जयपुर: खेल कोटा के तहत सरकारी नौकरियों में चयन पाने वाले उम्मीदवारों के लिए राजस्थान हाईकोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने खेल कोटे से सरकारी नौकरी पाने वाले खिलाड़ियों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी अभ्यर्थी ने अखिल भारतीय अंतर-विश्वविद्यालय प्रतियोगिता में भाग लिया है, तो उसे केवल इस आधार पर खेल कोटे का लाभ नहीं देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि उसने प्रतियोगिता में राजस्थान की बजाय किसी दूसरे राज्य या विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि खेल कोटे में पात्रता का आधार मान्यता प्राप्त प्रतियोगिता में भागीदारी है, न कि यह कि खिलाड़ी ने किस राज्य का प्रतिनिधित्व किया।
कोर्ट ने कहा कि नियमों में ऐसी कोई शर्त नहीं है कि अभ्यर्थी को केवल राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने पर ही आरक्षण या नियुक्ति का लाभ मिलेगा।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकल पीठ ने यह फैसला ममता कुमारी की याचिका पर सुनाते हुए राज्य सरकार के उस निर्णय को गलत ठहराया, जिसके तहत खेल कोटे में चयनित होने के बावजूद उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई थी।
क्या था पूरा मामला?
मामला शिक्षक भर्ती में “उत्कृष्ट खिलाड़ी” श्रेणी के तहत नियुक्ति से जुड़ा था।
ममता कुमारी ने शिक्षक पद के लिए आवेदन किया था। उन्होंने खेल कोटे के तहत दावा किया कि वह अंतर-विश्वविद्यालय क्रिकेट प्रतियोगिता में भाग ले चुकी हैं और निर्धारित पात्रता पूरी करती हैं।
चयन प्रक्रिया के दौरान उनका चयन भी हो गया। लेकिन बाद में नियुक्ति देने से इनकार कर दिया गया।
कारण यह बताया गया कि उनके द्वारा प्रस्तुत खेल प्रमाणपत्र हरियाणा का प्रतिनिधित्व करते हुए अंतर-विश्वविद्यालय क्रिकेट प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए जारी किया गया था, न कि राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने के लिए।
यानी सरकार का कहना था कि खेल कोटे का लाभ केवल उन्हीं खिलाड़ियों को मिल सकता है जिन्होंने राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया हो।
ममता कुमारी ने इस निर्णय को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
“राजस्थान की निवासी होने के बावजूद लाभ से वंचित किया गया”
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि वह राजस्थान की वास्तविक निवासी हैं और इस तथ्य को लेकर कोई विवाद नहीं है।
इसके बावजूद केवल इस आधार पर उन्हें खेल कोटे का लाभ नहीं दिया गया कि उन्होंने अंतर-विश्वविद्यालय प्रतियोगिता में हरियाणा का प्रतिनिधित्व किया था।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि भर्ती विज्ञापन में कहीं भी यह नहीं लिखा गया था कि खिलाड़ी को अनिवार्य रूप से राजस्थान का ही प्रतिनिधित्व करना होगा।
विज्ञापन में केवल इतना कहा गया था कि अभ्यर्थी ने भारतीय विश्वविद्यालय संघ से मान्यता प्राप्त अखिल भारतीय अंतर-विश्वविद्यालय प्रतियोगिता में भाग लिया हो। इसलिए राज्य सरकार द्वारा बाद में अतिरिक्त शर्त लगाना नियमों और विज्ञापन दोनों के विपरीत है।
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हाईकोर्ट ने भर्ती विज्ञापन को आधार बनाया
सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट ने भर्ती विज्ञापन की संबंधित शर्त का विस्तार से अध्ययन किया।
कोर्ट ने पाया कि खेल कोटे का लाभ पाने के लिए मूल शर्त केवल यह थी कि उम्मीदवार ने भारतीय विश्वविद्यालय संघ द्वारा मान्यता प्राप्त अखिल भारतीय अंतर-विश्वविद्यालय प्रतियोगिता में व्यक्तिगत या टीम प्रतियोगिता में भाग लिया हो।
कोर्ट ने कहा कि विज्ञापन की भाषा बिल्कुल स्पष्ट है और उसमें कहीं भी यह नहीं लिखा गया कि भागीदारी केवल राजस्थान का प्रतिनिधित्व करते हुए ही होनी चाहिए।
जस्टिस आनंद शर्मा ने कहा कि जब नियम स्पष्ट हैं, तब प्रशासन अपनी ओर से अतिरिक्त शर्त नहीं जोड़ सकता।
कोर्ट ने माना कि पात्रता प्रतियोगिता में भाग लेने से जुड़ी है, न कि उस राज्य से जिसका प्रतिनिधित्व किया गया।
“दूसरे राज्य का प्रतिनिधित्व करने से खिलाड़ी का अधिकार खत्म नहीं होता“
फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई खिलाड़ी किसी मान्यता प्राप्त प्रतियोगिता में भाग ले चुका है, तो केवल इसलिए उसका अधिकार समाप्त नहीं हो जाता कि उसने किसी दूसरे राज्य या विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया था।
कोर्ट ने कहा कि कई बार खिलाड़ी पढ़ाई, प्रशिक्षण या अन्य कारणों से दूसरे राज्यों के विश्वविद्यालयों से जुड़े होते हैं। इसका यह मतलब नहीं कि उनकी खेल उपलब्धियां अमान्य हो जाएं।
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की व्याख्या स्वीकार कर ली जाए तो अनेक प्रतिभाशाली खिलाड़ी खेल कोटे के लाभ से वंचित हो जाएंगे, जबकि नियमों में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पात्रता का निर्धारण नियमों और विज्ञापन की शर्तों के अनुसार होगा, न कि अधिकारियों की व्यक्तिगत व्याख्या के आधार पर।
