नई दिल्ली। मकान मालिकों के अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून में कुछ प्रावधान हट जाने से मकान मालिक का किराया बढ़ाने का हक खत्म नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश किराया कानून में ‘बोनाफाइड नीड’ से जुड़े कुछ क्लॉज हटाए गए थे, लेकिन इससे वह प्रावधान प्रभावित नहीं होता, जो मकान मालिक को किराया बढ़ाने का अधिकार देता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश किराया कानून में कुछ प्रावधान हट जाने का मतलब यह नहीं है कि मकान मालिक का किराया बढ़ाने का कानूनी अधिकार खत्म हो गया। यदि सरकार या कोई सरकारी विभाग किरायेदार है, तब भी मकान मालिक कानून के तहत किराया बढ़ाने की मांग कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए सीधे किराया तय नहीं कर सकता, खासकर तब जब रिकॉर्ड पर उसके समर्थन में कोई ठोस सबूत मौजूद न हो। ऐसे मामलों का फैसला वही विशेष प्राधिकरण करेगा जिसे कानून ने यह जिम्मेदारी दी है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामला दोबारा बहराइच के रेंट कंट्रोल अथॉरिटी के पास भेज दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि चार महीने के अंदर नया फैसला किया जाए।
1966 से चल रहा है मकान और किराए का विवाद
मामला उत्तर प्रदेश के बहराइच स्थित एक भवन से जुड़ा है। वर्ष 1966 में इस भवन को उत्तर प्रदेश सरकार के ट्रेड टैक्स विभाग को किराए पर दिया गया था।
करीब 5,866 वर्ग फुट क्षेत्रफल वाली इस संपत्ति का इस्तेमाल कई सालों से सरकारी कार्यालय के रूप में किया जा रहा था। समय के साथ इलाके की कीमतें और किराए बढ़ते गए, लेकिन मकान मालिकों का कहना था कि उन्हें बाजार दर के अनुसार किराया नहीं मिल रहा।
1990 के दशक में भवन खाली कराने की कोशिशें नाकाम हो गईं। इसके बाद मकान मालिकों ने वर्ष 2008 में उत्तर प्रदेश रेंट कानून के तहत किराया बढ़ाने के लिए आवेदन दायर किया।
रेंट कंट्रोल अफसर ने संपत्ति की स्थिति, उसके प्रमुख स्थान और आसपास के किरायों को देखते हुए मासिक किराया 14,400 रुपये तय कर दिया। यह दर 4 रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से निकाली गई थी।
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। किरायेदार पक्ष यानी उत्तर प्रदेश सरकार इस फैसले से सहमत नहीं थी। सरकार ने आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर कर दी, जिसके बाद मामला अतिरिक्त जिला जज के पास पहुंच गया।
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अपीलीय अफसर ने वापस भेजा मामला
रेंट कंट्रोल अथॉरिटी के फैसले के खिलाफ किरायेदार पक्ष यानी उत्तर प्रदेश सरकार ने अपील की, जिसके बाद अतिरिक्त जिला जज ने 2016 में इस आदेश को रद्द कर दिया।
अपीलीय अफसर ने कहा कि किराया बढ़ाने का आदेश देते समय यह स्पष्ट नहीं किया गया कि नई दर कब से लागू होगी। साथ ही भविष्य में हर पांच साल बाद किराया बढ़ाने को लेकर भी कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिए गए।
इन्हीं कमियों के आधार पर मामला दोबारा रेंट कंट्रोल अथॉरिटी के पास भेज दिया गया ताकि सभी पहलुओं पर विचार करके नया आदेश पारित किया जा सके।
मकान मालिक इस फैसले से संतुष्ट नहीं थे। उनका कहना था कि मामला पहले ही काफी लंबा खिंच चुका है। इसलिए उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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हाईकोर्ट ने सीधे बढ़ा दिया किराया, सुप्रीम कोर्ट ने जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने मकान मालिकों की ओर से यह दलील दी गई कि पास की एक दूसरी सरकारी इमारत का किराया 14 रुपये प्रति वर्ग फुट दिया जा रहा है।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए किराया सीधे 14 रुपये प्रति वर्ग फुट कर दिया और कहा कि यह दर वर्ष 2008 में दायर मूल आवेदन की तारीख से लागू होगी।
राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती दी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई दस्तावेज मौजूद नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि पास की इमारत वास्तव में 14 रुपये प्रति वर्ग फुट पर किराए पर दी गई थी।
