नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच को लेकर एक अहम टिप्पणी की है।
कोर्ट ने हेट स्पीच को संविधान के मूल मूल्य ‘बंधुत्व’ (Fraternity) के खिलाफ बताया है और कहा है कि यह समाज की एकता व नैतिक ढांचे को कमजोर करता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और संयम भी अनिवार्य हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी भाषा समाज की एकता और नैतिक ढांचे को कमजोर करती है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि संविधान केवल कानूनों से नहीं, बल्कि नागरिकों के आचरण और मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से जीवित रहता है। और हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह समाज में भाईचारे और सद्भाव को बढ़ावा दे।
सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंचा मामला ?
कोर्ट की टिप्पणी हेट स्पीच और नफरत फैलाने वाले भाषणों को लेकर दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई।
यह मामला 2020 के दौरान दिए गए कुछ कथित हेट स्पीच से जुड़ा था, जिनमें कुछ नेताओं के बयानों को लेकर गंभीर आपत्तियां उठाई गई थीं।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इन भाषणों ने समाज में तनाव और विभाजन को बढ़ावा दिया।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ FIR दर्ज करने और सख्त कार्रवाई की मांग की गई।
साथ ही, कोर्ट से यह भी अनुरोध किया गया कि हेट स्पीच को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
याचिकाओं में अदालत से सख्त दिशा-निर्देश और नए कानून बनाने की मांग की गई थी। साथ ही, 2020 दिल्ली दंगों से जुड़े कुछ भाषणों को लेकर भी आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह भी सवाल था कि क्या हेट स्पीच पर अतिरिक्त दिशा-निर्देश या नए कानून की जरूरत है।
कोर्ट का रुख: कानून मौजूद, नया ढांचा जरूरी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हेट स्पीच से निपटने के लिए देश में पहले से पर्याप्त कानूनी प्रावधान मौजूद हैं और इसमें कोई “विधायी कमी” (legislative vacuum) नहीं है।
अदालत ने नए अपराध बनाने या अतिरिक्त दिशानिर्देश जारी करने से इनकार करते हुए कहा कि यह निर्णय विधायिका (Parliament/State Legislatures) के दायरे में आता है।
आजादी के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी
कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन यह पूर्ण नहीं है।
अदालत ने टिप्पणी की कि विविधता से भरे समाज में बोले गए शब्दों का व्यापक प्रभाव पड़ता है, इसलिए सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
कोर्ट ने सभी नागरिकों और सार्वजनिक प्रतिनिधियों से अपील की कि वे अपने शब्दों के असर को समझें और जिम्मेदारी के साथ संवाद करें।
‘बंधुत्व’ और संविधान की बात
कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना (Preamble) का हवाला देते हुए कहा कि ”न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व-ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए मूल मूल्य हैं।”।
विशेष रूप से ‘बंधुत्व’ को समाज में एकता और सद्भाव बनाए रखने का आधार बताया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच की जड़ “हम बनाम वे” की मानसिकता में होती है, जो समाज में विभाजन और भेदभाव को बढ़ावा देती है।
अदालत ने चेतावनी दी कि जब तक यह सोच बनी रहेगी, तब तक संविधान में निहित ‘बंधुत्व’ का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भारतीय परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की पहचान विविधता में एकता रही है। अदालत ने कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषण इस मूल भावना के खिलाफ हैं और समाज को विभाजित करते हैं।
अंतिम फैसला: दिशा-निर्देश नहीं, जिम्मेदारी पर जोर
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 51A का हवाला देते हुए कहा कि हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह सभी लोगों के बीच सद्भाव और भाईचारे की भावना को बढ़ावा दे। अदालत ने कहा कि यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि हर नागरिक की है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में हेट स्पीच पर नए दिशा-निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया और कहा कि मौजूदा कानून पर्याप्त हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बदलती परिस्थितियों में अगर नए कानून की जरूरत हो, तो यह निर्णय विधायिका पर छोड़ा जाता है।
साथ ही, संबंधित मामले में आरोपित व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिका को भी खारिज कर दिया गया।
इस फैसले से यह संदेश गया है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और आपसी सम्मान से चलता है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि मौजूदा कानून इस तरह के मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं और नए दिशा-निर्देश जारी करने की आवश्यकता नहीं है।