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अब नहीं देना पड़ेगा मनमाना बिजली बिल का पैसा, ‘नो सर्विस, नो चार्ज’ पर लगी मुहर, सुप्रीम कोर्ट से उपभोक्ताओं को बड़ी राहत

Consumers Can’t Be Charged for Power Not Supplied: Supreme Court Gives Big Relief
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि बिना सेवा दिए उपभोक्ताओं से शुल्क नहीं वसूला जा सकता। “नो सर्विस, नो चार्ज” सिद्धांत को मान्यता देते हुए कोर्ट ने उपभोक्ता अधिकारों को मजबूत किया।

नई दिल्ली: देश के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए राहत भरी खबर आई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि उपभोक्ताओं से उस बिजली का खर्च नहीं वसूला जा सकता, जो उन्हें बिजली ही नहीं दे रहा है।

कोर्ट ने कहा कि अगर किसी समय अवधि में उपभोक्ताओं को बिजली सप्लाई नहीं मिली, तो उस अवधि के लिए उनसे किसी भी तरह का शुल्क लेना गलत है।

यह फैसला Justice Pamidighantam Sri Narasimha और Justice Alok Aradhe की बेंच ने दिया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा-
“उपभोक्ताओं को उस सेवा का भुगतान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उन्हें मिली ही नहीं।”

कोर्ट ने इस दौरान Appellate Tribunal for Electricity के फैसले को रद्द करते हुए नियामक आयोग के आदेश को बहाल कर दिया। यह फैसला आम लोगों के बिजली बिल पर सीधे असर डाल सकता है।

पूरा मामला: कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए लगा अस्थायी पावर प्लांट

पूरा विवाद दिल्ली में लगाए गए एक 108 मेगावाट गैस आधारित पावर प्लांट से जुड़ा है, जिसे 2010 Commonwealth Games के दौरान बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए स्थापित किया गया था।

इस प्लांट को Tata Power Delhi Distribution Limited ने तैयार किया था और शुरुआत से ही इसे अस्थायी परियोजना के रूप में देखा गया था।

कंपनी ने खुद दिल्ली विकास प्राधिकरण से केवल 5–6 साल के लिए जमीन मांगी थी, जिससे यह साफ था कि इसका संचालन सीमित अवधि के लिए ही होना था।

विवाद की जड़: 6 साल सप्लाई के बाद भी 15 साल का खर्च मांग

प्लांट ने मार्च 2018 तक ही बिजली सप्लाई की। इसके बाद सप्लाई बंद हो गई, लेकिन कंपनी ने पूरे 15 साल की तकनीकी उम्र के आधार पर डिप्रिसिएशन कॉस्ट वसूलने की मांग की।

यानी कंपनी चाहती थी कि उपभोक्ता उस अवधि का भी भुगतान करें, जब उन्हें बिजली मिली ही नहीं।

इस पर Delhi Electricity Regulatory Commission ने साफ रुख अपनाते हुए कहा कि केवल उसी अवधि का खर्च वसूला जा सकता है, जब बिजली दी गई, बाकी अवधि का बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जा सकता

इसी आधार पर आयोग ने करीब ₹83.34 करोड़ की रिकवरी मंजूर की और बाकी ₹94.59 करोड़ को खारिज कर दिया।

APTEL ने कंपनी को दी राहत, लेकिन SC ने पलटा फैसला

बाद में मामला Appellate Tribunal for Electricity पहुंचा, जहां ट्रिब्यूनल ने कंपनी के पक्ष में फैसला दिया और कहा कि प्लांट की 15 साल की तकनीकी उम्र के आधार पर पूरा डिप्रिसिएशन वसूला जा सकता है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि तकनीकी उम्र (useful life) का मतलब यह नहीं है कि कंपनी को हर हाल में पूरे समय का खर्च वसूलने का अधिकार मिल जाए,खासतौर पर तब, जब वह सेवा दे ही नहीं रही हो।

PPA एग्रीमेंट बना अहम आधार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) को अहम आधार माना।

कोर्ट ने कहा कि:

  • एग्रीमेंट के तहत कंपनी को केवल 6 साल तक ही बिजली सप्लाई करनी थी।
  • इसके बाद कंपनी एक “मर्चेंट जनरेटर” के रूप में कहीं भी बिजली बेच सकती थी।
  • प्लांट बेचने या बिजली अन्य जगह सप्लाई करने पर कोई रोक नहीं थी।

ऐसे में कंपनी उपभोक्ताओं से अतिरिक्त शुल्क नहीं ले सकती।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी नियम (जैसे टैरिफ रेगुलेशन) उपभोक्ताओं पर अनुचित बोझ डालने की अनुमति नहीं देता।

देशभर के उपभोक्ताओं के लिए अहम है फैसला

यह फैसला सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक मजबूत मिसाल बनेगा।

अब यह साफ हो गया है कि:

  • कंपनियां केवल दी गई सेवा का ही शुल्क ले सकती हैं।
  • तकनीकी आधार पर मनमानी वसूली नहीं की जा सकती।
  • उपभोक्ता हित सर्वोपरि रहेगा।

यह निर्णय बिजली क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

“नो सर्विस, नो चार्ज” सिद्धांत को मिली कानूनी मान्यता

अदालत ने अपने इस अहम फैसले में एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि उपभोक्ताओं से केवल उसी सेवा का शुल्क लिया जा सकता है, जो वास्तव में उन्हें प्रदान की गई हो।

बेंच ने साफ शब्दों में कहा कि बिजली सप्लाई बंद होने के बाद की अवधि का कोई भी खर्च उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जा सकता, भले ही प्लांट की तकनीकी उम्र अधिक क्यों न हो।

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि कंपनियां नियमों या तकनीकी आधार का हवाला देकर उपभोक्ताओं से अतिरिक्त वसूली नहीं कर सकतीं, खासकर तब जब सेवा दी ही नहीं गई हो।

इस फैसले के साथ अदालत ने न सिर्फ अपीलीय ट्रिब्यूनल के आदेश को खारिज किया, बल्कि यह सिद्धांत भी मजबूत किया कि “नो सर्विस, नो चार्ज” ही उपभोक्ता अधिकारों का मूल आधार है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक मजबूत संदेश देता है कि अगर सेवा नहीं दी गई, तो उसका पैसा भी नहीं लिया जा सकता। बिजली जैसे जरूरी सेक्टर में यह फैसला उपभोक्ताओं को न केवल राहत देता है, बल्कि भविष्य में होने वाले विवादों में भी उन्हें कानूनी मजबूती प्रदान करता है।

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