नई दिल्ली: नौकरी करने वाले कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई कर्मचारी बिना अनुमति लंबे समय तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहता है, कंपनी को कोई लिखित सूचना नहीं देता और बाद में पता बदलने की जानकारी भी साझा नहीं करता, तो वह नोटिस नहीं मिलने का बहाना बनाकर राहत नहीं मांग सकता।
कोर्ट ने कहा कि कंपनी नोटिस उसी पते पर भेजेगी, जो कर्मचारी ने अपने रिकॉर्ड में दर्ज कराया है। यदि कर्मचारी ने पता बदलने की जानकारी नहीं दी, तो बाद में वह नोटिस नहीं मिलने का हवाला देकर राहत नहीं मांग सकता।
कोर्ट ने कहा कि पता बदलने की जानकारी देना कर्मचारी की जिम्मेदारी है और अपनी ही लापरवाही का फायदा उठाकर कानूनी राहत नहीं मांगी जा सकती।
साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना अनुमति लंबे समय तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहने वाले कर्मचारी को केवल मौखिक दावों के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती।
यदि कर्मचारी किसी मजबूरी का हवाला देता है, तो उसे उसका रिकॉर्ड और सबूत भी पेश करना होगा।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह फैसला एक निजी कंपनी और उसके पूर्व कर्मचारी के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद में सुनाया।
कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और लेबर कोर्ट द्वारा कर्मचारी के पक्ष में दिए गए आदेशों को रद्द करते हुए कंपनी की अपील स्वीकार कर ली।
24 दिन की अनुपस्थिति से शुरू हुआ विवाद
मामला एक निजी कंपनी में कार्यरत कर्मचारी अर्जुन गुप्ता से जुड़ा था।
रिकॉर्ड के मुताबिक कर्मचारी करीब 24 दिन तक बिना अनुमति काम पर नहीं आया। कंपनी का कहना था कि उसने न तो छुट्टी ली और न ही अपनी अनुपस्थिति की कोई आधिकारिक जानकारी दी।
इसके बाद कंपनी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया और कर्मचारी से उसकी अनुपस्थिति का कारण पूछते हुए जवाब मांगा। यह नोटिस कर्मचारी के बिहार स्थित स्थायी पते पर भेजा गया था, जो कंपनी के रिकॉर्ड में दर्ज था।
हालांकि कर्मचारी उस समय उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) में रह रहा था। उसका कहना था कि नोटिस उसे कभी मिला ही नहीं, क्योंकि वह बिहार वाले पते पर नहीं रह रहा था।
बाद में जब उसने दोबारा नौकरी जॉइन करने की कोशिश की, तो कंपनी ने उसे वापस काम पर लेने से इनकार कर दिया। इसके बाद विवाद लेबर कोर्ट और फिर हाईकोर्ट तक पहुंच गया।
कर्मचारी की नोटिस नहीं मिलने की दलील
कर्मचारी का कहना था कि वह अपनी मां की खराब तबीयत के कारण ड्यूटी पर नहीं आ सका। उसने दावा किया कि उसने जाने से पहले अपने वरिष्ठ अधिकारी को इसकी जानकारी दे दी थी।
साथ ही उसने यह भी कहा कि कंपनी ने उसे दोबारा नौकरी जॉइन करने से रोका और उसके साथ गलत व्यवहार किया।
कर्मचारी का कहना था कि कंपनी का नोटिस उसे कभी नहीं मिला, क्योंकि वह उसके मौजूदा पते के बजाय बिहार वाले स्थायी पते पर भेजा गया था। कर्मचारी ने दलील दी कि वह उस समय नोएडा में रह रहा था, जबकि कंपनी ने नोटिस बिहार के पते पर भेज दिया। इसलिए उसे नोटिस की जानकारी ही नहीं मिली।
इसके बाद जब उसने दोबारा नौकरी जॉइन करने की कोशिश की, तो कंपनी ने उसे वापस लेने से इनकार कर दिया।
कर्मचारी ने इसे अवैध बताते हुए लेवर कोर्ट का रुख किया। लेबर कोर्ट ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला देते हुए उसे बहाल करने और बकाया वेतन देने का आदेश दिया। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखा।
इसी के खिलाफ कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची, जहां पूरे मामले की दोबारा समीक्षा हुई।
नोटिस पर ‘सुप्रीम’ टिप्पणी: पता अपडेट की जिम्मेदारी कर्मचारी की
सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि उसे नोटिस नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि कंपनी नोटिस उसी पते पर भेजेगी, जो कर्मचारी ने खुद रिकॉर्ड में दिया है।
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी कर्मचारी ने अपना पता बदल लिया है, तो इसकी जानकारी कंपनी को देना उसी की जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पता बदलने की सूचना न देना कर्मचारी की अपनी चूक है। अगर कर्मचारी ने नया पता कंपनी को नहीं बताया, तो बाद में वह नोटिस नहीं मिलने का हवाला देकर राहत नहीं मांग सकता।
कोर्ट के अनुसार किसी भी नियोक्ता से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह कर्मचारी का नया पता खुद तलाश करे। यही वजह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस न मिलने की दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
