नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या और गैर-इरादतन हत्या के मामलों में सजा तय करने को लेकर अहम फैसला सुनाया है।
करीब तीन दशक पुराने एक आपराधिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि हर मौत को हत्या नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब आरोपी का स्पष्ट इरादा जान लेने का न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर मौत को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। यदि रिकॉर्ड से यह साफ हो कि घटना पहले से बनाई गई योजना का हिस्सा नहीं थी, बल्कि अचानक हुए झगड़े में हुई और आरोपी का हत्या का इरादा साबित नहीं होता, तो सजा तय करते समय इन परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी मामले में दोषसिद्धि बरकरार रहने का मतलब यह नहीं है कि सजा में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। यदि घटना को कई साल बीत चुके हों, आरोपी काफी समय जेल में रह चुका हो और रिकॉर्ड से यह लगे कि न्याय के हित में सजा कम की जा सकती है, तो कोर्ट ऐसा करने का अधिकार रखती है।
जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने उत्तराखंड के करीब 29 साल पुराने एक मामले में यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने आरोपी माथू उर्फ जगदीश की दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन पांच साल की सजा घटाकर उतनी कर दी, जितनी अवधि वह पहले ही जेल में काट चुका था।
धक्का-मुक्की में गई जान
यह मामला 12 फरवरी 1997 को उत्तराखंड के देहरादून में हुई एक घटना से जुड़ा है।
रिकॉर्ड के अनुसार, घटना से करीब 15 दिन पहले पदम सिंह शाही ने मनुआ उर्फ पूरन को 500 रुपये में एक घड़ी बेची थी। बाद में मनुआ ने कहा कि घड़ी ठीक नहीं है और वह उसे वापस करना चाहता है।
इसी बात को लेकर वह पदम सिंह के घर गया और घड़ी वापस लेने के लिए बुलाया। कुछ देर बाद दोनों के बीच कहासुनी शुरू हो गई, जो देखते ही देखते झगड़े में बदल गई।
इसी दौरान मनुआ के साथ रामू और माथू उर्फ जगदीश भी वहां पहुंच गए।
प्रॉसिक्यूशन के अनुसार, तीनों ने पदम सिंह के साथ मारपीट की और उसे एक सूखी नहर में धक्का दे दिया। आरोप यह भी था कि माथू उर्फ जगदीश ने उस पर भारी पत्थर से हमला किया, जिससे उसे गंभीर चोटें आईं। बाद में परिजन उसे दून अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया?
मामले की सुनवाई देहरादून की सेशन कोर्ट में हुई। सुनवाई के दौरान एक आरोपी काले उर्फ कालू को बरी कर दिया गया, जबकि मनुआ, रामू और माथू उर्फ जगदीश को भारतीय दंड संहिता की धारा 304/34 के तहत दोषी ठहराया गया।
तीनों को पांच-पांच साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई।
इसके बाद तीनों ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही माना और उनकी अपील खारिज कर दी।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मनुआ और रामू की मौत हो गई। इसके बाद मामला सिर्फ माथू उर्फ जगदीश तक ही रह गया और सुनवाई सिर्फ तीसरे आरोपी माथू उर्फ जगदीश की अपील पर ही हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड में क्या पाया?
सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों के बयान, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पूरे रिकॉर्ड का विस्तार से अध्ययन किया।
कोर्ट ने देखा कि मृतक के पिता और अन्य गवाहों ने पत्थर फेंकने की बात कही थी, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज चोटों से अलग तस्वीर सामने आती है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर और चेहरे पर गंभीर चोटें दर्ज थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड देखने पर ऐसा लगता है कि ये चोटें सूखी नहर में गिरने के कारण लगीं, क्योंकि वहां नीचे पत्थर मौजूद थे।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जांच अधिकारी ने घटनास्थल से एक पत्थर जब्त करने की बात कही थी और उसे फॉरेंसिक जांच के लिए भेजने का दावा किया था, लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट रिकॉर्ड पर कभी पेश ही नहीं की गई। ऐसी स्थिति में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आरोपी द्वारा फेंका गया पत्थर ही मौत की वजह बना।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यही लगता है कि मौत की वजह पत्थर नहीं, बल्कि सूखी नहर में गिरने से लगी गंभीर चोटें थीं।
