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‘सिर्फ आरोप काफी नहीं’: लूट और मारपीट के आरोपी को राजस्थान हाईकोर्ट ने दी जमानत, नाम FIR में नहीं और सह-आरोपी को मिली जमानत का मिला फायदा

Rajasthan High Court Clarifies Sealed Cover Rule In Promotion Cases

जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच ने लूट और मारपीट के एक मामले में आरोपी को जमानत देते हुए कहा है कि किसी आरोपी को लंबे समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता, यदि रिकॉर्ड में उसके खिलाफ ऐसी परिस्थितियां नहीं हैं जो हिरासत जारी रखने को जरूरी बनाती हों।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी आरोपी का नाम एफआईआर में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हो, उसका आपराधिक इतिहास न हो और सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी हो, तो ऐसे में आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखना उचित नहीं है।

हाईकोर्ट ने इस मामले में यही माना कि एफआईआर में आरोपी का नाम नहीं है, उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है और इसी मामले में एक सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है। ऐसे में आरोपी को लगातार जेल में रखने का कोई खास कारण नहीं बनता।

हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि जमानत देना आरोपी को दोषमुक्त घोषित करना नहीं है। ट्रायल के दौरान आरोपों की सच्चाई का फैसला अलग से होगा। फिलहाल रिकॉर्ड में मौजूद तथ्यों को देखते हुए आरोपी को जमानत दी जा सकती है। हालांकि कोर्ट ने जमानत के साथ कई सख्त शर्तें भी लगाईं, ताकि ट्रायल और जांच किसी तरह प्रभावित न हो।

जस्टिस अनुरूप सिंघी की एकल पीठ ने भरतपुर जिले के गोपालगढ़ थाना क्षेत्र में दर्ज लूट और मारपीट के एक मामले में आरोपी मुबारिक की जमानत याचिका मंजूर करते हुए यह आदेश पारित किया।

क्या था पूरा मामला ?

यह मामला भरतपुर जिले के गोपालगढ़ थाना में 24 जून 2020 को दर्ज एफआईआर संख्या 92/2020 से जुड़ा है।

एफआईआर में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323, 341 और 382 के तहत मामला दर्ज किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि शिकायतकर्ता के साथ मारपीट की गई और उससे नकदी, मोबाइल फोन समेत मोटरसाइकिल छीन ली गई।

इस मामले में मुबारिक को 8 मई 2026 को गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उसने राजस्थान हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर की।

जमानत के लिए आरोपी की दलील क्या थी?

आरोपी की ओर से कहा गया कि उसे इस मामले में गलत तरीके से फंसाया गया है और उसने कोई अपराध नहीं किया।

उसके वकील ने कोर्ट को बताया कि जिस एफआईआर के आधार पर मामला दर्ज हुआ, उसमें मुबारिक का नाम ही नहीं है। वहीं, एफआईआर में जिसका नाम साफ तौर पर दर्ज है, उस सह-आरोपी साबिर को राजस्थान हाईकोर्ट पहले ही जमानत दे चुका है।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि मुबारिक का पहले किसी भी आपराधिक मामले से कोई संबंध नहीं रहा है। उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह 8 मई 2026 से जेल में बंद है।

आरोपी की ओर से यह भरोसा भी दिया गया कि यदि उसे जमानत मिलती है तो वह जांच और ट्रायल में पूरा सहयोग करेगा और कोर्ट के हर निर्देश का पालन करेगा।

दूसरी ओर, सरकारी पक्ष ने आरोपी को जमानत देने का विरोध किया। हालांकि, कोर्ट के आदेश में यह नहीं बताया गया कि सरकार ने जमानत का विरोध किन आधारों पर किया।

जमानत के लिए हाईकोर्ट ने किन बातों को माना अहम?

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने केस से जुड़े रिकॉर्ड को देखा।

कोर्ट ने सबसे पहले इस बात पर ध्यान दिया कि इसी मामले में सह-आरोपी साबिर को पहले ही जमानत मिल चुकी है। कोर्ट ने यह भी देखा कि मुबारिक का नाम एफआईआर में दर्ज नहीं है।

इसके अलावा हाईकोर्ट ने इस बात को भी अहम माना कि आरोपी का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिससे यह लगे कि वह पहले किसी दूसरे आपराधिक मामले में शामिल रहा है।

कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी 8 मई 2026 से लगातार जेल में है। इन सभी तथ्यों को एक साथ देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि फिलहाल आरोपी को जेल में बनाए रखने से कोई खास कारण पूरा नहीं होगा। इसलिए उसे जमानत दी जा सकती है।

हालांकि हाईकोर्ट ने साफ किया कि जमानत देने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी बेगुनाह है। मामले में कौन सही है और कौन गलत, इसका फैसला ट्रायल के दौरान सबूतों के आधार पर होगा।

हाईकोर्ट का फैसला: जमानत मंजूर

राजस्थान हाईकोर्ट ने मुबारिक की जमानत याचिका मंजूर कर ली।

कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि आरोपी किसी दूसरे मामले में वांछित नहीं है, तो उसे 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के दो जमानतदार पेश करने के बाद रिहा किया जाए।

साथ ही कोर्ट ने कहा कि आरोपी को ट्रायल पूरा होने तक हर सुनवाई पर कोर्ट में उपस्थित होना होगा। जब भी ट्रायल कोर्ट बुलाएगी, उसे वहां पेश होना पड़ेगा।

हाईकोर्ट ने जमानत के साथ कई शर्तें भी लगाईं

आरोपी को जमानत देने के साथ ही हाईकोर्ट ने कई सख्त शर्तें भी लगाई हैं:

  • आरोपी बिना कोर्ट की अनुमति के देश नहीं छोड़ सकता।
  • वह किसी भी समान अपराध में शामिल नहीं होगा।
  • गवाहों को प्रभावित करने या धमकाने की कोशिश नहीं करेगा।
  • किसी भी प्रकार के साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा।
  • उसे हर सुनवाई में कोर्ट के सामने उपस्थित होना होगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपी भविष्य में किसी समान मामले में शामिल पाया जाता है, तो अभियोजन पक्ष उसकी जमानत रद्द कराने के लिए आवेदन कर सकता है।

‘जमानत का आधार ‘परिस्थिति’, न कि केवल आरोप’

राजस्थान हाईकोर्ट का यह आदेश स्पष्ट करता है कि जमानत पर फैसला करते समय कोर्ट केवल आरोपों को ही नहीं देखती, बल्कि पूरे रिकॉर्ड और मामले की परिस्थितियों पर भी गौर करती है।

यदि एफआईआर में आरोपी का नाम नहीं हो, उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड न हो, वह काफी समय से जेल में हो और मामले में सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी हो, तो ये सभी बातें जमानत देने के पक्ष में महत्वपूर्ण आधार बन सकती हैं।

साथ ही यह फैसला यह भी साफ करता है कि जमानत मिलने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी बेगुनाह साबित हो गया। ट्रायल के दौरान सबूतों की जांच होगी और उसके बाद ही यह तय होगा कि आरोपी दोषी है या नहीं।

हाईकोर्ट ने इस मामले में यह भी स्पष्ट किया कि जमानत के साथ लगाई गई शर्तों का पालन करना जरूरी होगा। यदि आरोपी इन शर्तों का उल्लंघन करता है, गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश करता है, सबूतों से छेड़छाड़ करता है या भविष्य में इसी तरह के किसी दूसरे मामले में शामिल पाया जाता है, तो उसकी जमानत रद्द भी की जा सकती है।

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