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राजस्व गांव बनाने का फैसला सरकार का प्रशासनिक निर्णय, राजनीतिक नेता की सिफारिश से निर्णय अवैध नहीं हो जाता-राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Upholds Government's Power to Create Revenue Villages, Rejects Political Influence Allegations in Khichan Vistar Case

खीचन विस्तार राजस्व गांव विवाद पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: राजनीतिक दबाव के आरोप खारिज, कहा- स्पष्ट मनमानी या कानून के उल्लंघन के बिना अदालत नहीं करेगी हस्तक्षेप

जोधपुर। राजस्थान में नए राजस्व गांवों के गठन को चुनौती देने वाली याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका प्रभाव भविष्य में प्रदेश में बनने वाले नए राजस्व गांवों और पंचायतों से जुड़े विवादों पर भी पड़ सकता है।

जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने फलोदी जिले के “खीचन विस्तार” राजस्व गांव के गठन को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि राजस्व गांव का गठन, विभाजन अथवा सीमाओं में परिवर्तन राज्य सरकार का प्रशासनिक अधिकार है और केवल तथ्यों पर आधारित ठोस अवैधता, दुर्भावना (माला फाइड) या निर्धारित प्रक्रिया के स्पष्ट उल्लंघन की स्थिति में ही कोर्ट हस्तक्षेप करेगा।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस फैसले के जरिए प्रशासनिक निर्णयों में राजनीतिक प्रतिनिधियों द्वारा दिए गए सुझावों अथवा अभ्यावेदनों को स्वतः अवैध मानने से इनकार किया है।

क्या था पूरा मामला

फलोदी जिले के निवासी सत्यनारायण सिंह राजपुरोहित ने राजस्थान सरकार द्वारा 13 दिसंबर 2025 को जारी अधिसूचना को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

इस अधिसूचना के माध्यम से “खीचन विस्तार” नाम से नए राजस्व गांव का गठन किया गया था।

याचिका में अनुरोध किया गया था कि सरकार की इस अधिसूचना को निरस्त किया जाए तथा राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 101 के तहत नई प्रक्रिया अपनाए बिना “खीचन विस्तार” नाम से किसी पंचायत अथवा गांव का गठन नहीं किया जाए।

सरकार ने पहले जारी किए थे दिशा-निर्देश

सुनवाई के दौरान सरकार के रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि राज्य सरकार ने वर्ष 2025 में पंचायत परिसीमन और नए ग्राम पंचायतों के गठन के लिए कई चरणों में दिशा-निर्देश जारी किए थे।

10 जनवरी 2025 को जिला कलेक्टरों के लिए मानक निर्धारित किए गए।

इसके बाद 10 फरवरी 2025 को परिसीमन संबंधी मानदंड जारी किए गए।

19 फरवरी 2025 को कुछ मानकों में 20 प्रतिशत तक छूट दी गई।

10 मार्च 2025 को विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की गई तथा 18 मार्च 2025 को सभी जिला कलेक्टरों को प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए गए।

22 मार्च 2025 को बना था “खीचन विस्तार”

इन सभी प्रक्रियाओं के बाद 22 मार्च 2025 को राज्य सरकार ने फलोदी जिले में कई नए राजस्व गांवों का गठन किया, जिनमें “खीचन विस्तार” भी शामिल था।

जिला कलेक्टर को पुराने तथा नए गांवों के राजस्व अभिलेख पृथक रखने के निर्देश दिए गए।

गांव वालों ने जताया विरोध

नए गांव के गठन के बाद स्थानीय लोगों ने आपत्तियां दर्ज कराईं।

पंचायत राज विभाग ने सभी आपत्तियों को आमंत्रित करने के निर्देश दिए, जिसके बाद 7 अप्रैल 2025 को सार्वजनिक सूचना जारी हुई।

याचिकाकर्ता सहित अनेक ग्रामीणों ने “खीचन विस्तार” के गठन का विरोध किया और कहा कि यह निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है।