इन सभी बातों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से हत्या करने का साफ इरादा साबित नहीं होता। हालांकि, आरोपी को यह जरूर पता होना चाहिए था कि ऐसी जगह धक्का देने से किसी की जान भी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने बताया: कब लागू होगी धारा 304?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हत्या करने का साफ इरादा साबित नहीं होता। कोर्ट ने माना कि पूरा विवाद एक घड़ी को वापस करने की बात से शुरू हुआ था। पहले से किसी बड़ी साजिश या हत्या की योजना का कोई सबूत रिकॉर्ड में नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय दंड संहिता की धारा 304 की विस्तृत व्याख्या भी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह धारा दो भागों में विभाजित है:
- पार्ट-I: जब आरोपी किसी की जान लेने की नीयत से हमला करे या जानबूझकर ऐसी चोट पहुंचाए, जिससे मौत हो सकती हो।
- पार्ट-II: जब आरोपी किसी को मारना नहीं चाहता, लेकिन उसे इस बात का अंदाजा हो कि उसके इस काम से किसी की मौत हो सकती है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दूसरा भाग, यानी धारा 304 पार्ट-II, पूरी तरह लागू होता है, क्योंकि आरोपी का इरादा हत्या का नहीं था, लेकिन उसे अपने कृत्य के जोखिम का अंदाजा होना चाहिए था।
कोर्ट ने माना कि झगड़े के दौरान मृतक को सूखी नहर में धक्का देना ऐसा काम था, जिससे मौत होने की आशंका का अंदाजा लगाया जा सकता था, लेकिन रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि आरोपी उसे मारना ही चाहता था।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखी। हालांकि कोर्ट ने सजा पर दोबारा विचार किया।
कोर्ट ने कहा कि घटना को लगभग 29 साल बीत चुके हैं। घटना के समय आरोपी की उम्र करीब 33 साल थी, जबकि अब वह 60 साल से अधिक का हो चुका है।
कोर्ट ने यह भी देखा कि आरोपी पहले ही डेढ़ साल से ज्यादा समय जेल में बिता चुका है। इन सभी बातों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अब उसे दोबारा पांच साल की सजा भुगतने के लिए जेल भेजना न्यायसंगत नहीं होगा।
इसी कारण कोर्ट ने पांच साल की सजा घटाकर उतनी कर दी, जितनी अवधि आरोपी पहले ही जेल में काट चुका है।
चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उसका जमानत बांड भी समाप्त कर दिया।
‘एंड्स ऑफ जस्टिस’ का संतुलन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय का मतलब सिर्फ सजा देना नहीं है।
सजा तय करते समय मामले की परिस्थितियां, कितना समय बीत चुका है और आरोपी की मौजूदा स्थिति भी देखनी चाहिए। इसलिए कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन सजा कम कर दी।
‘हत्या और गैर-इरादतन हत्या के बीच फर्क’
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला गैर-इरादतन हत्या के मामलों में सजा तय करने के सिद्धांत को लेकर अहम है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हर मौत को हत्या नहीं माना जा सकता। किसी मामले में आरोपी की नीयत क्या थी और उसे अपने काम के नतीजे का कितना अंदाजा था, सजा तय करते समय दोनों बातें बहुत अहम होती हैं।
अगर किसी व्यक्ति का उद्देश्य सीधे तौर पर हत्या करना नहीं है, लेकिन उसके कृत्य से मौत हो जाती है, तो ऐसे मामलों में धारा 304 पार्ट-II लागू हो सकती है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई में अहम भूमिका निभा सकता है।
फैसले का असर
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि हर मौत के मामले में एक जैसी सजा नहीं दी जा सकती। घटना कैसे हुई, झगड़ा किस वजह से शुरू हुआ, आरोपी का इरादा क्या था और रिकॉर्ड में क्या सबूत हैं, इन सभी बातों को साथ देखकर फैसला किया जाएगा।
इस फैसले से यह भी साफ होता है कि अगर रिकॉर्ड से हत्या की पहले से कोई योजना साबित नहीं होती और घटना अचानक हुए झगड़े का नतीजा होती है, तो कोर्ट सजा तय करते समय इन परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं करेगी।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि दोषसिद्धि और सजा दो अलग-अलग पहलू हैं। कई मामलों में दोषसिद्धि बरकरार रह सकती है, लेकिन अगर लंबे समय का अंतर, आरोपी की उम्र, जेल में बिताया गया समय और मामले की परिस्थितियां राहत देने का आधार बनती हैं, तो सजा कम की जा सकती है।
यह फैसला आने वाले समय में उन मामलों के लिए भी अहम माना जाएगा, जहां किसी व्यक्ति की मौत अचानक हुए झगड़े में हुई हो और यह विवाद इस बात पर हो कि आरोपी का हत्या का इरादा था या नहीं। ऐसे मामलों में कोर्ट केवल आरोप नहीं, बल्कि रिकॉर्ड में मौजूद सबूत और घटना की पूरी परिस्थितियों को देखकर ही सजा तय करेगी।
