नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव करते हुए हाइब्रिड वर्क सिस्टम लागू करने का फैसला लिया है। सुप्रीम कोर्ट प्रशासन द्वारा जारी नए सर्कुलर के तहत अब मिसलेनियस दिनों और आंशिक कार्य दिवसों में मामलों की सुनवाई केवल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए की जाएगी।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री के कर्मचारियों को सीमित Work From Home यानी WFH की अनुमति भी दी गई है। अदालत ने कहा कि इन कदमों का उद्देश्य ईंधन की बचत, संसाधनों का बेहतर उपयोग और न्यायिक कार्यों को अधिक प्रभावी बनाना है।
नई व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है और इसे सुप्रीम कोर्ट के डिजिटल ट्रांजिशन के बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है।
‘अब सोमवार-शुक्रवार की सुनवाई ऑनलाइन’
सुप्रीम कोर्ट के सचिव जनरल भारत पाराशर द्वारा जारी सर्कुलर में कहा गया है कि सोमवार, शुक्रवार और अन्य घोषित मिसलेनियस दिनों में सूचीबद्ध मामलों की सुनवाई केवल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मोड में होगी।
कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक समय पर भेजे जाएं, तकनीकी सुविधाएं स्थिर रहें और किसी भी प्रकार की तकनीकी परेशानी से बचने के लिए समय पर सहायता उपलब्ध कराई जाए।
इस फैसले का सबसे ज्यादा असर उन वकीलों और पक्षकारों पर पड़ेगा, जो छोटी सुनवाई या तात्कालिक मामलों के लिए नियमित रूप से दिल्ली आते थे।
कार-पूलिंग को भी बढ़ावा
सुप्रीम कोर्ट ने ईंधन की बचत को लेकर भी एक नई पहल की घोषणा की है।
सर्कुलर में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से कार-पूलिंग व्यवस्था को प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया है, ताकि ईंधन का “optimum utilization” यानी बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
हालांकि, सर्कुलर में इस व्यवस्था का विस्तृत प्रारूप नहीं बताया गया, लेकिन इसे पर्यावरण और ऊर्जा बचत की दिशा में एक प्रतीकात्मक कदम माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट स्टाफ को भी मिली ‘वर्क फ्रॉम होम’ सुविधा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने प्रशासनिक स्टाफ के लिए भी लचीली कार्य प्रणाली लागू की है।
सर्कुलर के अनुसार, रजिस्ट्री की हर शाखा या सेक्शन में अधिकतम 50% कर्मचारियों को सप्ताह में दो दिन तक वर्क फ्रॉम होम की अनुमति दी जा सकती है।
हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि बाकी कर्मचारी दफ्तर में मौजूद रहेंगे ताकि कोर्ट का कामकाज बाधित न हो।
WFH कर्मचारियों पर क्या होंगी शर्तें?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि वर्क फ्रॉम होम की अनुमति मिलने का मतलब पूरी तरह स्वतंत्रता नहीं होगा।
- घर से काम करने वाले कर्मचारियों को हर समय फोन पर उपलब्ध रहना होगा।
- जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्यालय पहुंचने के लिए तैयार रहना होगा।
- संबंधित अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि सभी सौंपे गए कार्य समय पर पूरे हों।
- यदि किसी शाखा में WFH व्यवस्था प्रभावी नहीं पाई जाती, तो संबंधित रजिस्ट्रार उसे सीमित या संशोधित कर सकेंगे।
रजिस्ट्रार को दिए गए विशेष अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी शाखा या सेक्शन में वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था प्रभावी नहीं पाई जाती, तो संबंधित रजिस्ट्रार उसे सीमित या संशोधित कर सकते हैं।
अर्थात, हर विभाग की जरूरत और काम की प्रकृति के अनुसार WFH व्यवस्था में बदलाव संभव होगा।
‘कोर्ट सिस्टम में डिजिटल बदलाव का नया चरण’
शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू हुई वर्चुअल सुनवाई व्यवस्था अब स्थायी प्रशासनिक मॉडल का रूप लेती दिख रही है।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी हाइब्रिड सुनवाई व्यवस्था को जारी रख चुका है, लेकिन अब पहली बार इसे प्रशासनिक सर्कुलर के जरिए संरचित तरीके से लागू किया गया है।
वकीलों और पक्षकारों पर क्या असर पड़ेगा?
इस फैसले से बाहर राज्यों से आने वाले वकीलों और litigants को राहत मिल सकती है, क्योंकि छोटी और प्रक्रियात्मक सुनवाई के लिए अब दिल्ली आने की जरूरत कम होगी।
दूसरी ओर, कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मानना है कि वर्चुअल सुनवाई में कोर्ट रूम जैसी प्रभावशीलता और संवाद की कमी महसूस होती है।
तत्काल प्रभाव से लागू होंगे नए नियम
सुप्रीम कोर्ट ने अपने सर्कुलर में स्पष्ट किया है कि ये सभी निर्देश तत्काल प्रभाव से लागू होंगे।
साथ ही यह भी कहा गया है कि आगे की परिस्थितियों और प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार इन व्यवस्थाओं में बदलाव किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि इन कदमों का उद्देश्य संसाधनों का बेहतर उपयोग, ईंधन बचत और न्यायिक कार्यों की निर्बाध निरंतरता सुनिश्चित करना है।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि भविष्य की जरूरत, तकनीकी अनुभव और प्रशासनिक परिस्थितियों के आधार पर इन नियमों में बदलाव किए जा सकते हैं।
फिलहाल इसे भारतीय न्यायपालिका के “digital governance transition” की दिशा में एक बड़े प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है।