लिए गए।
इस घटना के बाद अधिवक्ता ने खोनागोरियान थाने में FIR नंबर 285/2015 दर्ज करवाई, जिसमें संबंधित अधिकारी पर अवैध रूप से बंधक बनाने, मारपीट और चोरी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए।
इसके बाद, आरोप है कि संबंधित अधिकारी ने प्रतिशोध स्वरूप याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर नंबर 286/2015 दर्ज करवाई, जिसमें झूठे और अस्पष्ट आरोप लगाए गए।
अदालत में क्या हुआ?
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित निर्णय State of Haryana vs Bhajan Lal (1992) का हवाला दिया।
इस फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि किन परिस्थितियों में एफआईआर को रद्द किया जा सकता है।
सरकारी वकील याचिकाकर्ता के तर्कों का प्रभावी रूप से खंडन नहीं कर सके, वहीं प्रतिवादी अधिकारी की ओर से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ।
हाईकोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में याचिकाकर्ता की दलीलों और रिकॉर्ड पर सुनवाई के बाद पाया कि परिवहन अधिकारी द्वारा याचिकाकर्ता को ऐसा कार्य सौंपा गया, जो उनके दायित्व में नहीं आता था।
याचिकाकर्ता द्वारा विरोध करने पर उनके साथ दुर्व्यवहार और कथित रूप से रिश्वत की मांग की गई। याचिकाकर्ता द्वारा पहले दर्ज कराई गई एफआईआर के जवाब में दूसरी एफआईआर दर्ज की गई।
कोर्ट ने कहा कि दूसरी एफआईआर का उद्देश्य केवल प्रतिशोध लेना था।
अदालत ने माना कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अंतर्गत आता है, विशेष रूप से उस श्रेणी में जहां आपराधिक कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण तरीके से और निजी द्वेष के कारण शुरू की गई हो।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में भजन लाल केस के दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई एफआईआर स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण हो और उसमें किसी अपराध का प्रथम दृष्टया मामला न बनता हो, तो उसे रद्द किया जा सकता है।
विशेष रूप से, अदालत ने यह माना कि यह मामला उस श्रेणी में आता है जहां कार्यवाही “मालाफाइड इंटेंशन” से प्रेरित है और इसका उद्देश्य केवल प्रतिशोध लेना है।
अंतिम फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। यह एफआईआर न्यायसंगत नहीं है और इसे निरस्त किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने अधिवक्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए एफआईआर नंबर 286/2015 को पूरी तरह से खारिज कर दिया। साथ ही, इससे संबंधित सभी लंबित आवेदन भी समाप्त कर दिए गए।
