नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने चंबल अभयारण्य में जारी अवैध रेत खनन को लेकर राजस्थान सरकार पर बेहद सख्त रुख अपनाया है।
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने पहले दिए गए निर्देशों का गंभीरता से पालन नहीं किया और प्रशासनिक मशीनरी का रवैया “बेहद लापरवाह और निष्क्रिय” दिखाई देता है। जिससे अदालत नाराज़ है। यही वजह है कि अब कई वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने के आदेश दिए गए हैं।
अदालत ने राजस्थान सरकार के गृह, खनन, वित्त, वन एवं पर्यावरण और परिवहन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है। साथ ही विस्तृत compliance affidavit दाखिल करने को भी कहा गया है।
जस्टिस Vikram Nath और जस्टिस Sandeep Mehta की बेंच ने कहा कि चंबल क्षेत्र में हो रहा अवैध खनन अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह कानून व्यवस्था और वन्यजीव संरक्षण के लिए गंभीर खतरा बन चुका है।
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी की असल वजह
यह मामला National Chambal Gharial Sanctuary में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध रेत खनन से जुड़ा है। यह अभयारण्य घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन और कई दुर्लभ जलजीव प्रजातियों का महत्वपूर्ण आवास माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2026 में राज्यों को कई सख्त निर्देश दिए थे। अदालत ने CCTV निगरानी, GPS ट्रैकिंग, संयुक्त पेट्रोलिंग और अवैध खनन में इस्तेमाल वाहनों की जब्ती जैसे कदम उठाने को कहा था। लेकिन ताजा सुनवाई में कोर्ट को बताया गया कि राजस्थान सरकार ने compliance affidavit तक दाखिल नहीं किया।
अदालत ने कहा कि बार-बार आदेशों के बावजूद राज्य सरकार की तरफ से गंभीरता नहीं दिखाई गई।
‘राजस्थान सरकार का रवैया चौंकाने वाला‘
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार के रवैये पर तीखी टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि पर्यावरणीय विनाश और संरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर मुद्दों के बावजूद राज्य सरकार का रवैया “casual, indifferent and indolent” यानी बेहद उदासीन और सुस्त रहा।
कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक मशीनरी की निष्क्रियता यह दिखाती है कि अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई को लेकर इच्छाशक्ति की कमी है।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य का रवैया “लापरवाह और उदासीन” रहा है। कोर्ट ने माना कि:
- आदेशों के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए।
- समय पर रिपोर्ट तक दाखिल नहीं की गई।
- पर्यावरण और कानून दोनों की अनदेखी हुई।
यह स्थिति न्याय व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
40 जगह चिन्हित, लेकिन सिर्फ 1 CCTV: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई में Central Empowered Committee की रिपोर्ट भी पेश की गई। रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में 40 संवेदनशील स्थानों की पहचान की गई थी, लेकिन वहां केवल एक CCTV कैमरा लगाया गया।
कोर्ट को बताया गया कि:
- कोई प्रभावी कंट्रोल रूम नहीं बनाया गया।
- लाइव मॉनिटरिंग शुरू नहीं हुई।
- GPS ट्रैकिंग लागू नहीं की गई।
- संयुक्त पेट्रोलिंग व्यवस्था अभी भी पूरी तरह लागू नहीं हो सकी।
सुप्रीम कोर्ट ने इसे “administrative apathy” यानी प्रशासनिक उदासीनता बताया।
NHAI भी आया घेरे में
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) को भी इस केस में शामिल कर लिया है।
दरअसल, अदालत को बताया गया कि मुरैना-धौलपुर सीमा पर नेशनल हाईवे-44 पर पुल के पास और यहां तक कि उसके नीचे भी अवैध खनन हो रहा है, जो बेहद खतरनाक है। कोर्ट ने चिंता जताई कि लगातार खनन से पुल की संरचनात्मक सुरक्षा को खतरा हो सकता है। अब NHAI को यह बताना होगा कि इस पुल की सुरक्षा के लिए उसने क्या कदम उठाए हैं।
बिना नंबर वाले ट्रैक्टर-ट्रॉली पर भी कोर्ट सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने बिना नंबर वाले ट्रैक्टर-ट्रॉली के इस्तेमाल पर भी गंभीर सवाल उठाए।
अदालत ने कहा कि बड़ी संख्या में बिना पंजीकरण वाले वाहन खुलेआम अवैध खनन और परिवहन में लगे हैं, जो मोटर व्हीकल कानूनों का स्पष्ट उल्लंघन है।
इसी मुद्दे पर अदालत ने मध्य प्रदेश परिवहन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को भी जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
“सिर्फ ड्राइवर पकड़ने से काम नहीं चलेगा”
सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर भी नाराजगी जताई।
अदालत ने कहा कि अधिकतर मामलों में केवल वाहन चालकों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, जबकि अवैध खनन को संगठित तरीके से चलाने वाले असली लोग जांच से बाहर हैं।
कोर्ट ने कहा कि इससे प्रशासनिक और प्रवर्तन एजेंसियों की संभावित मिलीभगत को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
अदालत ने यह भी नोट किया कि अवैध खनन रोकने की कोशिश के दौरान कई अधिकारियों पर हमले हुए हैं और कुछ मामलों में जान तक गई है।
पर्यावरण और कानून व्यवस्था दोनों पर खतरा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चंबल क्षेत्र में अवैध खनन का असर केवल नदी या पर्यावरण तक सीमित नहीं है।
अदालत ने माना कि:
- वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है।
- नदी की पारिस्थितिकी प्रभावित हो रही है।
- संगठित अवैध खनन कानून व्यवस्था के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारों की जिम्मेदारी केवल कागजी आदेश जारी करने तक सीमित नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट के बड़े आदेश
सुनवाई के बाद अदालत ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए:
- राजस्थान के वरिष्ठ अफसरों को व्यक्तिगत उपस्थिति का आदेश।
- विस्तृत compliance affidavit दाखिल करने का निर्देश।
- मध्य प्रदेश परिवहन विभाग को कार्रवाई रिपोर्ट देने का आदेश।
- NHAI को पक्षकार बनाना।
- अवैध खनन की निगरानी मजबूत करने पर जवाब मांगा।
अब जवाबदेही तय होगी
कोर्ट ने राजस्थान के कई टॉप अधिकारियों को अगली सुनवाई (20 मई 2026) पर पेश होने को कहा है। इनमें अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और खनन, वित्त, वन और परिवहन विभाग के प्रमुख सचिव शामिल हैं।
इन सभी अधिकारियों को कोर्ट में अपनी-अपनी रिपोर्ट (कम्प्लायंस एफिडेविट) भी दाखिल करनी होगी, जिसमें बताया जाएगा कि अब तक क्या कार्रवाई की गई है।
सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख से साफ है कि अब अवैध खनन को लेकर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी और देशभर में चल रहे अवैध रेत खनन मामलों पर बड़ा असर पड़ सकता है।
वरिष्ठ अधिकारियों की पेशी और NHAI को शामिल करने से यह मामला और गंभीर हो गया है।अब अगली सुनवाई में यह तय होगा कि जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होती है और क्या वाकई जमीन पर बदलाव आता है।
यह मामला अब पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ प्रशासनिक जवाबदेही और संगठित अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई का बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनता दिख रहा है।