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Arbitration Act पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अधिकार क्षेत्र पर आर्बिट्रेटर का निर्णय तुरंत चुनौती योग्य नहीं

Supreme Court: Arbitrator’s Jurisdiction Ruling Cannot Be Challenged Before Final Award
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेटर के अधिकार क्षेत्र को तुरंत चुनौती नहीं दी जा सकती, यह मुद्दा केवल अंतिम अवॉर्ड के बाद उठाया जा सकता है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आर्बिट्रेशन कानून को लेकर स्पष्टता देते हुए कहा है कि अगर आर्बिट्रेटर अपने अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर देता है, तो उस फैसले को तुरंत अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि ऐसी आपत्ति को केवल अंतिम आर्बिट्रेशन अवॉर्ड के बाद ही उठाया जा सकता है।

कोर्ट ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि मध्यस्थ (arbitrator) किसी पक्ष की अधिकार-क्षेत्र (jurisdiction) से जुड़ी आपत्ति को खारिज कर देता है, तो उसे तुरंत अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

क्या था पूरा विवाद?

यह मामला M/s. MCM Worldwide Private Limited vs M/s. Construction Industry Development Council से संबंधित है, जिसमें प्रतिवादी ने मध्यस्थ न्यायाधिकरण के अधिकार-क्षेत्र पर सवाल उठाया था। और आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी थी। उसका तर्क था कि ट्रिब्यूनल इस विवाद को सुनने के लिए अधिकृत नहीं है।

हालांकि, आर्बिट्रेटर ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि यह समयसीमा (limitation) के आधार पर स्वीकार्य नहीं है।

इसके बाद प्रतिवादी ने जिला अदालत में Section 34 के तहत इस आदेश को चुनौती दी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अपील स्वीकार कर ली गई और आर्बिट्रेटर के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया गया।

अपीलकर्ता का कहना था कि आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 16 स्पष्ट रूप से ट्रिब्यूनल को अपने अधिकार क्षेत्र पर फैसला लेने का अधिकार देती है।

वहीं प्रतिवादी का तर्क था कि अगर आर्बिट्रेटर का फैसला गलत है, तो उसे तुरंत चुनौती देने का अधिकार होना चाहिए, ताकि आगे की पूरी प्रक्रिया गलत आधार पर न चले।

SC ने किया स्पष्ट : पहले अवॉर्ड, फिर चुनौती

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे विवाद पर स्पष्ट करते हुए कहा कि आर्बिट्रेशन एक्ट की संरचना (framework) यह तय करती है कि प्रक्रिया के बीच में हस्तक्षेप न हो।

अदालत ने कहा कि अगर हर अंतरिम आदेश को अलग से चुनौती देने की अनुमति दी जाए, तो आर्बिट्रेशन की गति और उद्देश्य दोनों प्रभावित होंगे।

कोर्ट ने साफ किया कि Section 16 के तहत आर्बिट्रेटर को अपने अधिकार क्षेत्र पर फैसला करने का अधिकार है, और इस फैसले को तुरंत चुनौती नहीं दी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने जिला अदालत और हाईकोर्ट दोनों की कार्यवाही पर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि दोनों ही अदालतों ने इस मामले को सुनकर गलती की, क्योंकि Section 34 और 37 के तहत इस तरह की याचिका स्वीकार ही नहीं की जा सकती थी।

कोर्ट ने माना कि इस मामले में निचली अदालतों ने कानून के मूल प्रावधानों को नजरअंदाज किया।

आर्बिट्रेशन में सीमित हस्तक्षेप-SC

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी दोहराया कि आर्बिट्रेशन प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाए रखने के लिए अदालतों का हस्तक्षेप सीमित रखा गया है।

अदालत ने कहा कि अगर हर आदेश को चुनौती दी जाने लगे, तो आर्बिट्रेशन का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।

SC ने हाईकोर्ट का आदेश किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि प्रतिवादी द्वारा दायर Section 34 की याचिका ही स्वीकार्य नहीं थी।

कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी को यह अधिकार है कि वह आर्बिट्रेटर के फैसले को अंतिम अवॉर्ड के बाद चुनौती दे, लेकिन उससे पहले नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम निर्णय में कहा कि आर्बिट्रेटर द्वारा Section 16 के तहत अधिकार क्षेत्र से जुड़ी आपत्ति को खारिज करने के आदेश को Section 34 या Section 37 के तहत तुरंत चुनौती नहीं दी जा सकती।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी चुनौती केवल अंतिम आर्बिट्रेशन अवॉर्ड के खिलाफ दायर याचिका में ही उठाई जा सकती है।

‘बीच में नहीं रोकी जाएगी आर्बिट्रेशन प्रक्रिया’

इस फैसले से यह साफ हो गया है कि आर्बिट्रेशन के दौरान हर छोटे-बड़े आदेश को चुनौती देने की अनुमति नहीं होगी। यह निर्णय आर्बिट्रेशन को तेज और प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जिला अदालत और हाईकोर्ट दोनों ने इस मामले में कानून के प्रावधानों की अनदेखी करते हुए याचिकाओं को स्वीकार किया, जो सही नहीं था।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए अपील को स्वीकार कर लिया।

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