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कैदी को मां के अंतिम संस्कार के बाद की रस्मों में शामिल होने का भी अधिकार: राजस्थान हाईकोर्ट ने कैदी को दी 3 दिन की आपात पैरोल

Rajasthan High Court Recognises Prisoner's Right To Attend Post-Funeral Rituals, Grants Emergency Parole

जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम और संवेदनशील मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी कैदी की मां का निधन हो जाता है, तो उसे केवल अंतिम संस्कार में शामिल होने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। यदि कानून में व्यवस्था है, तो उसे अंतिम संस्कार के बाद होने वाली धार्मिक और पारिवारिक रस्में निभाने के लिए भी आपात पैरोल दी जा सकती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल के नियम केवल सुरक्षा व्यवस्था के लिए नहीं बनाए गए हैं, बल्कि मानवीय परिस्थितियों में कैदियों को सीमित राहत देने के लिए भी हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल का प्रावधान ऐसे ही मानवीय हालात के लिए बनाया गया है। यदि किसी कैदी के परिवार में माता-पिता या अन्य करीबी रिश्तेदार की मौत हो जाती है और इस पर कोई विवाद नहीं है, तो नियमों के अनुसार उसे आपात पैरोल दी जा सकती है।

जस्टिस अनुरूप सिंघी की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कोटा केंद्रीय जेल में बंद एक सजायाफ्ता कैदी को उसकी मां के निधन के बाद अंतिम संस्कार से जुड़ी रस्में निभाने के लिए 3 दिन की पैरोल देने का आदेश दिया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय केवल दंड तक सीमित नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार संवेदनशीलता भी जरूरी है। यही कारण है कि इस मामले में कोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए याचिकाकर्ता को पैरोल देने का निर्णय लिया।

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कैसे पहुंचा मामला हाईकोर्ट तक?

यह मामला कोटा केंद्रीय जेल में बंद शिवा उर्फ बटला उर्फ शिवराज से जुड़ा था।

याचिका में बताया गया कि 13 जून 2026 को उसकी मां का निधन हो गया था। जिला कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट ने उस दिन उसे दोपहर 2 बजे से शाम 6 बजे तक अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति दी थी। अंतिम संस्कार में शामिल होने के बाद उसे वापस जेल भेज दिया गया।

इसके बाद कैदी ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि उसे अपनी मां के निधन के बाद होने वाली धार्मिक और पारिवारिक रस्मों में शामिल होने के लिए भी आपात पैरोल दी जाए।

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि राजस्थान कैदी पैरोल नियम, 2021 और राजस्थान असामाजिक गतिविधियां निवारण अधिनियम, 2006 के तहत उसे यह राहत मिल सकती है।

लेकिन सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने याचिका का विरोध किया। हालांकि उन्होंने इस बात से इनकार नहीं किया कि कैदी की मां का निधन हो चुका है। यानी इस बात पर कोई विवाद नहीं था कि कैदी की मां का निधन हो चुका है और वह अंतिम संस्कार में शामिल होकर वापस जेल लौट चुका था।

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पैरोल देने के पीछे का कानूनी आधार

राजस्थान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद कहा कि राजस्थान कैदी पैरोल नियम, 2021 के नियम 11 में ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट व्यवस्था की गई है।

कोर्ट ने कहा कि इन नियमों के तहत मानवीय हालातों में कैदियों को आपात पैरोल दी जा सकती है।

नियम 11 में यह भी प्रावधान है कि यदि किसी कैदी के पिता, माता, पति, पत्नी, बच्चे, भाई या अविवाहित बहन की मृत्यु हो जाती है, तो उसे निश्चित अवधि के लिए आपात पैरोल दी जा सकती है।

कोर्ट ने कहा कि मां के निधन पर कोई विवाद नहीं है। ऐसे में कैदी की अंतिम संस्कार के बाद होने वाली रस्मों में शामिल होने की मांग उचित है। ऐसी स्थिति में उसे नियमों के अनुसार राहत मिल सकती है।

कोर्ट ने माना कि यह मामला पूरी तरह मानवीय आधार पर विचार किए जाने योग्य है।

हाईकोर्ट ने क्यों दी राहत?

हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह लगे कि मां की मृत्यु को लेकर कोई विवाद है। साथ ही कैदी की मांग केवल अंतिम संस्कार के बाद होने वाली रस्मों में शामिल होने की थी। कोर्ट ने माना कि ऐसी परिस्थितियों में याचिका स्वीकार की जानी चाहिए।

पैरोल का उद्देश्य यह होता है कि कैदी को किसी आपात या पारिवारिक स्थिति में सीमित समय के लिए राहत दी जा सके। यह एक प्रकार की अस्थायी स्वतंत्रता होती है, जो सख्त शर्तों के साथ दी जाती है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने माना कि मां के निधन के बाद की रस्में एक वैध और अहम कारण हैं, जिसके आधार पर पैरोल दी जा सकती है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कैदी की 3 दिन की आपात पैरोल मंजूर कर दी।

साथ ही, कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि यह राहत केवल सीमित अवधि के लिए हो और इससे कानून-व्यवस्था पर कोई असर न पड़े।

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हाईकोर्ट ने लगाई पैरोल की शर्तें

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को 3 दिन की पैरोल देने का आदेश दिया, जो उसकी वास्तविक रिहाई की तारीख से प्रभावी होगी।

इसके साथ ही कोर्ट ने कुछ सख्त शर्तें भी निर्धारित कीं-

  • कैदी को 1,00,000 रुपये का निजी मुचलका भरना होगा।
  • इसके अलावा 50,000-50,000 रुपये के दो जमानतदार पेश करने होंगे।
  • इनमें से एक जमानतदार कैदी का करीबी पारिवारिक सदस्य होना अनिवार्य है।
  • एक जमानत के साथ अचल संपत्ति की गारंटी भी देनी होगी।

इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कैदी पैरोल के दौरान नियमों का पालन करे और समय पर वापस जेल लौटे।

पैरोल के दौरान सख्त निर्देश

हाईकोर्ट ने पैरोल के दौरान कैदी के व्यवहार को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

  • कैदी को पूरे पैरोल अवधि के दौरान शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखनी होगी।
  • वह किसी भी प्रकार की आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होगा।
  • पैरोल समाप्त होने के तुरंत बाद उसे जेल प्रशासन के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पैरोल के दौरान कैदी किसी अपराध में लिप्त पाया जाता है या उसके खिलाफ कोई शिकायत दर्ज होती है, तो उसकी पैरोल स्वतः रद्द कर दी जाएगी।

यह शर्तें यह स्पष्ट करती हैं कि हाईकोर्ट ने राहत देते समय कानून की सख्ती को भी बनाए रखा है।

प्रशासन को हाईकोर्ट का निर्देश

हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को आदेश दिया कि मामले की तत्काल जरूरत को देखते हुए यह आदेश बिना देरी के कोटा जेल अधीक्षक तक पहुंचाया जाए, ताकि कैदी को पैरोल का लाभ समय पर मिल सके।

कोर्ट ने कहा कि आदेश पर तुरंत अमल किया जाए, ताकि कैदी समय पर अपने परिवार के पास पहुंचकर जरूरी रस्में पूरी कर सके।

हाईकोर्ट ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि पैरोल की प्रक्रिया में कोई अनावश्यक देरी न हो और आदेश पर तुरंत अमल किया जाए।

समाज और कानून के बीच संतुलन वाला फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला कैदियों के अधिकारों और मानवीय दृष्टिकोण से अहम है।

हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल का मकसद केवल कुछ दिनों के लिए जेल से बाहर भेजना नहीं है। परिवार में किसी गंभीर घटना पर कैदी को मानवीय आधार पर राहत देना भी इसका उद्देश्य है।

फैसला यह भी बताता है कि यदि किसी कैदी के निकट संबंधी की मृत्यु हो जाए और कानून में उसका प्रावधान मौजूद हो, तो केवल अंतिम संस्कार ही नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाली जरूरी धार्मिक और पारिवारिक रस्मों में शामिल होने के लिए भी आपात पैरोल दी जा सकती है।

साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि ऐसी राहत बिना शर्त नहीं होगी। सुरक्षा, जमानत, समय पर जेल में वापसी और कानून-व्यवस्था का पालन करना कैदी के लिए अनिवार्य रहेगा।

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