नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एंटिसिपेटरी बेल को लेकर एक अहम सीमा तय करते हुए साफ कर दिया है कि हाईकोर्ट ऐसी कोई शर्त नहीं लगा सकता, जो सीधे तौर पर किसी सिविल केस को प्रभावित करे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्रिमिनल मामले में बेल देते समय ऐसी शर्त लगाना, जिससे प्रॉपर्टी या सिविल अधिकारों पर असर पड़े, कानून की सीमा से बाहर है। अग्रिम जमानत देते समय कोर्ट ऐसी शर्त नहीं लगा सकता, जो किसी लंबित संपत्ति विवाद में एक पक्ष को राहत देने के बराबर हो।
कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि क्रिमिनल केस में जमानत पर सुनवाई करते समय कोर्ट का काम केवल आरोपी की स्वतंत्रता और जांच के बीच संतुलन बनाना है। वह किसी सिविल केस में लंबित विवाद का समाधान नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी संपत्ति को लेकर सिविल कोर्ट में मुकदमा चल रहा है और वहां अभी तक कोई अंतरिम राहत नहीं दी गई है, तो क्रिमिनल केस में अग्रिम जमानत देते समय ऐसी शर्त नहीं लगाई जा सकती, जिससे एक पक्ष को वही फायदा मिल जाए जिसकी मांग उसने सिविल केस में की है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के एक आदेश में संशोधन करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत की शर्तों के जरिए लंबित सिविल केस में राहत नहीं दी जा सकती।
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मामला क्या था और हाईकोर्ट ने क्या किया ?
यह मामला तमिलनाडु के मदुरै जिले से जुड़ा है, जहां एक प्रॉपर्टी को लेकर विवाद चल रहा था। इसी विवाद के बीच पेरुनाझी पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की कई धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज हुई।
आरोपी पक्ष ने गिरफ्तारी से बचने के लिए एंटिसिपेटरी बेल की मांग की, जिस पर मद्रास हाईकोर्ट ने राहत दे दी। लेकिन उसके साथ कई शर्तें भी लगाईं। इनमें पुलिस के सामने हाजिरी लगाने, गवाहों को प्रभावित न करने और जांच में सहयोग करने जैसी सामान्य शर्तें शामिल थीं।
लेकिन एक और अहम शर्त जोड़ दी गई आरोपी तब तक विवादित जमीन में किसी तरह का दखल नहीं देंगे, जब तक सिविल केस का फैसला नहीं हो जाता। यही शर्त आगे चलकर पूरे विवाद की जड़ बनी।
आरोपियों का कहना था कि यह शर्त केवल बेल से जुड़ी नहीं है, बल्कि उनके संपत्ति अधिकारों को सीमित करती है, जबकि वही मुद्दा पहले से सिविल केस में विचाराधीन है। इसी शर्त को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
संपत्ति विवाद पहले से सिविल कोर्ट में लंबित था
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता और आरोपियों के बीच संपत्ति को लेकर पहले से सिविल केस चल रहा है।
शिकायतकर्ता ने वर्ष 2019 में स्थायी रोक लगाने की मांग करते हुए सिविल केस दायर किया था। यानी वह चाहता था कि प्रतिवादी पक्ष विवादित संपत्ति में हस्तक्षेप न करे।
दूसरी ओर, आरोपी ने दावा किया कि उसने यह संपत्ति खरीद रखी है और उस पर उसका अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संपत्ति पर किसका अधिकार है और किसे रोक लगनी चाहिए, यह सवाल पहले से सिविल कोर्ट के सामने विचाराधीन है। ऐसे में क्रिमिनल केस में जमानत की शर्त के जरिए उस विवाद को प्रभावित नहीं किया जा सकता।
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एक अहम तथ्य ने बदल दिया पूरा मामला
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने एक और अहम तथ्य आया। कोर्ट को बताया गया कि शिकायतकर्ता ने सिविल केस में अंतरिम रोक लगाने के लिए आवेदन भी दायर किया था। यह आवेदन सिविल प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के तहत दिया गया था।
