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7वें वेतन आयोग पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : सेवानिवृत्त कर्मचारियों का अतिरिक्त पेंशन कम्यूटेशन का दावा खारिज, कहा-विकल्प चुनने के बाद बदला नहीं जा सकता निर्णय

Rajasthan High Court Rejects Additional Pension Commutation Claim Under 7th Pay Commission, Upholds Employee's Chosen Option

सेवानिवृत्त कर्मचारियों को हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश— पहले चुने गए विकल्प के विपरीत बाद में अतिरिक्त आर्थिक लाभ नहीं मांगा जा सकता

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के हजारों पेंशनभोगियों को प्रभावित करने वाले एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी सेवानिवृत्त कर्मचारी ने 7वें वेतन आयोग लागू होने के बाद उपलब्ध विकल्पों में से एक विकल्प अपनी इच्छा से चुन लिया है, तो बाद में वह उसी निर्णय के विपरीत अतिरिक्त कम्यूटेशन राशि (Differential Commuted Value of Pension) का दावा नहीं कर सकता।

जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस नूपुर भाटी की विशेष खंडपीठ ने याचिकाकर्ता ओमकार भारती और अजीत सिंह की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह महत्वपूर्ण फैसला दिया है।

दोनों याचिकाओं में एक ही प्रकार का कानूनी विवाद होने के कारण अदालत ने एक साझा फैसला देते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), जोधपुर द्वारा दिए गए आदेश को सही ठहराया और दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं।

रिपोर्टेबल जजमेंट में राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां कानून किसी कर्मचारी को विकल्प देता है और कर्मचारी उस विकल्प का उपयोग कर लेता है, वहां बाद में उसके विपरीत लाभ की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कार्यपालिका द्वारा जारी कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum), यदि वैधानिक नियमों के अनुरूप और उनके पूरक स्वरूप में हो, तो उसे नियमों के विपरीत नहीं माना जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता ओमकार भारती सैन्य अभियंता सेवा (Military Engineer Services) में इलेक्ट्रिशियन के पद से 31 जनवरी 2016 को सेवानिवृत्त हुए थे।

उनकी नियुक्ति वर्ष 1979 में स्विच बोर्ड अटेंडेंट के रूप में हुई थी और लगभग 36 वर्षों की सेवा के बाद वे सेवानिवृत्त हुए।

सेवानिवृत्ति के समय उन्हें तत्कालीन वेतनमान के अनुसार पेंशन स्वीकृत हुई और पेंशन का 40 प्रतिशत हिस्सा कम्यूट (Commutation) कर एकमुश्त राशि प्राप्त कर ली गई।

इसी बीच केंद्र सरकार ने 7वें केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2016 से लागू कर दीं।

इसके बाद याचिकाकर्ता की पेंशन में संशोधन हुआ और संशोधित पीपीओ (Pension Payment Order) जारी किया गया।

याचिकाकर्ता को संशोधित पेंशन और उसका एरियर तो मिल गया, लेकिन उनका कहना था कि संशोधित पेंशन के आधार पर उन्हें अतिरिक्त कम्यूटेशन राशि भी मिलनी चाहिए थी, जो सरकार ने नहीं दी। इसी मांग को लेकर वे पहले विभाग, फिर CAT और अंत में राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचे।

पहले विभाग, फिर CAT और अंत में हाईकोर्ट पहुंचे

सबसे पहले याचिकाकर्ता ने संबंधित विभाग के समक्ष कई अभ्यावेदन प्रस्तुत किए।

इसके बाद मामला केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), जोधपुर पहुंचा। CAT ने विभाग को अभ्यावेदन पर कारणयुक्त (Speaking Order) आदेश पारित करने का निर्देश दिया।

इसके पालन में विभाग ने 10 मई 2022 को विस्तृत आदेश जारी करते हुए अतिरिक्त कम्यूटेशन देने से इनकार कर दिया।

इसके विरुद्ध पुनः CAT में मूल आवेदन दायर किया गया, लेकिन CAT ने भी 22 अक्टूबर 2024 को आवेदन खारिज कर दिया।

इसके बाद याचिकाकर्ता राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचे।

याचिकाकर्ता की मुख्य दलील

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि 7वें वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2016 से लागू हुईं और उनकी पेंशन पूर्व प्रभाव से बढ़ाई गई।

जब पेंशन बढ़ी तो पेंशन के कम्यूटेशन की राशि भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए थी।

याचिका में कहा गया कि केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन कम्यूटेशन) नियम, 1981 के नियम 10 के अनुसार यदि पेंशन बाद में संशोधित होती है, तो कम्यूटेशन की अंतर राशि स्वतः देय हो जाती है।

सरकार कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) के आधार पर उनके वैधानिक अधिकार को समाप्त नहीं कर सकती।

याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्हें संशोधित पेंशन के अनुसार अतिरिक्त कम्यूटेशन राशि मिलनी ही चाहिए।

केंद्र सरकार ने क्या कहा?