पुराने फैसले का भी दिया हवाला
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने पहले दिए गए इमरान खान बनाम राजस्थान राज्य मामले के फैसले का भी उल्लेख किया।
उस फैसले में भी अदालत ने कहा था कि यदि किसी खिलाड़ी ने निर्धारित प्रतियोगिता में भाग लिया है, तो उसे केवल इसलिए आरक्षण या नियुक्ति का लाभ नहीं रोका जा सकता क्योंकि उसने राजस्थान के बाहर स्थित किसी विश्वविद्यालय या संस्थान का प्रतिनिधित्व किया था।
कोर्ट ने कहा कि यह कानूनी सिद्धांत पहले से स्थापित है और राज्य सरकार इस स्थिति से पूरी तरह अवगत थी। इसके बावजूद ममता कुमारी के मामले में वही गलती दोहराई गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी मुद्दे पर पहले ही न्यायिक निर्णय मौजूद हो, तो प्रशासनिक अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे उसका पालन करें।
राज्य सरकार की दलील क्यों नहीं मानी गई?
राज्य सरकार की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि 8 जनवरी 2020 के एक परिपत्र का उद्देश्य ऐसे खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करना था जिन्होंने राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया हो।
सरकार का कहना था कि खेल कोटे का असली उद्देश्य राज्य का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को लाभ देना है। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि कोई भी परिपत्र, पत्र या प्रशासनिक निर्देश नियमों तथा भर्ती विज्ञापन की स्पष्ट शर्तों को बदल नहीं सकता। यदि नियमों में राजस्थान का प्रतिनिधित्व करना अनिवार्य नहीं है, तो केवल एक परिपत्र के आधार पर नई शर्त लागू नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक निर्देश कभी भी वैधानिक नियमों से ऊपर नहीं हो सकते।
“अधिकारियों ने मशीनी तरीके से अधिकार छीना“
फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि इमरान खान मामले में स्पष्ट न्यायिक निर्देश होने के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने याचिकाकर्ता को उसका वैध अधिकार नहीं दिया।
कोर्ट ने इसे गंभीर मामला मानते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारियों ने न्यायालय के पहले के फैसले की अनदेखी करने का प्रयास किया।
जस्टिस आनंद शर्मा ने कहा कि याचिकाकर्ता को यांत्रिक तरीके से उसके अधिकारों से वंचित किया गया।
कोर्ट ने माना कि जब नियम और पूर्व न्यायिक निर्णय दोनों याचिकाकर्ता के पक्ष में थे, तब नियुक्ति से इनकार करने का कोई कानूनी आधार नहीं था।
हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया ?
सभी पक्षों को सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली।
हाईकोर्ट ने कहा कि ममता कुमारी खेल कोटे के तहत पात्र हैं और उन्हें केवल हरियाणा का प्रतिनिधित्व करने के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भर्ती नियमों की सही व्याख्या यही है कि मान्यता प्राप्त प्रतियोगिता में भागीदारी ही पात्रता का आधार है।
इस प्रकार हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए उन्हें संबंधित श्रेणी में पात्र माना।
सरकारी भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता
यह निर्णय सरकारी भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को मजबूत करता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि चयन प्रक्रिया नियमों के अनुसार ही हो और किसी भी प्रकार की मनमानी न हो।
यह फैसला केवल एक नियुक्ति विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि खेल कोटे से जुड़ी भर्ती प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्थापित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकारी विभाग भर्ती विज्ञापन में मौजूद शर्तों से आगे बढ़कर नई पात्रता शर्तें नहीं जोड़ सकते।
खिलाड़ियों के लिए बड़ी राहत
राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य के हजारों खिलाड़ियों, खेल कोटे के अभ्यर्थियों और सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आज बड़ी संख्या में छात्र और खिलाड़ी दूसरे राज्यों के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करते हैं और उन्हीं संस्थानों का प्रतिनिधित्व करते हुए राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं। यदि राज्य सरकार की व्याख्या को सही माना जाता, तो ऐसे अनेक खिलाड़ी खेल कोटे के लाभ से वंचित हो सकते थे।
हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि खेल उपलब्धियों का मूल्यांकन प्रतियोगिता की मान्यता और खिलाड़ी की भागीदारी के आधार पर होगा, न कि केवल उस राज्य के आधार पर जिसका उसने प्रतिनिधित्व किया।
साथ ही यह निर्णय खिलाड़ियों को यह भरोसा भी देता है कि दूसरे राज्य या विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने से उनकी उपलब्धियां कम नहीं हो जातीं।