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‘पति-पत्नी में समझौता होने पर सजा के बाद भी खत्म हो सकता है आपराधिक मामला’: सुप्रीम कोर्ट ने दोषी पति को किया बरी

Supreme Court Quashes Conviction After Marital Settlement, Invokes Article 142 To Grant Relief

नई दिल्ली: पति-पत्नी के बीच आपराधिक मामलों में समझौते को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि अगर किसी आपराधिक मामले में सजा हो चुकी हो और उसके बाद पक्षकार आपस में सुलह कर लें, तो भी कोर्ट केस खत्म कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उसे “पूरा न्याय” सुनिश्चित करने की विशेष शक्ति प्राप्त है और जरूरत पड़ने पर वह ऐसे मामलों में समझौते को स्वीकार कर सकता है, भले ही संबंधित अपराध सामान्य परिस्थितियों में समझौते योग्य न हो।

इसी सिद्धांत को लागू करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने एक ऐसे व्यक्ति को राहत देते हुए उसकी दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी जिसे अपनी पत्नी पर हमला करने के मामले में सजा हो चुकी थी, लेकिन बाद में पति-पत्नी के बीच समझौता हो गया और वे फिर से साथ रहने लगे।

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पत्नी पर हमले के आरोप में हुई थी सजा

मामला कर्नाटक के मांड्या जिले का है। 6 जुलाई 2011 को महादेवैया नामक व्यक्ति ने अपनी पत्नी सन्नथायम्मा पर डंडे से हमला किया था। इस हमले में महिला को कई चोटें आई थीं और उसके हाथ में फ्रैक्चर भी हुआ था।

मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में हुई। कोर्ट ने घायल पत्नी के बयान, प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की गवाही और मेडिकल रिकॉर्ड को देखते हुए आरोपों को साबित माना। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने महादेवैया को भारतीय दंड संहिता की धारा 324 और धारा 326 के तहत दोषी ठहराया।

धारा 326 के तहत उसे 2 साल की कैद और 2 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। वहीं धारा 324 के तहत भी 1 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। मामले के अन्य आरोपियों को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था।

हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखी थी सजा

ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ महादेवैया ने कर्नाटक हाईकोर्ट में अपील दायर की।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की दोबारा जांच की और पाया कि घायल पत्नी की गवाही उसकी बेटी के बयान तथा मेडिकल दस्तावेजों से पूरी तरह पुष्ट होती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि महिला के हाथ में फ्रैक्चर आने की पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट से होती है, इसलिए धारा 326 के तहत दोषसिद्धि पूरी तरह उचित है। कोर्ट ने यह भी माना कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा अपराध की प्रकृति के अनुरूप है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि और सजा दोनों को बरकरार रखा। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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सुप्रीम कोर्ट में बदली पूरी स्थिति

सुप्रीम कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान मामले में बड़ा मोड़ आ गया।

पति और पत्नी ने संयुक्त रूप से एक आवेदन दायर कर कोर्ट को बताया कि परिवार के बुजुर्गों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों के प्रयासों से उनके बीच विवाद खत्म हो गया है। दोनों ने कहा कि अब वे फिर से साथ रह रहे हैं और अपना वैवाहिक जीवन शांतिपूर्वक आगे बढ़ाना चाहते हैं।

पत्नी ने कोर्ट को साफ बताया कि वह अब आपराधिक मामला आगे नहीं बढ़ाना चाहती और यदि उसके पति की सजा रद्द कर दी जाए तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। सुनवाई के दौरान दोनों पक्ष व्यक्तिगत रूप से कोर्ट के सामने भी पेश हुए और समझौते की पुष्टि की।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि समझौता पूरी तरह स्वेच्छा से किया गया है और इसके पीछे किसी प्रकार का दबाव, धमकी या लालच नहीं है।

अनुच्छेद 142 के तहत मिली राहत

सुनवाई के दौरान सबसे बड़ा कानूनी सवाल यह था कि धारा 326 जैसे अपराध में समझौता कैसे स्वीकार किया जा सकता है, क्योंकि यह सामान्य रूप से समझौते योग्य अपराध नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 142 उसे विशेष परिस्थितियों में पूरा न्याय सुनिश्चित करने की शक्ति देता है। कोर्ट ने कहा कि पहले भी कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने इसी शक्ति का उपयोग करते हुए सजा के बाद हुए समझौतों को स्वीकार किया है।

कोर्ट ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जहां विवाद पूरी तरह निजी प्रकृति का हो और दोनों पक्ष वास्तव में अपने मतभेद भुलाकर आगे बढ़ना चाहते हों, वहां न्याय का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं रह जाता। ऐसी परिस्थितियों में यदि आपराधिक मामला जारी रखा जाए तो वह पक्षों के पुनर्वास और सामाजिक शांति के रास्ते में बाधा बन सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पति-पत्नी फिर से साथ रह रहे हैं और अपने वैवाहिक संबंध को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इसलिए समझौते को स्वीकार करना न्याय के हित में होगा।

कानून के साथ इंसाफ भी जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने कई मामलों में यह सिद्धांत अपनाया है कि जहां विवाद व्यक्तिगत हो और पक्षकारों ने वास्तविक समझौता कर लिया हो, वहां आपराधिक कार्यवाही को खत्म किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि यहां शिकायतकर्ता पत्नी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उसने बिना किसी दबाव या डर के समझौता किया है। कोर्ट ने यह भी माना कि दोनों पक्षों के बीच संबंध सामान्य हो चुके हैं और वे साथ रह रहे हैं।

ऐसी स्थिति में पुराने विवाद को जीवित रखना किसी भी पक्ष के हित में नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं है, बल्कि बल्कि न्याय करना और जहां संभव हो वहां सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों को भी बचाना है।

अगर किसी मामले में सुलह से स्थिति बेहतर हो सकती है और दोनों पक्ष आगे बढ़ना चाहते हैं, तो कोर्ट को उस दिशा में कदम उठाना चाहिए।

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पति को सभी आरोपों से किया बरी

सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पति-पत्नी के समझौते को स्वीकार कर लिया और महादेवैया को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों में संशोधन करते हुए कहा कि आरोपी द्वारा अब तक जेल में बिताई गई अवधि को सजा मान लिया जाएगा।

इसके साथ ही उसकी दोषसिद्धि और सजा को समाप्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने मांड्या जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि आरोपी को तत्काल रिहा किया जाए।

किन मामलों में मिल सकती है ऐसी राहत?

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि हर मामले में ऐसा नहीं होगा। जहां अपराध का असर समाज पर बड़ा होता है या मामला गंभीर अपराध का होता है, वहां केवल समझौते के आधार पर राहत नहीं दी जाएगी।

लेकिन जहां विवाद निजी हो और दोनों पक्ष सच्चे मन से समझौता कर लें, वहां अदालत इस तरह का कदम उठा सकती है।

इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 142 के तहत उसकी शक्तियां केवल तकनीकी कानूनी सीमाओं तक बंधी नहीं हैं।

यदि किसी मामले में वास्तविक समझौता हो चुका हो और पक्षकार अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहते हों, तो पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए सजा के बाद भी समझौते को स्वीकार किया जा सकता है।

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