नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश की जेलों में वर्षों से लंबित पड़े समयपूर्व रिहाई (प्रीमैच्योर रिलीज) के मामलों और पात्र कैदियों की समय से पहले रिहाई की प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने के लिए एक अहम पहल की है।
राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) ने देशभर में कैदियों की समयपूर्व रिहाई की प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने के लिए “E-Prisons Early Release Processing Module” (ई-प्रिजन अर्ली रिलीज प्रोसेसिंग मॉड्यूल) नाम का विशेष सॉफ्टवेयर लॉन्च कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस डिजिटल प्रणाली के शुरू होने पर संतोष व्यक्त करते हुए उस मामले की कार्यवाही औपचारिक रूप से समाप्त कर दी, जिसके कारण इस सॉफ्टवेयर के विकास का रास्ता खुला था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जे.के. माहेश्वरी, जस्टिस पंकज मिथल, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि अब इस प्रणाली को लागू करने की जिम्मेदारी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों, जेल विभागों और राज्य सरकार की अन्य संबंधित एजेंसियों को सौंप दी गई है।
कोर्ट ने कहा कि सॉफ्टवेयर विकसित हो चुका है और देशभर में लागू किए जाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, इसलिए मामले में आगे कार्यवाही जारी रखने की आवश्यकता नहीं रह गई है।
हत्या के एक मामले से शुरू हुई थी बड़ी न्यायिक पहल
इस महत्वपूर्ण व्यवस्था की शुरुआत एक हत्या के मामले की सुनवाई के दौरान हुई।
मामला उत्तर प्रदेश के सुरेंद्र उर्फ सुंडा नामक व्यक्ति से जुड़ा था, जिसे हत्या के मामले में दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा दी गई थी। सुरेंद्र उर्फ सुंडा ने अपनी सजा और दोषसिद्धि के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट का ध्यान केवल आरोपी की अपील तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अदालत ने व्यापक स्तर पर यह जांचना शुरू किया कि देश की जेलों में ऐसे कितने कैदी हैं जो समयपूर्व रिहाई के पात्र होने के बावजूद वर्षों से प्रशासनिक प्रक्रियाओं में फंसे हुए हैं।
जांच के दौरान सामने आया कि बड़ी संख्या में पात्र कैदियों के मामले विभिन्न स्तरों पर लंबित पड़े हैं। कहीं फाइलें जेल प्रशासन में अटकी हैं, कहीं जिला प्रशासन में और कहीं राज्य सरकार के स्तर पर।
अदालत ने पाया कि पूरी प्रक्रिया अभी भी कागजी फाइलों पर आधारित है, जिसके कारण अनावश्यक देरी हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी गंभीर चिंता
13 अप्रैल 2026 को जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था।
अदालत ने कहा था कि समयपूर्व रिहाई के मामलों में एक समान, पारदर्शी और स्वचालित व्यवस्था की आवश्यकता है।
कोर्ट ने माना कि यदि कोई कैदी कानून के अनुसार रिहाई के लिए पात्र हो चुका है, तो केवल प्रशासनिक देरी के कारण उसे जेल में बनाए रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि इन मामलों में देरी का एक बड़ा कारण पारंपरिक (physical) फाइलों पर निर्भरता है। फाइलें अलग-अलग विभागों के बीच घूमती रहती हैं, जिससे प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
इसके अलावा, विभिन्न स्तरों पर समन्वय की कमी और मैन्युअल प्रक्रिया के कारण भी कई बार मामलों का समय पर निपटारा नहीं हो पाता।
कोर्ट ने इसे गंभीर समस्या मानते हुए कहा कि इससे कैदियों के अधिकार प्रभावित होते हैं और न्याय में देरी होती है।
कोर्ट के निर्देश और सॉफ्टवेयर का विकास
13 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा था कि पूरे देश में कैदियों की समय से पहले रिहाई के मामलों के लिए एक समान और स्वचालित प्रणाली विकसित की जाए।
इसके लिए नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) को निर्देश दिया गया कि वह एक ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार करे, जो इस पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बना सके।
कोर्ट के निर्देशों के बाद NIC ने विभिन्न संबंधित पक्षों के साथ मिलकर इस सॉफ्टवेयर को विकसित किया।
सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला और कार्यवाही का समापन
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच-जिसमें मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जे.के. महेश्वरी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे-ने इस मामले पर अंतिम आदेश पारित किया।
कोर्ट ने कहा कि अब जब “E-Prisons Early Release Processing Module” लॉन्च हो चुका है और इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (State Legal Services Authority) को सौंप दी गई है, तो इस मामले में आगे सुनवाई की आवश्यकता नहीं है।
इस आधार पर कोर्ट ने औपचारिक रूप से कार्यवाही बंद कर दी और अपील का निपटारा कर दिया।
क्या करेगा नया ‘ई-प्रिजन’ सॉफ्टवेयर?