इसके बाद पंचायत राज विभाग के प्रमुख सचिव ने जिला प्रशासन को जांच करने के निर्देश दिए।

दूरी को लेकर था सबसे बड़ा विवाद

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क था कि मूल गांव खीचन और नए गांव “खीचन विस्तार” के बीच की दूरी सरकार द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है।

इस संबंध में अतिरिक्त जिला कलेक्टर द्वारा संयुक्त निरीक्षण कराया गया।

रिपोर्ट में बताया गया कि दोनों गांवों के आबादी केंद्रों के बीच उपलब्ध मार्गों से दूरी क्रमशः लगभग 2.01 किलोमीटर, 3.55 किलोमीटर तथा न्यूनतम 1 किलोमीटर है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नए गांव का गठन प्रशासनिक सुविधा, पर्यटन विकास तथा समग्र विकास की दृष्टि से आवश्यक है।

पहले रद्द हुआ, फिर दोबारा बना गांव

मामले में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह भी रहा कि बाद में एक दूसरी रिपोर्ट में कुछ खसरा नंबरों की निकटता का उल्लेख किया गया।

जिला कलेक्टर ने सितंबर 2025 में यह राय दी कि नया गांव निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है और इसे निरस्त किया जाना चाहिए।

इसके आधार पर 17 नवंबर 2025 को सरकार ने पहले जारी अधिसूचना वापस लेते हुए “खीचन विस्तार” को समाप्त कर दिया।

लेकिन इसके तुरंत बाद सत्तारूढ़ दल के एक जनप्रतिनिधि ने सरकार को अभ्यावेदन देकर गांव को पुनः बहाल करने की मांग की।

इसके बाद पूरे मामले की दोबारा समीक्षा हुई और सरकार ने 13 दिसंबर 2025 को नई अधिसूचना जारी कर पुनः “खीचन विस्तार” राजस्व गांव का गठन कर दिया।

याचिकाकर्ता ने लगाए राजनीतिक दबाव के आरोप

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि सरकार ने बिना किसी नए तथ्य के पहले रद्द किए गए निर्णय को दोबारा लागू कर दिया।

यह भी आरोप लगाया गया कि पूरा निर्णय राजनीतिक दबाव में लिया गया क्योंकि एक स्थानीय राजनीतिक नेता के पत्र के बाद सरकार ने अपना फैसला बदल दिया।

याचिका में यह भी कहा गया कि दूसरी रिपोर्ट में स्वयं उल्लेख है कि दोनों गांवों के कुछ खसरा नंबर एक-दूसरे से सटे हुए हैं, इसलिए नया गांव बनाना नियमों के विपरीत है।

सरकार ने क्या कहा

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि दोनों जांच रिपोर्टों में वास्तविक दूरी निर्धारित मानकों से अधिक पाई गई है।

सरकार ने कहा कि केवल कुछ खसरा नंबरों का एक-दूसरे से लगा होना यह साबित नहीं करता कि दोनों गांवों के आबादी केंद्र भी एक ही स्थान पर हैं।

सरकार ने यह भी कहा कि राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 16 के तहत नए गांव बनाना, समाप्त करना या सीमाएं बदलना राज्य सरकार का विशेष अधिकार है।

इसलिए न्यायालय को इस प्रशासनिक निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

हाईकोर्ट ने सभी रिकॉर्ड, दोनों जांच रिपोर्टों तथा सरकारी दिशा-निर्देशों का विस्तार से अध्ययन करते हुए पाया कि दोनों रिपोर्टों में गांवों के आबादी केंद्रों के बीच न्यूनतम एक किलोमीटर तथा अन्य मार्गों से उससे अधिक दूरी दर्ज की गई है।

हाईकोर्ट ने कहा कि दूसरी रिपोर्ट में केवल यह अतिरिक्त उल्लेख किया गया कि दोनों गांवों के कुछ खसरा नंबर परस्पर सटे हुए हैं।

