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“पेंशन कोई खैरात नहीं”-44 साल बाद पूर्व वायुसेनाकर्मी को मिला न्याय: हाईकोर्ट ने 1980 से दिव्यांग पेंशन का पूरा बकाया देने का आदेश, सरकार की लापरवाही पर सख्त टिप्पणी

Rajasthan High Court Orders 44 Years of Disability Pension Arrears for Ex-Air Force Corporal, Says Pension Is a Right, Not Charity

79 वर्षीय पूर्व सैनिक रत्तीराम की चार दशक लंबी लड़ाई रंग लाई, कोर्ट बोला-“पेंशन अधिकार है, दया नहीं”; रिकॉर्ड नष्ट होने और नोटिस का सबूत न होने पर केंद्र सरकार को फटकार

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में भारतीय वायुसेना के पूर्व कॉर्पोरल रत्तीराम को बड़ी राहत देते हुए केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय को आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता रत्तीराम को वर्ष 1980 से बंद की गई दिव्यांगता पेंशन (Disability Pension) का पूरा बकाया भुगतान किया जाए।

देशभर के हजारों पूर्व सैनिकों और पेंशनभोगियों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसला देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी लापरवाही, रिकॉर्ड की कमी या प्रक्रियागत त्रुटियों के कारण किसी नागरिक के वैधानिक अधिकारों को अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता।

करीब 44 वर्षों तक अपने अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले 79 वर्षीय पूर्व सैनिक को न्याय देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि पेंशन कोई दान या अनुग्रह नहीं, बल्कि कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है, जिसे प्रशासनिक लापरवाही या रिकॉर्ड के अभाव के आधार पर छीना नहीं जा सकता।

जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी ने यह रिपोर्टेबल फैसला याचिकाकर्ता रत्तीराम की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

हाईकोर्ट ने यह आदेश सशस्त्र बल अधिकरण (Armed Forces Tribunal) के उस आदेश में संशोधन करते हुए दिया है, जिसमें याचिकाकर्ता को केवल वर्ष 2019 से दिव्यांगता पेंशन का लाभ दिया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब मेडिकल बोर्ड स्वयं यह स्वीकार कर चुका है कि याचिकाकर्ता की दिव्यांगता वर्ष 1980 से लगातार बनी हुई थी, तब बकाया राशि को केवल वर्ष 2019 से सीमित करना कानूनसम्मत नहीं है।

1964 में वायुसेना में भर्ती हुए थे रत्तीराम

हरियाणा के कुरुक्षेत्र निवासी रत्तीराम भारतीय वायुसेना में 22 जनवरी 1964 को भर्ती हुए थे।

उन्होंने लगभग 15 वर्षों तक सेवा देने के बाद 31 जनवरी 1979 को सेवा से अवकाश प्राप्त किया।

सेवा समाप्ति के समय गठित रिलीज मेडिकल बोर्ड ने पाया कि वे “ब्रोंकियल अस्थमा” नामक बीमारी से पीड़ित हैं, जो सैन्य सेवा के कारण उत्पन्न अथवा उससे प्रभावित हुई है।

मेडिकल बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता 30 प्रतिशत आंकी और इसे आजीवन माना।

इसी आधार पर उन्हें 1 फरवरी 1979 से 18 अगस्त 1980 तक दिव्यांगता पेंशन स्वीकृत की गई। लेकिन इसके बाद उनकी पेंशन अचानक बंद कर दी गई।

विभाग का कहना था कि रत्तीराम पुनर्मूल्यांकन मेडिकल बोर्ड (Re-survey Medical Board) के समक्ष उपस्थित नहीं हुए, इसलिए उनकी पेंशन रोक दी गई।

दूसरी ओर, रत्तीराम का लगातार यह कहना रहा कि उन्हें कभी भी किसी मेडिकल बोर्ड के समक्ष उपस्थित होने का कोई नोटिस या सूचना नहीं दी गई।

चार दशक तक जारी रहा संघर्ष

पेंशन बंद होने के बाद रत्तीराम ने विभिन्न स्तरों पर कई बार आवेदन और प्रतिनिधित्व प्रस्तुत किए।

रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि उन्होंने 31 मई 1990 को दिव्यांगता पेंशन बहाल करने और संशोधित करने के लिए आवेदन दिया था।

इसके बावजूद विभाग ने उनके आवेदन पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।

समय बीतता गया और अंततः रत्तीराम ने सशस्त्र बल अधिकरण, जयपुर पीठ के समक्ष मूल आवेदन संख्या 10/2014 दायर कर अपनी पेंशन बहाल करने की मांग की।

मामले की सुनवाई के दौरान अधिकरण ने 15 नवंबर 2018 को पुनः मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया ताकि यह जांचा जा सके कि याचिकाकर्ता की बीमारी की स्थिति क्या है।

2019 के मेडिकल बोर्ड ने बदल दी तस्वीर

अधिकरण के आदेश के बाद 19 नवंबर 2019 को पुनः सर्वे मेडिकल बोर्ड (RSMB) का गठन किया गया।

मेडिकल बोर्ड ने जांच के बाद यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला कि रत्तीराम अब भी ब्रोंकियल अस्थमा से पीड़ित हैं और उनकी दिव्यांगता 30 प्रतिशत बनी हुई है।

इतना ही नहीं, मेडिकल बोर्ड ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह दिव्यांगता 19 अगस्त 1980 से लगातार समान रूप से मौजूद रही है।

यानी मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट ने यह स्थापित कर दिया कि जिस बीमारी के आधार पर उन्हें दिव्यांगता पेंशन मिल रही थी, वह कभी समाप्त नहीं हुई थी और पेंशन बंद किए जाने का आधार कमजोर था।

