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‘हाईकोर्ट CrPC में नई प्रक्रिया नहीं जोड़ सकती’: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्देश किए रद्द, कहा- कोर्ट अपने आदेश से नहीं बदल सकती कानून

Supreme Court Rules High Courts Cannot Alter Criminal Trial Procedure Prescribed Under Law

नई दिल्ली: भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोई भी हाईकोर्ट अपने आदेश के जरिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) में तय प्रक्रिया को बदल नहीं सकती और न ही मुकदमे की सुनवाई के बीच कोई नया चरण जोड़ सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कानून में चार्ज तय होने से पहले मंजूरी देने वाले अधिकारी की गवाही का प्रावधान नहीं है, तो कोर्ट अपने आदेश से ऐसी प्रक्रिया लागू नहीं कर सकती। इसलिए हर मामले में चार्ज तय होने से पहले मंजूरी देने वाले अधिकारी की गवाही कराना जरूरी नहीं बनाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के पास व्यापक अधिकार जरूर हैं, लेकिन वह अपने आदेश से CrPC में तय प्रक्रिया नहीं बदल सकती। मुकदमे की सुनवाई हमेशा उसी तरीके से होगी, जैसा कानून में लिखा गया है।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने यह टिप्पणी मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द करते हुए की, जिसमें राज्य की सभी विशेष कोर्टों और सेशन कोर्टों को चार्ज तय करने से पहले सैंक्शन देने वाले अधिकारी की गवाही दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे।

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पूरा मामला क्या था?

यह मामला मध्य प्रदेश के एक भ्रष्टाचार मामले से जुड़ा था। रवि शंकर सिंह के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सक्षम अधिकारी ने मंजूरी दी थी। उन्होंने इस मंजूरी को गलत बताते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी। लेकिन साथ ही भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई को लेकर सभी ट्रायल कोर्टों के लिए कुछ दिशा-निर्देश भी जारी कर दिए।

हाईकोर्ट ने कहा था कि भ्रष्टाचार निवारण कानून के मामलों में चार्ज तय करने से पहले ट्रायल कोर्ट अपने स्तर पर सैंक्शन देने वाले अधिकारी की गवाही दर्ज करे। हाईकोर्ट का कहना था कि इससे यह पता चल सकेगा कि मंजूरी सही तरीके से दी गई थी या नहीं और अधिकारी ने सभी तथ्यों पर विचार किया था या नहीं।

हाईकोर्ट ने कहा था कि अगर ट्रायल कोर्ट को लगे कि मुकदमा चलाने की मंजूरी में कोई बड़ी कमी है, तो वह उसी समय आरोपी को आरोपों से मुक्त कर सकती है। इसके बाद जांच एजेंसी नई मंजूरी लेकर दोबारा आरोपपत्र दाखिल कर सकती है।

इन्हीं निर्देशों को मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

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राज्य सरकार ने क्या आपत्ति उठाई ?

मध्य प्रदेश सरकार का कहना था कि हाईकोर्ट के ये निर्देश केवल इस एक मामले तक सीमित नहीं रहेंगे। यदि इन्हें लागू किया गया तो भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत चल रहे सभी मामलों में चार्ज तय होने से पहले एक नया चरण जुड़ जाएगा।

सरकार ने कहा कि इससे हर मुकदमे की सुनवाई लंबी होगी और आपराधिक मामलों की तय प्रक्रिया बदल जाएगी।

राज्य का यह भी कहना था कि कानून में जहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, वहां हाईकोर्ट अपने आदेश से नई प्रक्रिया लागू नहीं कर सकती।

नया ट्रायल स्टेज नहीं जोड़ा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों की सुनवाई किस तरह होगी, इसकी पूरी प्रक्रिया कानून में पहले से तय है।

कोर्ट ने कहा कि CrPC और अब लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में मुकदमे की सुनवाई के अलग-अलग चरण स्पष्ट रूप से बताए गए हैं। यदि कानून में किसी विशेष चरण का प्रावधान नहीं है, तो कोर्ट अपने आदेश से नया चरण नहीं जोड़ सकती।

कोर्ट ने कहा कि चार्ज तय होने से पहले सैंक्शन देने वाले अधिकारी की गवाही दर्ज कराने जैसी कोई प्रक्रिया कानून में नहीं है। ऐसी स्थिति में सभी ट्रायल कोर्टों को ऐसा करने का निर्देश देना सही नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में जो प्रक्रिया लिखी गई है, उसी के अनुसार मुकदमे चलेंगे।

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हाईकोर्ट की शक्ति की भी सीमा तय की

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की शक्तियों पर भी अहम टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को कई अधिकार मिले हैं, लेकिन इन अधिकारों का इस्तेमाल करके वह कानून में लिखी प्रक्रिया को बदल नहीं सकती और वह कानून में नई प्रक्रिया नहीं जोड़ सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक आदेश के जरिए CrPC को दोबारा नहीं लिखा जा सकता। यदि किसी कानून में बदलाव की जरूरत है, तो यह काम संसद का है, न कि कोर्ट का।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी कोर्ट को ऐसा आदेश देने का अधिकार नहीं है, जिससे पूरे देश या किसी राज्य की सभी ट्रायल कोर्टों में कानून से अलग नई प्रक्रिया लागू हो जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण कानून के मामलों की सुनवाई भी उसी प्रक्रिया के अनुसार होगी, जो CrPC या BNSS और संबंधित कानून में तय की गई है।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर निर्देश जारी किए थे।

कोर्ट ने माना कि चार्ज तय होने से पहले सैंक्शन देने वाले अधिकारी की गवाही दर्ज कराने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। ऐसे में हाईकोर्ट द्वारा जारी किए गए सभी दिशा-निर्देश कानून के अनुरूप नहीं हैं।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उन दिशा-निर्देशों को रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया कि उसका फैसला सिर्फ हाईकोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों तक सीमित है। रवि शंकर सिंह के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी सही थी या नहीं, इस सवाल पर कोर्ट ने कोई अलग राय नहीं दी। मुकदमा चलाने की मंजूरी को लेकर मूल विवाद पर उसने कोई अलग टिप्पणी नहीं की।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का असर

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत चलने वाले मामलों के साथ-साथ सभी आपराधिक मुकदमों के लिए अहम है।

कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मुकदमे की सुनवाई कानून में तय प्रक्रिया के अनुसार ही होगी। कोई भी कोर्ट अपने आदेश के जरिए उसमें नया चरण नहीं जोड़ सकती। फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि हाईकोर्ट के पास व्यापक संवैधानिक अधिकार होने के बावजूद वह कानून में लिखी प्रक्रिया को बदलने या नया नियम बनाने का अधिकार नहीं रखती।

इस निर्णय के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह सिद्धांत दोहराया है कि कानून बनाने और उसमें बदलाव करने का अधिकार विधायिका के पास है, जबकि कोर्ट का काम कानून की व्याख्या करना और उसका पालन सुनिश्चित कराना है।

यानी यदि किसी आपराधिक मुकदमे में कोई नई प्रक्रिया लागू करनी है, तो उसके लिए कानून में संशोधन करना होगा। केवल न्यायिक आदेश के आधार पर मुकदमे की सुनवाई का तरीका नहीं बदला जा सकता।

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