कोर्ट ने कहा कि केवल वकील की दलील के आधार पर किराया तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए किरायानामा, दस्तावेज या अन्य सबूत होना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने जिस तरह सीधे किराया बढ़ा दिया, वह कानून के अनुरूप नहीं था।
मकान मालिक का किराया बढ़ाने का हक कायम
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने एक और अहम दलील दी। सरकार का कहना था कि किराया कानून में कुछ पुराने प्रावधान हटाए जा चुके हैं। इसलिए मकान मालिक अब उस आधार पर किराया बढ़ाने की मांग नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि यदि सरकार की यह दलील मान ली जाए तो मकान मालिक के पास अपनी संपत्ति से उचित आर्थिक लाभ लेने का कोई रास्ता नहीं बचेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कानून नहीं पढ़ा जा सकता जिससे किराएदार को इतना मजबूत बना दिया जाए कि मकान मालिक अपने ही भवन पर आर्थिक रूप से नियंत्रण खो बैठे।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित प्रावधान आज भी प्रभावी है और मकान मालिक किराया बढ़ाने की मांग कर सकता है, भले ही किराएदार कोई सरकारी विभाग ही क्यों न हो।
कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य मकान मालिक और किराएदार के बीच संतुलन बनाए रखना है। किसी एक पक्ष को पूरी तरह लाभ पहुंचाने वाली व्याख्या नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट की शक्तियों की सीमा भी बताई
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट की शक्तियों पर भी विस्तार से टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि यह शक्ति निगरानी और नियंत्रण की है, अपील की नहीं। हाईकोर्ट यह देख सकता है कि कोई प्राधिकरण कानून के दायरे में काम कर रहा है या नहीं, लेकिन वह हर मामले में खुद प्राधिकरण की भूमिका नहीं निभा सकता।
विशेष रूप से किराया कानून जैसे मामलों में, जहां अलग से रेंट कंट्रोल प्राधिकरण बनाए गए हैं, वहां हाईकोर्ट को बेहद सावधानी से हस्तक्षेप करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में हस्तक्षेप पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन इसका इस्तेमाल बहुत कम और सोच-समझकर किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का आदेश रद्द, मामला फिर रेंट अथॉरिटी के पास
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामला दोबारा बहराइच के रेंट कंट्रोल अथॉरिटी के पास भेज दिया है।
कोर्ट ने कहा कि किराया तय करने का काम विशेषज्ञ रेंट कंट्रोल अथॉरिटी का है और वही इसे तय करेगी। इसलिए मामला फिर से बहराइच के रेंट कंट्रोल ऑफिसर के पास भेजा गया।
साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस बार फैसला चार महीने के अंदर किया जाए, ताकि लंबे समय से चल रहे विवाद का अंत हो सके।
कोर्ट ने यह भी कहा कि नया तय किया गया किराया 2008 से लागू माना जाएगा, यानी मकान मालिक को पिछली अवधि का भी लाभ मिलेगा।
मालिक और किरायेदार दोनों के लिए अहम फैसला
इस फैसले को मकान मालिक और किराएदार के अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़े अहम निर्णय के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून में कुछ बदलाव होने का मतलब यह नहीं है कि मकान मालिक का किराया बढ़ाने का अधिकार खत्म हो जाए।
साथ ही यह भी तय हो गया कि हाईकोर्ट अपनी सीमा से बाहर जाकर सीधे ऐसे फैसले नहीं दे सकता, खासकर तब जब कोई ठोस सबूत मौजूद न हो।
यह फैसला भविष्य में ऐसे सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां सरकारी विभाग लंबे समय से किराए की इमारतों में काम कर रहे हैं और मकान मालिक बाजार के हिसाब से किराया बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।
यह फैसला उन सभी मामलों के लिए अहम है, जहां सरकार या बड़ी संस्थाएं लंबे समय से कम किराये पर प्रॉपर्टी इस्तेमाल कर रही हैं।
अब यह स्पष्ट है कि मकान मालिकों के पास किराया बढ़ाने का वैधानिक अधिकार बना रहेगा।