अधिकरण ने राहत दी, लेकिन बकाया सीमित कर दिया

4 सितंबर 2023 को Armed Forces Tribunal ने रत्तीराम की याचिका स्वीकार करते हुए 30 प्रतिशत दिव्यांगता पेंशन, जिसे नियमों के अनुसार 50 प्रतिशत तक राउंड ऑफ किया गया, प्रदान करने का आदेश दिया।

हालांकि अधिकरण ने इसका लाभ केवल 19 नवंबर 2019 से देने का आदेश दिया और पूर्व अवधि का बकाया देने से इनकार कर दिया।

रत्तीराम ने Armed Forces Tribunal के इस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याचिका में कहा गया कि जब मेडिकल बोर्ड यह स्वीकार कर चुका है कि दिव्यांगता 1980 से लगातार बनी हुई थी, तब बकाया राशि भी उसी तारीख से मिलनी चाहिए, जब पेंशन रोकी गई थी।

हाईकोर्ट ने अधिकरण की गलती सुधारी

राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले का विस्तृत परीक्षण करते हुए कहा कि Armed Forces Tribunal ने याचिका स्वीकार तो कर ली, लेकिन बकाया भुगतान की तारीख निर्धारित करने में गंभीर त्रुटि कर दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि 2019 के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट स्पष्ट रूप से बताती है कि दिव्यांगता 1980 से लगातार बनी हुई थी। इसलिए 2019 को कट-ऑफ तिथि मानने का कोई कानूनी आधार नहीं है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की राय केवल वर्तमान स्थिति नहीं बताती, बल्कि यह भी प्रमाणित करती है कि दिव्यांगता पिछले कई दशकों से लगातार विद्यमान थी। ऐसे में पेंशन के बकाए को 1980 से न देना न्याय और कानून दोनों के विपरीत होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले Union of India vs Sgt. Girish Kumar (2026) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि दिव्यांगता पेंशन प्राप्त करना एक मूल्यवान अधिकार है और यदि कोई व्यक्ति उसका हकदार पाया जाता है तो लाभ उसी तारीख से दिया जाना चाहिए, जिस दिन से वह देय हुआ था। इसे केवल तकनीकी आधारों पर सीमित नहीं किया जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत वर्तमान मामले पर पूरी तरह लागू होता है और रत्तीराम को 19 अगस्त 1980 से ही बकाया राशि मिलनी चाहिए।

‘पेंशन कोई दया नहीं, अधिकार है’

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पेंशन किसी कर्मचारी पर सरकार की कृपा नहीं है, बल्कि उसकी वर्षों की सेवा का अर्जित अधिकार है।

कोर्ट ने कहा कि पेंशन का भुगतान किसी अधिकारी की इच्छा पर निर्भर नहीं करता, बल्कि नियमों और कानूनों द्वारा संरक्षित अधिकार है।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी कर्मचारी को उसकी वैधानिक पेंशन से वंचित करना गंभीर अन्याय है, विशेषकर तब जब उसने राष्ट्र की सेवा की हो और बीमारी भी सेवा से जुड़ी हुई हो।

सरकार के रिकॉर्ड पर भी उठाए सवाल

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि संबंधित विभागों ने याचिकाकर्ता के सेवा और चिकित्सा रिकॉर्ड नष्ट (weed out) कर दिए थे।

हाईकोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड नष्ट होना ही मामले के लंबे समय तक लंबित रहने का एक प्रमुख कारण रहा।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि विभाग स्वयं रिकॉर्ड सुरक्षित रखने में विफल रहा है तो उसका खामियाजा पूर्व सैनिक को नहीं भुगतना चाहिए। सरकार अपनी ही लापरवाही का लाभ नहीं उठा सकती।

नोटिस देने का कोई प्रमाण नहीं मिला

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि सरकार यह साबित नहीं कर सकी कि रत्तीराम को वास्तव में पुनः मेडिकल बोर्ड के समक्ष उपस्थित होने का कोई नोटिस दिया गया था।

रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं मिला जिससे यह सिद्ध हो सके कि उन्हें मेडिकल बोर्ड की तारीख बताई गई थी या उन्होंने जानबूझकर उपस्थित होने से इनकार किया था।

अदालत ने कहा कि बिना पर्याप्त सूचना दिए किसी व्यक्ति की दिव्यांगता पेंशन रोक देना उचित प्रक्रिया (Due Process) के विपरीत है।

79 वर्षीय पूर्व सैनिक के संघर्ष को किया सलाम

फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि रत्तीराम अब 79 वर्ष के हैं और पिछले चार दशकों से अपने वैधानिक अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि उन्होंने राष्ट्र की सेवा करते हुए बीमारी का सामना किया और उन्हें अपने अधिकार से केवल प्रशासनिक कारणों के चलते वंचित रखा गया।

कोर्ट ने कहा कि दिव्यांगता पेंशन का उद्देश्य उन सैनिकों को सम्मान और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है जिन्होंने देश की सेवा के दौरान शारीरिक कठिनाइयों का सामना किया है।

किसी भी ऐसी व्याख्या को स्वीकार नहीं किया जा सकता जो इस उद्देश्य को विफल कर दे।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि—

  • रत्तीराम को 19 अगस्त 1980 से लेकर वास्तविक भुगतान की तारीख तक दिव्यांगता पेंशन का पूरा बकाया दिया जाए।
  • पेंशन का भुगतान 30 प्रतिशत दिव्यांगता तत्व को 50 प्रतिशत तक राउंड ऑफ कर किया जाए।
  • चार माह के भीतर समस्त बकाया राशि का भुगतान किया जाए।
  • यदि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया जाता है तो शेष राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

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