जयपुर। देश में वीआईपी कल्चर को कम करने और सार्वजनिक जीवन में सादगी अपनाने की प्रधानमंत्री Narendra Modi की अपील का असर अब न्यायपालिका में भी दिखाई देने लगा है।
राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश Justice Sanjeev Prakash Sharma ने एक महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक कदम उठाते हुए अपनी एस्कॉर्ट वाहन सुरक्षा छोड़ दी है।
इस निर्णय को न्यायपालिका में सादगी, संवेदनशीलता और सकारात्मक प्रशासनिक सोच का बड़ा संदेश माना जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने हाल ही में सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा के दौरान एस्कॉर्ट वाहन की आवश्यकता को समाप्त करने का निर्णय लिया।
बताया जा रहा है कि यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लगातार दिए जा रहे उस संदेश से प्रेरित है, जिसमें उन्होंने वीआईपी कल्चर को कम करने, अनावश्यक तामझाम से दूरी बनाने और जनसामान्य से जुड़ाव बढ़ाने पर जोर दिया है।
न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में इस कदम की व्यापक चर्चा हो रही है।
कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं और न्यायिक अधिकारियों ने इसे एक सकारात्मक और प्रेरणादायक पहल बताया है। उनका कहना है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा इस प्रकार की सादगीपूर्ण पहल समाज और प्रशासन दोनों के लिए एक मजबूत संदेश देती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायपालिका हमेशा से गरिमा, अनुशासन और संवेदनशीलता की प्रतीक रही है। ऐसे में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश का यह निर्णय यह दर्शाता है कि उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति भी साधारण जीवनशैली और जिम्मेदार प्रशासनिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता दे सकते हैं।
गौरतलब है कि Justice Sanjeev Prakash Sharma इससे पहले भी कई मानवीय और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर चर्चा में रहे हैं।
हाल ही में उन्होंने राजस्थान न्यायपालिका में 65 पति-पत्नी जजों सहित 130 न्यायाधीशों के तबादले इस प्रकार किए थे कि सभी दंपति जजों को एक ही स्थान पर पदस्थापित किया गया। इस निर्णय की भी न्यायिक जगत में व्यापक सराहना हुई थी।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट के इतिहास में पहली बार पति-पत्नी जज — Justice Pushpendra Singh Bhati और Justice Nupur Bhati — को एक ही बेंच में सुनवाई के लिए निर्धारित कर नई प्रशासनिक सोच का परिचय दिया था।

अब एस्कॉर्ट सुरक्षा छोड़ने का फैसला भी उसी श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसे केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि न्यायपालिका की ओर से समाज को दिया गया सादगी और जिम्मेदारी का संदेश माना जा रहा है।
प्रशासनिक और न्यायिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि यदि उच्च पदों पर बैठे अधिकारी स्वयं सादगी और न्यूनतम प्रोटोकॉल अपनाने की पहल करेंगे, तो इससे शासन व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है।