लेकिन हैरानी की बात यह थी कि उस आवेदन पर अभी तक सुनवाई ही नहीं हुई थी। सिविल कोर्ट ने न तो राहत दी थी और न ही उसे खारिज किया था। यही बात सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आधार बनी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सिविल कोर्ट ने अभी तक किसी पक्ष को राहत नहीं दी है, तो क्रिमिनल केस में अग्रिम जमानत देते समय ऐसी शर्त लगाना उचित नहीं है, जिसका असर सिविल केस में राहत देने जैसा हो।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की शर्त को गलत माना
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की शर्त का प्रभाव यह हुआ कि शिकायतकर्ता को वह सुरक्षा मिल गई, जिसकी मांग उसने सिविल केस में की थी। कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत देते समय लगाई गई यह शर्त वास्तव में संपत्ति विवाद में एक पक्ष को राहत देने के बराबर थी।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि हाईकोर्ट को ऐसी शर्त नहीं लगानी चाहिए थी, क्योंकि इससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे सिविल केस में अंतरिम आदेश दे दिया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्रिमिनल और सिविल मामलों की सीमाएं अलग-अलग हैं और दोनों को मिलाया नहीं जा सकता। यदि किसी व्यक्ति को संपत्ति के संबंध में राहत चाहिए, तो उसे संबंधित सिविल कोर्ट से ही वह राहत प्राप्त करनी होगी।
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क्रिमिनल और सिविल मामलों में फर्क समझाया
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि क्रिमिनल केस और सिविल केस की प्रकृति अलग होती है।
क्रिमिनल मामले में कोर्ट यह देखता है कि कोई अपराध हुआ है या नहीं और आरोपी को जांच के दौरान किस सीमा तक राहत दी जा सकती है। वहीं सिविल मुकदमों में संपत्ति, अधिकार, स्वामित्व और कब्जे जैसे मुद्दों का निपटारा किया जाता है।
कोर्ट ने कहा कि यदि जमानत की शर्तों के जरिए सिविल राहत दी जाने लगे, तो इससे दोनों तरह की न्यायिक कार्यवाहियों की सीमाएं प्रभावित हो जाएंगी। ऐसी स्थिति न्यायिक व्यवस्था के लिए भी उचित नहीं मानी जा सकती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत आदेश का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना होता है कि आरोपी जांच में सहयोग करे, फरार न हो और गवाहों को प्रभावित न करे। जमानत आदेश का इस्तेमाल किसी अन्य कानूनी विवाद का समाधान करने के लिए नहीं किया जा सकता।
शिकायतकर्ता के लिए कानूनी रास्ते खुले हैं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके फैसले का मतलब यह नहीं है कि शिकायतकर्ता के पास कोई उपाय नहीं बचा है।
कोर्ट ने कहा कि यदि शिकायतकर्ता को यह आशंका है कि संपत्ति में छेड़छाड़ हो सकती है या शांति भंग होने का खतरा है, तो वह कानून के अनुसार उचित मंच पर जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता सिविल कोर्ट से अंतरिम राहत मांग सकता है या किसी अन्य सक्षम मंच का दरवाजा खटखटा सकता है। लेकिन वह राहत उसी मंच से मिलनी चाहिए, जिसे कानून ने इसके लिए अधिकार दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश, हाईकोर्ट की शर्त रद्द
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश में शामिल उस शर्त को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपियों को सिविल केस खत्म होने तक विवादित संपत्ति में हस्तक्षेप करने से रोका गया था।
हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत से जुड़ी बाकी सभी शर्तें पहले की तरह लागू रहेंगी और आरोपियों को उनका पालन करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत की शर्तें जांच और न्यायिक प्रक्रिया को सुचारु रखने के लिए होती हैं। उनका इस्तेमाल किसी लंबित क्रिमिनल केस में राहत देने के लिए नहीं किया जा सकता।
यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां संपत्ति विवाद और आपराधिक मुकदमे एक साथ चल रहे हों।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि क्रिमिनल केस में जमानत देते समय कोर्ट ऐसी शर्त नहीं लगा सकता, जो वास्तव में किसी सिविल केस का फैसला करने या उसमें राहत देने जैसी हो।