लेकिन किसी भी नए राजस्व गांव की वैधता तय करने का आधार खसरा नंबरों की निकटता नहीं, बल्कि आबादी केंद्रों के बीच वास्तविक दूरी होती है।

इसलिए केवल खसरा नंबरों के सटे होने से पूरा निर्णय अवैध नहीं माना जा सकता।

याचिकाकर्ता दूरी साबित नहीं कर सके

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता दोनों सरकारी रिपोर्टों में दर्ज दूरी के तथ्यों को किसी विश्वसनीय साक्ष्य से गलत साबित नहीं कर सके।

न तो कोई स्वतंत्र माप प्रस्तुत की गई और न ही कोई ऐसा दस्तावेज जिससे सरकारी माप में त्रुटि सिद्ध होती।

ऐसी स्थिति में केवल आशंकाओं के आधार पर न्यायालय प्रशासनिक निर्णय में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

गजट अधिसूचना अंतिम नहीं

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि एक बार सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित हो जाने के बाद उसे बदला नहीं जा सकता।

इस तर्क को भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान अथवा बाध्यकारी न्यायिक फैसला प्रस्तुत नहीं कर सके, जिससे यह सिद्ध हो कि सरकार अपने प्रशासनिक निर्णय पर पुनर्विचार नहीं कर सकती।

यदि कानून सरकार को नया गांव बनाने का अधिकार देता है तो आवश्यकता पड़ने पर वह नई अधिसूचना भी जारी कर सकती है।

राजनीतिक नेता की सिफारिश से निर्णय अवैध नहीं

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण भाग राजनीतिक हस्तक्षेप से जुड़ा रहा।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कोई प्रशासनिक निर्णय अवैध नहीं हो जाता कि उसके पीछे किसी विधायक, जनप्रतिनिधि या राजनीतिक व्यक्ति का अभ्यावेदन हो।

जब तक यह साबित न हो कि निर्णय दुर्भावना, सत्ता के दुरुपयोग या कानून के उल्लंघन के कारण लिया गया है, तब तक अदालत राजनीतिक सिफारिश के आधार पर प्रशासनिक आदेश को रद्द नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्टों के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया।

विशेष रूप से कहा गया कि प्रशासनिक निर्णयों की वैधता इस आधार पर नहीं परखी जाती कि सुझाव किसने दिया, बल्कि इस आधार पर परखी जाती है कि निर्णय कानून और प्रक्रिया के अनुरूप है या नहीं।

अदालत ने यह भी दोहराया कि दुर्भावना के आरोप केवल अनुमान के आधार पर स्वीकार नहीं किए जा सकते, बल्कि उन्हें स्पष्ट साक्ष्यों से सिद्ध करना आवश्यक है।

राजस्व गांवों के गठन पर महत्वपूर्ण टिप्पणी

हाईकोर्ट ने राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 16 का उल्लेख करते हुए कहा कि नए राजस्व गांवों का गठन, समाप्ति अथवा सीमाओं का निर्धारण पूरी तरह सरकार का प्रशासनिक एवं नीतिगत अधिकार है।

राजस्व प्रशासन स्थानीय परिस्थितियों, प्रशासनिक सुविधा, भविष्य के विकास, भूगोल तथा जनहित को बेहतर ढंग से समझता है।

इसलिए न्यायालय सामान्यतः ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, जब तक स्पष्ट कानूनी त्रुटि सिद्ध न हो जाए।

आखिर में क्या हुआ

सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहे कि सरकार की 13 दिसंबर 2025 की अधिसूचना मनमानी, दुर्भावनापूर्ण अथवा निर्धारित प्रक्रिया के विरुद्ध थी।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।

साथ ही स्थगन आवेदन तथा अन्य लंबित प्रार्थना पत्रों का भी निस्तारण कर दिया।

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