एनआईसी द्वारा विकसित “ई-प्रिजन अर्ली रिलीज प्रोसेसिंग मॉड्यूल” मौजूदा ई-प्रिजन प्लेटफॉर्म का हिस्सा है।
इसका सबसे बड़ा उद्देश्य उन कैदियों की पहचान करना है जो समयपूर्व रिहाई के लिए पात्र हो चुके हैं लेकिन जिनके मामले विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर लंबित हैं।
सॉफ्टवेयर स्वतः यह पता लगाएगा कि कौन-सा कैदी निर्धारित कानूनी शर्तें पूरी कर चुका है। इसके बाद उसका मामला डिजिटल तरीके से संबंधित अधिकारियों तक पहुंचेगा।
सिस्टम यह भी रिकॉर्ड रखेगा कि फाइल किस अधिकारी के पास है और कितने समय से लंबित है।
यानी अब किसी मामले के महीनों या वर्षों तक दबे रहने की संभावना काफी कम हो जाएगी।
पात्र कैदियों की पहचान होगी खुद
अब तक जेल अधिकारियों को मैन्युअल तरीके से रिकॉर्ड खंगालकर यह देखना पड़ता था कि कौन-सा कैदी समयपूर्व रिहाई की शर्तें पूरी कर चुका है।
इस प्रक्रिया में अक्सर देरी होती थी और कई बार पात्र कैदी भी लंबे समय तक जेल में बने रहते थे।
नए सॉफ्टवेयर के जरिए यह प्रक्रिया स्वतः संचालित होगी। जैसे ही कोई कैदी आवश्यक अवधि पूरी करेगा या उसकी पात्रता बनेगी, सिस्टम उसके मामले को चिन्हित कर देगा। इसके बाद संबंधित अधिकारियों को कार्रवाई के लिए सूचना भी मिलेगी।
इससे हजारों कैदियों के मामलों के निस्तारण में तेजी आएगी।
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राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण निभाएंगे अहम भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को दी गई है। ये प्राधिकरण जेल प्रशासन, जिला प्रशासन और राज्य सरकार के अन्य विभागों के साथ समन्वय स्थापित करेंगे।
कोर्ट का मानना है कि विधिक सेवा प्राधिकरणों की भागीदारी से यह सुनिश्चित होगा कि पात्र कैदियों के मामलों की नियमित निगरानी होती रहे। इसके साथ ही जरूरतमंद कैदियों को कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराई जा सकेगी।
यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सभी योग्य कैदियों के मामलों की समय पर समीक्षा हो और किसी भी स्तर पर अनावश्यक देरी न हो।
डिजिटल मॉनिटरिंग के जरिए यह भी देखा जा सकेगा कि किस स्तर पर मामला लंबित है और उसे जल्दी से आगे बढ़ाया जा सके।
जेल सुधार की दिशा में बड़ा कदम
यह केवल एक तकनीकी परियोजना नहीं बल्कि जेल सुधार की दिशा में बड़ा कदम है।
भारत की जेलों में भीड़भाड़ एक गंभीर समस्या बनी हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्टों में भी लगातार यह सामने आता रहा है कि जेलों में क्षमता से अधिक कैदी बंद हैं।
ऐसी स्थिति में जो कैदी कानूनन रिहाई के पात्र हो चुके हैं, उनके मामलों का समय पर निपटारा बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
नई डिजिटल प्रणाली से न केवल कैदियों के अधिकारों की रक्षा होगी बल्कि जेलों पर दबाव भी कम होगा।
फाइलों की जगह तकनीक करेगी निगरानी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के आदेश में कहा था कि कागजी फाइलों पर निर्भरता ही देरी का एक बड़ा कारण है। एक फाइल कई कार्यालयों के बीच घूमती रहती है और यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि मामला कहां लंबित है।
नया सॉफ्टवेयर इस समस्या का समाधान करेगा। हर स्तर पर कार्रवाई की डिजिटल ट्रैकिंग होगी। यदि कोई अधिकारी अनावश्यक देरी करता है तो उसका रिकॉर्ड भी उपलब्ध रहेगा। इससे जवाबदेही बढ़ेगी और प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी।
देशभर के कैदियों पर क्या होगा असर?
नई व्यवस्था लागू होने के बाद समयपूर्व रिहाई के पात्र कैदियों की पहचान और उनके मामलों की निगरानी स्वचालित हो जाएगी।
इससे:
- पात्र कैदियों के मामलों में तेजी आएगी।
- प्रशासनिक देरी कम होगी।
- कैदियों के कानूनी अधिकारों की बेहतर सुरक्षा होगी।
- जेलों में भीड़भाड़ घटाने में मदद मिलेगी।
- पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।
यही कारण है कि जेल प्रशासन और कैदियों के अधिकारों से जुड़े मामलों में इसे हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक पहलों में से एक माना जा रहा है।
कोर्ट ने एनआईसी और न्यायमित्रों की सराहना की
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर और अधिवक्ता रवि रघुनाथ के योगदान की भी सराहना की।
कोर्ट ने कहा कि उनके प्रयासों और सुझावों ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि एनआईसी ने पहले आगरा केंद्रीय जेल और लखनऊ जिला जेल में इसे पायलट परियोजना के रूप में लागू किया था।
प्रारंभिक सफलता के बाद इसे पूरे देश में लागू करने का निर्णय लिया गया।
क्यों अहम है यह फैसला?
यह मामला केवल एक कैदी की अपील तक सीमित नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट ने इसे देशभर की जेलों में लंबित समयपूर्व रिहाई के मामलों से जोड़कर देखा और एक ऐसी व्यवस्था विकसित कराई जिसका लाभ हजारों कैदियों को मिल सकता है।
ई-प्रिजन सॉफ्टवेयर एक ऐसा कदम है, जो भविष्य में न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक आधुनिक, पारदर्शी और प्रभावी बनाने में मदद करेगा। यह पहल न केवल कैदियों के लिए राहत लेकर आई है, बल्कि पूरे न्याय तंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा बदलाव भी है
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि यदि कोई व्यक्ति कानून के अनुसार रिहाई का पात्र बन चुका है, तो प्रशासनिक देरी उसकी स्वतंत्रता में अनावश्यक बाधा नहीं बन सकती।