भारत सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए हाईकोर्ट में जवाब दिया गया कि 7वें वेतन आयोग के लागू होने के बाद 24 अक्टूबर 2016 को एक विशेष कार्यालय ज्ञापन जारी किया गया था।

इस ज्ञापन के अनुसार 1 जनवरी 2016 से 4 अगस्त 2016 के बीच सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों को दो विकल्प दिए गए थे—

  • पहले से प्राप्त कम्यूटेशन को यथावत रखना।
  • संशोधित पेंशन के आधार पर अतिरिक्त कम्यूटेशन लेना।

सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी इच्छा से पहला विकल्प चुना था।

इसलिए अब वर्षों बाद दूसरा विकल्प चुनकर अतिरिक्त राशि मांगना कानूनन स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने समझा पहले पूरा वित्तीय गणित

हाईकोर्ट ने इस मामले में केवल कानूनी पहलुओं पर ही नहीं, बल्कि पूरे आर्थिक प्रभाव का भी विश्लेषण किया।

अदालत ने पाया कि सेवानिवृत्ति के समय—

  • मूल पेंशन : ₹9,475 प्रतिमाह
  • 40 प्रतिशत कम्यूटेशन : ₹3,790 प्रतिमाह
  • एकमुश्त कम्यूटेशन राशि : लगभग ₹3.72 लाख
  • शेष मासिक पेंशन : ₹5,685

बाद में 7वें वेतन आयोग लागू होने के बाद—

  • संशोधित पेंशन : ₹26,000 प्रतिमाह

लेकिन याचिकाकर्ता ने पुराना कम्यूटेशन ही जारी रखने का विकल्प चुना।

इस कारण उनके मासिक पेंशन से केवल ₹3,790 ही कटते रहे और उन्हें ₹22,210 प्रतिमाह पेंशन मिलती रही।

यदि दूसरा विकल्प चुनते तो क्या होता?

अदालत ने अपने फैसले में तुलना करते हुए बताया कि यदि याचिकाकर्ता संशोधित पेंशन के अनुसार नया कम्यूटेशन लेते तो—

उन्हें लगभग ₹6.50 लाख अतिरिक्त एकमुश्त राशि मिल सकती थी। लेकिन हर महीने ₹10,400 कम्यूटेशन कटता।

परिणामस्वरूप उनकी मासिक पेंशन घटकर ₹15,600 रह जाती।

जबकि वर्तमान व्यवस्था में -कोई अतिरिक्त एकमुश्त राशि नहीं मिली। लेकिन हर महीने ₹22,210 पेंशन मिलती रही।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता वास्तव में किसी आर्थिक नुकसान में नहीं थे, बल्कि वे अधिक मासिक पेंशन प्राप्त कर रहे थे।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

खंडपीठ ने कहा कि यह विवाद वास्तव में संशोधित पेंशन का नहीं, बल्कि चुने गए विकल्प का है।

हाईकोर्ट ने कहा कि पेंशन कम्यूटेशन पूरी तरह कर्मचारी की स्वैच्छिक पसंद (Election) पर आधारित व्यवस्था है।

अदालत ने कहा कि नियम 5 स्वयं कर्मचारी को विकल्प चुनने का अधिकार देता है, जबकि नियम 10 केवल यह बताता है कि यदि कम्यूटेशन लिया गया हो और बाद में पेंशन संशोधित हो जाए, तो किन परिस्थितियों में अंतर राशि देय होगी।

कोर्ट ने कहा कि नियम 10 को अलग-थलग पढ़कर नहीं देखा जा सकता। इसे नियम 5 तथा 24 अक्टूबर 2016 के कार्यालय ज्ञापन के साथ सामंजस्य स्थापित करके पढ़ना होगा।

कार्यालय ज्ञापन नियमों के खिलाफ नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 24 अक्टूबर 2016 का कार्यालय ज्ञापन किसी वैधानिक नियम को समाप्त या संशोधित नहीं करता।

बल्कि यह केवल उन कर्मचारियों के लिए एक विशेष संक्रमणकालीन व्यवस्था (Transitional Arrangement) उपलब्ध कराता है, जो 7वें वेतन आयोग के लागू होने और संशोधित वेतन अधिसूचना जारी होने के बीच सेवानिवृत्त हुए थे।

इसलिए इस कार्यालय ज्ञापन को नियमों के विपरीत नहीं माना जा सकता।

विकल्प चुनने के बाद पलटना उचित नहीं

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने पूर्ण जानकारी और अपनी इच्छा से कोई विकल्प चुन लिया है, तो बाद में केवल इसलिए उसे बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि दूसरा विकल्प आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी प्रतीत हो रहा है।

अदालत ने माना कि ऐसा करने से प्रशासनिक व्यवस्था और पेंशन प्रणाली में अनिश्चितता उत्पन्न होगी।

CAT का आदेश सही ठहराया

हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने सभी तथ्यों, नियमों, कार्यालय ज्ञापन तथा याचिकाकर्ता द्वारा चुने गए विकल्प का सही मूल्यांकन किया था।

इसलिए CAT के आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं।

हजारों पेंशनभोगियों पर पड़ेगा प्रभाव

हाईकोर्ट का यह फैसला विशेष रूप से उन केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो 1 जनवरी 2016 से 4 अगस्त 2016 के बीच सेवानिवृत्त हुए।

जिन्होंने 7वें वेतन आयोग लागू होने के बाद कम्यूटेशन से जुड़ा विकल्प चुना। और अब अतिरिक्त कम्यूटेशन राशि की मांग कर रहे हैं।

इस फैसले से स्पष्ट संकेत मिला है कि यदि कर्मचारी ने उपलब्ध विकल्पों में से किसी एक को स्वेच्छा से स्वीकार किया है, तो बाद में उसे बदलकर अतिरिक्त लाभ प्राप्त करने का अधिकार स्वतः नहीं बनता।

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