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14 साल बाद भी 309 निकायों में 23,820 सफाईकर्मी के पदों पर भर्ती नहीं, हाईकोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर किया जवाब तलब

Rajasthan High Court Seeks Reply from State Over 14-Year Delay in Safai Karmachari Recruitment

जयपुर। प्रदेशभर में 309 निकायों में 23,820 पदों पर पिछले 14 साल से नियुक्ति नहीं होने पर राजस्थान हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई।

मामला उन हजारों अभ्यर्थियों से भी जुड़ा है, जिन्हें भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद अब तक नियुक्ति नहीं मिल सकी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब मांगा है।

डॉ अभिनव शर्मा, अधिवक्ता राजस्थान हाईकोर्ट

जस्टिस रवि चिरानिया की एकलपीठ ने इंदरराज निदानिया सहित अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए सरकार से पूछा है कि जब कुछ चुनिंदा नगरीय निकायों में नियुक्तियां दी जा चुकी हैं, तो अन्य निकायों में अब तक नियुक्ति क्यों लंबित है। अदालत ने इस असमानता को गंभीर माना और स्पष्ट जवाब देने के निर्देश दिए हैं।

14 वर्षों से अटकी भर्ती प्रक्रिया

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता डॉ. अभिनव शर्मा ने अदालत को बताया कि वर्ष 2012 में निकाली गई सफाईकर्मी भर्ती प्रक्रिया को प्रशासनिक आदेश दिनांक 11 अगस्त 2014 के तहत निरस्त कर दिया गया था।

बाद में इस आदेश को वापस लेते हुए कुछ नगर निकायों—राजाखेड़ा (धौलपुर), कोटा, राजसमंद, टोंक और चूरू—में नियुक्तियां दे दी गईं। इसके अलावा अलवर नगर निगम में भी नियुक्ति प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

लेकिन सवाल यह है कि जब भर्ती प्रक्रिया को पुनर्जीवित किया जा चुका है और कुछ जगहों पर नियुक्तियां दी जा चुकी हैं, तो जयपुर नगर निगम सहित अन्य बड़े निकायों में अब तक नियुक्ति क्यों नहीं दी गई। यही मुद्दा याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष उठाया है।

राजधानी जयपुर में 4000 से अधिक पद खाली

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता डॉ. अभिनव शर्मा ने अदालत को बताया कि पूरे राज्य में करीब 23,820 सफाईकर्मियों के पद रिक्त हैं। इनमें से केवल जयपुर नगर निगम में ही 4,981 पद पिछले 14 वर्षों से खाली पड़े हैं। राजधानी में सफाई व्यवस्था की स्थिति खराब होती जा रही है, जिसका सीधा असर आम जनता के स्वास्थ्य और जीवन स्तर पर पड़ रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने इन पदों को भरने के बजाय विभिन्न समितियों का हवाला देकर भर्ती प्रक्रिया को लगातार टालने का प्रयास किया है। इससे समाज के सबसे कमजोर तबके—वाल्मीकि समाज—के युवाओं के साथ अन्याय हो रहा है।

इन पदों में से केवल जयपुर शहर में 4,981 पदों पर नियुक्ति नहीं हुई। इसी तरह अजमेर में 1,115, ब्यावर में 161, किशनगढ़ में 161, बीकानेर में 395, टोंक में 391, लाडनू में 127, भीलवाड़ा में 320, हनुमानगढ़ में 134, जोधपुर में 2,076, सीकर में 181, अलवर में 456, भिवाड़ी में 202, झुंझुनूं में 167, श्रीगंगानगर में 144, दौसा में 78, लालसोट में 34, बांदीकुई में 16, राजाखेड़ा में 113 पदों पर नियुक्ति नहीं हुई है।

वाल्मीकि समाज के साथ वादाखिलाफी का आरोप

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि वर्ष 2024 में वाल्मीकि समाज द्वारा हड़ताल किए जाने के बाद सरकार ने एक समझौता किया था, जिसमें जल्द नियुक्ति देने का आश्वासन दिया गया था।

लेकिन इसके विपरीत सरकार ने 2024-2025 में नई भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी, जिसे बाद में विरोध के चलते वापस लेना पड़ा।

इस घटनाक्रम को याचिकाकर्ताओं ने सरकार की “मनमानी और असंगत नीति” का उदाहरण बताया है। उनका कहना है कि सरकार पुराने अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने के बजाय नई भर्ती प्रक्रिया लाकर उन्हें दरकिनार करना चाहती है।

पूर्व आदेशों की अनदेखी

याचिका में पूर्व में दिए गए न्यायालय के आदेशों का भी हवाला दिया गया है। विशेष रूप से संजीव प्रकाश शर्मा द्वारा वर्ष 2017 में दिए गए आदेश का उल्लेख किया गया, जिसमें 2012 की भर्ती प्रक्रिया को तीन माह में पूर्ण करने के निर्देश दिए गए थे।

इसके बावजूद, इतने वर्षों बाद भी भर्ती प्रक्रिया अधूरी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक स्तर पर गंभीर लापरवाही बरती गई है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी हवाला

याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय Safai Karamchari Andolan vs Union of India का भी हवाला दिया। इस फैसले में मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने और प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए गए थे।

याचिका में कहा गया कि अधिकांश आवेदक पहले मैला ढोने का कार्य करते थे, जिसे कानून द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया है। ऐसे में उनके पुनर्वास और रोजगार के लिए सरकार की जिम्मेदारी बनती है। लेकिन राज्य सरकार ने इस दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाए हैं।

380 से अधिक याचिकाकर्ताओं की मांग

वर्तमान मामले में 380 से अधिक याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से गुहार लगाई है कि उन्हें भी अन्य नगर निकायों की तरह नियुक्ति दी जाए।

इन याचिकाकर्ताओं में जयपुर नगर निगम, राजगढ़ (अलवर), राजाखेड़ा नगरपालिका, ब्यावर सहित अन्य निकायों के अभ्यर्थी शामिल हैं।

याचिका में मांग की गई है कि जहां-जहां पद रिक्त हैं, वहां तत्काल प्रभाव से नियुक्तियां दी जाएं, ताकि वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे अभ्यर्थियों को न्याय मिल सके।

अलवर मामले में आंशिक राहत

अधिवक्ता डॉ. शर्मा ने बताया कि अलवर नगर निगम में नियुक्ति संबंधी आदेश 30 दिसंबर 2025 को जारी किए गए थे, लेकिन नियुक्ति नहीं मिलने पर याचिका दायर करनी पड़ी।

इसके बाद 9 जनवरी 2026 को निगम ने दस्तावेजों की समीक्षा शुरू कर दी और भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाई।

इस पर हाईकोर्ट ने अलवर के याचिकाकर्ताओं को यह छूट दी कि यदि उन्हें नियुक्ति नहीं मिलती है, तो वे पुनः याचिका दायर कर सकते हैं। फिलहाल, इस मामले में याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी गई है।

सरकार से मांगा स्पष्ट जवाब

राजस्थान हाईकोर्ट ने जयपुर नगर निगम सहित अन्य चार निकायों के मामलों में प्रमुख शासन सचिव, स्वायत्त शासन विभाग, निदेशक डीएलबी और संबंधित नगर निगम आयुक्तों को नोटिस जारी कर स्पष्ट जवाब मांगा है।

हाईकोर्ट ने पूछा है कि नियुक्ति नहीं देने के पीछे क्या कारण हैं और कब तक इस प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा।

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