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भ्रष्टाचार में दोषी कर्मचारी को भी सुनवाई का अधिकार, बिना सुनवाई पूरी पेंशन बंद नहीं कर सकते : राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Quashes RSRTC Order Stopping Pension Without Hearing in Corruption Case

राजस्थान हाईकोर्ट ने RSRTC का आदेश रद्द करते हुए लगाई फटकार, “बिना सुनवाई पूरी पेंशन रोकना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ”

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी कर्मचारी को बिना सुनवाई का अवसर दिए उसकी पूरी पेंशन स्थायी रूप से रोकना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (RSRTC) के एक पूर्व कर्मचारी की पेंशन स्थायी रूप से रोकने के आदेश को रद्द करते हुए निगम प्रशासन को नए सिरे से निर्णय करने का आदेश दिया है।

यह फैसला Justice Anand Sharma ने RSRTC के पूर्व कर्मचारी रामजीलाल जांगिड़ की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

याचिकाकर्ता की पेंशन भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषसिद्धि के बाद निगम प्रशासन ने स्थायी रूप से रोक दी थी।

हालांकि अदालत ने माना कि दोषसिद्धि अपने आप में गंभीर मामला है, लेकिन किसी भी कर्मचारी को दंड देने से पहले उचित प्रक्रिया और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।

क्या था पूरा मामला

याचिकाकर्ता रामजीलाल जांगिड़ RSRTC में ऑफिस असिस्टेंट के पद पर कार्यरत थे।

वर्ष 2018 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एक मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया और तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

इसके बाद RSRTC प्रशासन ने 31 जनवरी 2019 को आदेश जारी कर उनकी पेंशन रोक दी। बाद में इस आदेश को तकनीकी आधार पर चुनौती दी गई, क्योंकि आदेश जारी करने वाले अधिकारी सक्षम प्राधिकारी नहीं थे।

इसके बाद निगम के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक ने 28 अप्रैल 2021 को नया आदेश जारी करते हुए पेंशन स्थायी रूप से रोकने का निर्णय लिया।

याचिकाकर्ता ने इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि उन्हें न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर प्रदान किया गया।

याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ता रामजीलाल जांगिड़ की ओर से अधिवक्ता अंशुमान सक्सेना ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि वे RSRTC में ऑफिस असिस्टेंट के पद पर कार्यरत थे और सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें नियमित रूप से पेंशन मिल रही थी।

वर्ष 2018 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषसिद्धि होने के बाद निगम प्रशासन ने उनकी पूरी पेंशन स्थायी रूप से रोक दी।

अधिवक्ता अंशुमान सक्सेना ने तर्क दिया कि पेंशन रोकने का आदेश पूरी तरह से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है, क्योंकि आदेश जारी करने से पहले न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई का अवसर प्रदान किया गया।

उन्होंने अदालत को बताया कि पेंशन विनियम, 1989 के विनियम-4 के तहत प्राधिकरण के पास कई विकल्प उपलब्ध थे — जैसे आंशिक पेंशन रोकना, सीमित अवधि के लिए रोकना या अन्य कम कठोर दंड देना। लेकिन बिना किसी कारण बताए सीधे सबसे कठोर दंड लागू कर दिया गया।

अधिवक्ता अंशुमान सक्सेना ने यह भी कहा कि आदेश में कहीं यह उल्लेख नहीं है कि सक्षम प्राधिकारी ने मामले के तथ्यों, सेवा अवधि, परिस्थितियों या कम कठोर दंड की संभावना पर विचार किया हो। इसलिए यह आदेश “नॉन-एप्लिकेशन ऑफ माइंड” यानी बिना उचित विचार के पारित किया गया आदेश है।

साथ ही यह भी दलील दी गई कि पेंशन कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है और इसे बिना उचित प्रक्रिया अपनाए छीना नहीं जा सकता।

RSRTC का जवाब

RSRTC की ओर से अदालत में कहा गया कि याचिकाकर्ता भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी पाए गए हैं और उन्हें तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है।

ऐसे में निगम प्रशासन के पास पेंशन रोकने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