अनुपस्थिति को लेकर कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड की विस्तार से जांच की।
कोर्ट ने पाया कि कर्मचारी ने अपनी मां की बीमारी का हवाला तो दिया, लेकिन इसे साबित करने के लिए कोई सबूत या दस्तावेज नहीं दिया। न तो कोई मेडिकल रिकॉर्ड दिया गया और न ही ऐसा कोई प्रमाण पेश किया गया जिससे यह साबित हो सके कि वह इसी वजह से ड्यूटी पर नहीं आ सका था।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि 24 दिनों की अनुपस्थिति के दौरान कर्मचारी ने कंपनी को एक भी लिखित सूचना नहीं भेजी। कोर्ट ने कहा कि यदि वास्तव में कोई गंभीर पारिवारिक समस्या थी, तो वह पत्र, आवेदन या किसी अन्य माध्यम से कंपनी को इसकी जानकारी दे सकता था। लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज मौजूद नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल मौखिक दावा कर देने भर से किसी कर्मचारी की अनुपस्थिति को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपने दावे के समर्थन में कोई सबूत नहीं देता, तो केवल उसके बयान के आधार पर फैसला या उसे राहत नहीं दी जा सकती।
बहाली रद्द करने की वजह
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूरे मामले में कर्मचारी अपने दावों को साबित करने में नाकाम रहा।
कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी यह साबित नहीं कर पाया कि वह बिना अनुमति ड्यूटी से दूर क्यों रहा। साथ ही ऐसा कोई सबूत भी नहीं दिया गया, जिससे पता चले कि उसने दोबारा नौकरी जॉइन करने की कोशिश की थी।
कोर्ट ने कहा कि अगर कर्मचारी का दावा सही होता, तो वह कम से कम एक पत्र, ईमेल या अन्य लिखित माध्यम से सूचना दे सकता था। लेकिन ऐसा कुछ भी रिकॉर्ड पर नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपने फैसले में लेबर कोर्ट और हाईकोर्ट ने मामले में मौजूद तथ्यों और सबूतों पर सही ढंग से विचार नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लेबर कोर्ट ने पर्याप्त सबूतों के बिना कर्मचारी को राहत दे दी। इसके बाद हाईकोर्ट ने भी रिकॉर्ड की गहराई से जांच किए बिना उस फैसले को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि ठोस सबूत और नियमों का पालन जरूरी है। इसके बावजूद लेबर कोर्ट और हाईकोर्ट ने कर्मचारी को राहत दे दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पर्याप्त सबूतों के अभाव में ऐसी राहत देना उचित नहीं था। कोर्ट ने माना कि दोनों मंचों ने उपलब्ध रिकॉर्ड का सही मूल्यांकन नहीं किया और बिना पर्याप्त साक्ष्य के कर्मचारी के पक्ष में फैसला दे दिया।
इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने उनके आदेशों को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी की अपील स्वीकार कर ली।
कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी बिना अनुमति अनुपस्थित रहा, उसने अपनी अनुपस्थिति का कोई दस्तावेजी आधार पेश नहीं किया और न ही यह साबित किया कि उसने कंपनी को समय रहते कोई सूचना दी थी।
साथ ही पता बदलने की जानकारी भी कंपनी को नहीं दी गई थी। यानी कर्मचारी ने अपने नए पते की जानकारी भी कंपनी के रिकॉर्ड में अपडेट नहीं कराई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन हालातों में कर्मचारी को राहत देने का कोई आधार नहीं बनता। कोई भी व्यक्ति अपनी ही लापरवाही या चूक का लाभ उठाकर कानूनी राहत नहीं मांग सकता।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी की बहाली और बकाया वेतन से जुड़े सभी राहत आदेश रद्द कर दिए और कंपनी के पक्ष में निर्णय सुनाया।
‘जिम्मेदारी से बच नहीं सकते कर्मचारी‘
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नौकरी और सेवा विवादों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि कर्मचारी और नियोक्ता दोनों की कुछ जिम्मेदारियां होती हैं। यदि कोई कर्मचारी अपना पता बदलता है, तो उसे रिकॉर्ड अपडेट कराना होगा। बाद में नोटिस नहीं मिलने का बहाना बनाकर वह राहत नहीं मांग सकता।
इसी तरह यदि कोई कर्मचारी लंबी अवधि तक अनुपस्थित रहता है, तो उसे अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज और रिकॉर्ड भी पेश करने होंगे।
यह फैसला यह भी बताता है कि केवल मौखिक दावों के आधार पर बहाली जैसी राहत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेवा विवादों में दावों को साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी हैं।
इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों के लिए एक साफ संदेश दिया है कि सेवा संबंधों में अनुशासन और जिम्मेदारी बेहद जरूरी है। यदि कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं करता और अपने दावों के समर्थन में कोई प्रमाण नहीं देता, तो केवल आरोपों के आधार पर उसे राहत नहीं मिल सकती।
