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जमीन अधिग्रहण में मुआवजा तय करने का नया नियम, रिहायशी जमीन की कीमत से नहीं होगा इंडस्ट्रियल जमीन का मूल्यांकन: सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court Rules Industrial Land Compensation Cannot Be Based on Residential Plot Rates

नई दिल्ली: जमीन अधिग्रहण से जुड़े मामलों में मुआवजा तय करने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि इंडस्ट्रियल (औद्योगिक) जमीन का मुआवजा तय करते समय रिहायशी (Residential) जमीन की कीमत को आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना कानून के प्रावधानों के खिलाफ है और इससे मुआवजा तय करने की पूरी प्रक्रिया गलत हो जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के तहत “समान प्रकार की जमीन” (similar type of land) का सिद्धांत अनिवार्य है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि जमीन का प्रकार अलग है, तो उसकी कीमत को आधार बनाकर मुआवजा तय करना असंवैधानिक और अवैध माना जाएगा।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह फैसला देते हुए कहा कि निचली अदालतों ने इस मामले में कानून के स्पष्ट प्रावधानों की अनदेखी की है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने कहा कि Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 की धारा 26(1)(b) के तहत मुआवजा तय करते समय समान प्रकृति की जमीनों की कीमतों को ही आधार बनाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“रिहायशी जमीन की बिक्री विलेख का इस्तेमाल इंडस्ट्रियल उपयोग वाली जमीन का बाजार मूल्य तय करने के लिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि दोनों जमीनें समान प्रकार की नहीं थीं।”

कोर्ट ने माना कि निचली अदालतों और आर्बिट्रेटर ने कानून की स्पष्ट शर्तों की अनदेखी की।

मामला किससे जुड़ा था?

मामला महाराष्ट्र के नागपुर में राष्ट्रीय राजमार्ग के फोर-लेन विस्तार परियोजना से जुड़ा था।

National Highways Act, 1956 के तहत 9 मई 2017 को अधिसूचना जारी कर 1,394 वर्ग मीटर जमीन अधिग्रहित की गई थी।

शुरुआत में डिप्टी कलेक्टर ने इस जमीन को कृषि/परती भूमि मानते हुए उसी गांव की कृषि जमीनों की बिक्री कीमत के आधार पर 161.63 रुपये प्रति वर्ग मीटर का मुआवजा तय किया।

लेकिन जमीन मालिक कंपनी Alfa Remidis Ltd. ने दावा किया कि जमीन का उपयोग औद्योगिक कार्य के लिए हो रहा था और वहां पैरासिटामोल दवा निर्माण यूनिट संचालित की जा रही थी।

मुआवजे को लेकर विवाद कैसे बढ़ा?

जमीन मालिक ने आर्बिट्रेटर के सामने अपनी बात रखते हुए यह दावा किया कि जमीन का वास्तविक उपयोग औद्योगिक था, इसलिए मुआवजा भी उसी आधार पर तय होना चाहिए।

इसके समर्थन में कंपनी ने दो अलग-अलग आधार दिए:

  • सरकार का Ready Reckoner Rate, जिसमें हाईवे से लगी जमीन का मूल्य 2,020 रुपये प्रति वर्ग मीटर था,
  • और पास के गांव की एक रिहायशी जमीन की बिक्री विलेख, जिसमें कीमत 3,588 रुपये प्रति वर्ग मीटर थी।

आर्बिट्रेटर ने 2021 में दिए गए आदेश में रिहायशी प्लॉट की बिक्री कीमत को आधार बनाते हुए मुआवजा 3,588 रुपये प्रति वर्ग मीटर तय कर दिया।

हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था फैसला

आर्बिट्रेटर के इस फैसले को जिला जज के सामने चुनौती दी गई, जहां इसे रद्द कर दिया गया। हालांकि, बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने आर्बिट्रेटर के फैसले को फिर से बहाल कर दिया।

यानी हाईकोर्ट ने रिहायशी जमीन की कीमत को आधार मानते हुए तय किए गए मुआवजे को सही ठहराया।

इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने इस फैसले को चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेटर और हाईकोर्ट दोनों ने धारा 26(1)(b) की अनिवार्य शर्तों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में निचली अदालतों की सोच और तरीके पर गंभीर आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत “समान प्रकार की जमीन” का सिद्धांत पूरी तरह अनिवार्य है, और इसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि इंडस्ट्रियल जमीन का मूल्यांकन, रिहायशी प्लॉट की कीमत के आधार पर नहीं किया जा सकता, क्योंकि दोनों की प्रकृति और उपयोग अलग हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून के तहत केवल एक बिक्री विलेख के आधार पर मुआवजा तय नहीं किया जा सकता।

”सिर्फ एक Sale Deed काफी नहीं”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजा तय करते समय केवल एक sale deed पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।

अदालत ने कहा कि धारा 26(1)(b) के तहत “average sale price” निकालने की प्रक्रिया में कई बिक्री विलेखों का विश्लेषण जरूरी होता है।

कोर्ट ने अपने पुराने फैसले Madhya Pradesh Road Development Corporation v. Vincent Daniel का हवाला देते हुए कहा कि एक अकेली डील भरोसेमंद बाजार मूल्य तय करने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने कितना तय किया मुआवजा?

अदालत ने अंततः कहा कि इस मामले में Ready Reckoner Rate ज्यादा उपयुक्त आधार था।

सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी को 2,020 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा देने का आदेश दिया। साथ ही अदालत ने कहा कि कंपनी को 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मिलने वाले सभी वैधानिक लाभ भी दिए जाएंगे।

इस तरह अदालत ने:

  • 161.63 रुपये प्रति वर्ग मीटर वाले शुरुआती रेट को बहुत कम माना।
  • लेकिन 3,588 रुपये प्रति वर्ग मीटर वाले रिहायशी प्लॉट रेट को भी गलत ठहराया।

देशभर के Land Acquisition मामलों पर पड़ेगा असर

कोर्ट का यह फैसला देशभर के भूमि अधिग्रहण मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

अक्सर मुआवजा बढ़ाने के लिए जमीन मालिक अलग प्रकृति वाली जमीनों की बिक्री कीमतों का हवाला देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अब साफ कर दिया है कि जमीन का उपयोग, प्रकृति, स्थान और श्रेणी समान होना जरूरी है।

यह फैसला केवल सरकारी एजेंसियों के लिए ही नहीं बल्कि जमीन मालिकों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ यह स्पष्ट किया कि बेहद कम मूल्यांकन स्वीकार नहीं किया जाएगा, वहीं दूसरी ओर यह भी कहा कि मुआवजा तय करने में कानून की प्रक्रिया और वस्तुनिष्ठ मानकों का पालन जरूरी है।

इस फैसले का इस्तेमाल भविष्य में जमीन अधिग्रहण से जुड़े मुआवजे के मामलों में किया जाएगा।

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