नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून यानी UAPA मामलों में बेल को लेकर बड़ा और देशभर पर असर डालने वाला फैसला सुनाया है।
अदालत ने साफ कहा है कि “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत UAPA जैसे सख्त कानूनों में भी लागू होगा और बेल पर लगी वैधानिक पाबंदियां संविधान के Article 21 और 22 से ऊपर नहीं हो सकतीं।
जस्टिस Ujjal Bhuyan और जस्टिस BV Nagarathna की बेंच ने कहा कि बेल केवल CrPC से निकला कानूनी सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निर्दोषता की धारणा से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला जम्मू-कश्मीर के एक व्यक्ति को बेल देते हुए सुनाया, जिस पर NIA ने narco-terror case में UAPA के तहत मामला दर्ज किया था।
”बेल इज द रूल” सिर्फ नारा नहीं”
फैसला सुनाते हुए जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि “bail is the rule and jail is the exception” केवल एक सामान्य कानूनी लाइन नहीं है।
अदालत ने कहा:
“यह सिद्धांत संविधान के Article 21 और 22 से निकलता है और निर्दोषता की धारणा किसी भी सभ्य कानून-शासित समाज की आधारशिला है।”
कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को केवल इसलिए अनिश्चितकाल तक नहीं छीना जा सकता क्योंकि उस पर UAPA जैसा कानून लगाया गया है।
UAPA की पाबंदियां भी संविधान से ऊपर नहीं: SC
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि UAPA जैसे कानून राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में बेल पर कड़े प्रतिबंध लगा सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संवैधानिक ढांचा उलट दिया जाए।
अदालत ने कहा कि UAPA की धारा 43D(5) के तहत बेल पर लगी पाबंदी “सीमित” तरीके से लागू होनी चाहिए और यह Article 21 तथा 22 के अधीन रहेगी।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा:
“हम बिना किसी संदेह के कहते हैं कि UAPA में भी बेल नियम है और जेल अपवाद।”
आखिर मामला क्या था
यह मामला जम्मू-कश्मीर के एक व्यक्ति से जुड़ा था, जिस पर NIA ने narco-terror case में UAPA के तहत कार्रवाई की थी।
आरोपी की ओर से कहा गया था कि लंबे समय तक जेल में रखने के बावजूद ट्रायल आगे नहीं बढ़ रहा और बेल पर लगी कानूनी पाबंदियों का इस्तेमाल उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने UAPA मामलों में बेल की कानूनी स्थिति पर विस्तृत टिप्पणी की।
KA Najeeb फैसले को फिर किया मजबूत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले Union of India v. KA Najeeb का भी हवाला दिया।
कोर्ट ने कहा कि KA Najeeb फैसले में पहले ही स्पष्ट किया जा चुका था कि UAPA की धारा 43D(5) को बेल खारिज करने का “एकमात्र आधार” नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब speedy trial का अधिकार प्रभावित हो रहा हो।
अदालत ने कहा कि बाद में आई कुछ दो-जज बेंचों के फैसलों से भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी। इसलिए कानूनी स्थिति को फिर स्पष्ट करना जरूरी हो गया था।
उमर खालिद और शरजील इमाम केस पर भी टिप्पणी
फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने Umar Khalid और Sharjeel Imam को बेल देने से इनकार करने वाले फैसले के कुछ हिस्सों पर भी गंभीर टिप्पणी की।
अदालत ने खास तौर पर उस निर्देश पर सवाल उठाए जिसमें आरोपियों को एक साल तक दोबारा बेल मांगने से प्रभावी रूप से रोका गया था।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को सीधे रद्द नहीं किया, लेकिन यह साफ संकेत दिया कि बेल से जुड़े मामलों में संवैधानिक स्वतंत्रता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
NCRB आंकड़ों का भी दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में NCRB के आंकड़ों का भी जिक्र किया, जिन्हें केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद में रखा था।
अदालत ने कहा कि 2019 से 2023 के बीच देशभर में UAPA मामलों में conviction rate केवल 1.5% से 4% के बीच रहा। वहीं जम्मू-कश्मीर में यह दर 1% से भी कम थी।
कोर्ट ने कहा कि इतने कम conviction rate यह दिखाते हैं कि लंबी अवधि तक बेल न देना और ट्रायल लंबा खींचना गंभीर संवैधानिक सवाल पैदा करता है।
अदालत ने कहा कि यही “एक और बड़ा कारण” है कि KA Najeeb सिद्धांत का पालन किया जाए।
”Speedy Trial भी मौलिक अधिकार”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को वर्षों तक ट्रायल के इंतजार में जेल में रखना संविधान के खिलाफ हो सकता है।
कोर्ट ने कहा कि Article 21 के तहत speedy trial यानी त्वरित सुनवाई भी मौलिक अधिकार है। यदि ट्रायल समय पर पूरा नहीं हो रहा, तो अदालतों को बेल पर गंभीरता से विचार करना होगा।
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि UAPA मामलों में अक्सर ट्रायल लंबे समय तक चलते हैं और आरोपी कई-कई साल जेल में रहते हैं।
देशभर के UAPA मामलों पर फैसले का असर
यह फैसला UAPA और अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों से जुड़े मामलों में बड़ी कानूनी मिसाल बनेगा।
अब निचली अदालतों और हाईकोर्ट्स को यह ध्यान रखना होगा कि बेल पर लगी पाबंदियां पूर्ण नहीं हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि संवैधानिक मूल्य है और ट्रायल में देरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह फैसला उन आरोपियों के लिए राहत का आधार बन सकता है जो लंबे समय से ट्रायल लंबित होने के बावजूद जेल में हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ संकेत दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि कठोर कानूनों का उद्देश्य संविधान द्वारा गारंटीकृत स्वतंत्रता को खत्म करना नहीं हो सकता।
यह फैसला आने वाले समय में UAPA बेल मामलों में सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक निर्णयों में से एक माना जा सकता है।