प्रतिवादी पक्ष ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार जैसे अपराध सरकारी सेवा में गंभीर कदाचार की श्रेणी में आते हैं।

इसलिए पेंशन विनियम, 1989 के तहत सक्षम प्राधिकारी को पूरी पेंशन स्थायी रूप से रोकने का अधिकार प्राप्त है।

निगम की ओर से यह भी कहा गया कि दोषसिद्धि के बाद प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को लागू करने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि अपराध न्यायालय द्वारा सिद्ध किया जा चुका था।

प्रतिवादी पक्ष ने अदालत से कहा कि 28 अप्रैल 2021 का आदेश नियमों के अनुसार और सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित किया गया था, इसलिए इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

हालांकि हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि दोषसिद्धि गंभीर मामला जरूर है, लेकिन इसके बावजूद किसी कर्मचारी को सबसे कठोर दंड देने से पहले उचित प्रक्रिया और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम कर्मचारी पेंशन विनियम, 1989 की विनियम-4 के तहत प्राधिकरण को पेंशन रोकने का अधिकार जरूर है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है।

जस्टिस आनंद शर्मा की अदालत ने कहा कि कानून प्राधिकरण को पूर्ण पेंशन रोकने, आंशिक पेंशन रोकने या निश्चित अवधि के लिए पेंशन रोकने जैसे कई विकल्प देता है। ऐसे में किसी भी मामले में सबसे कठोर दंड देने से पहले संबंधित तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करना आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल दोषसिद्धि का उल्लेख कर पूरी पेंशन रोक देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। आदेश में यह बताना आवश्यक है कि प्राधिकरण ने किन तथ्यों, परिस्थितियों और कारणों के आधार पर सबसे कठोर दंड चुना। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक आदेश “स्पीकिंग ऑर्डर” होना चाहिए, जिसमें निर्णय के पीछे की सोच स्पष्ट दिखाई दे।

प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर जोर

हाईकोर्ट ने कहा कि पेंशन किसी कर्मचारी को लंबे समय की सेवा के बाद मिलने वाला वैधानिक अधिकार है।

इसे बिना उचित प्रक्रिया के छीना नहीं जा सकता।

अदालत ने माना कि यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ गंभीर आरोप सिद्ध भी हो जाएं, तब भी उसे अपनी परिस्थितियां और पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि “सुनवाई का अवसर” केवल औपचारिकता नहीं बल्कि निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया का मूल हिस्सा है।

याचिकाकर्ता को न तो कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही कोई व्यक्तिगत सुनवाई प्रदान की गई। इस कारण आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत माना गया।

पहले भी डिवीजन बेंच दे चुकी थी राहत

मामले में पहले भी डिवीजन बेंच ने हस्तक्षेप किया था। प्रारंभिक याचिका समयसीमा के आधार पर खारिज होने के बाद याचिकाकर्ता ने विशेष अपील दायर की थी। डिवीजन बेंच ने 6 अप्रैल 2022 को आदेश पारित करते हुए कहा था कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत इस मामले में लागू होंगे और मामले को पुनः सुनवाई के लिए भेजा था।

अब एकलपीठ ने विस्तृत सुनवाई के बाद RSRTC के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि प्रशासन ने यह नहीं बताया कि कम कठोर दंड देने की संभावना पर क्यों विचार नहीं किया गया। आदेश में न तो कर्मचारी की सेवा अवधि, न उसकी परिस्थितियों और न ही अन्य प्रासंगिक तथ्यों का उल्लेख था।

हाईकोर्ट ने दिए ये निर्देश

हाईकोर्ट ने RSRTC के 28 अप्रैल 2021 के आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनः सक्षम प्राधिकारी के पास भेज दिया।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि नया आदेश पारित करने से पहले कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस दिया जाए, उचित सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाए और उसके बाद नियमों के अनुसार कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि तीन माह के भीतर नया आदेश पारित नहीं किया जाता है तो याचिकाकर्ता की पेंशन और बकाया राशि कानून के अनुसार बहाल की जाए।

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