जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन से जुड़े एक अहम मामले में साफ कर दिया है कि केवल सस्पेंशन खत्म होने के आधार पर किसी कर्मचारी का सीलबंद कवर नहीं खोला जा सकता। अगर कर्मचारी के खिलाफ चार्जशीट के बाद क्रिमिनल केस लंबित है, तो उसे प्रमोशन का लाभ नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में ‘सीलबंद लिफाफा प्रक्रिया’ (सील्ड कवर प्रोसीजर) को बिना शर्त लागू करना प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच और क्रिमिनल केस दोनों अलग-अलग बातें हैं और दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता। हालांकि, इस मामले में कर्मचारी बाद में क्रिमिनल केस से बरी हो चुका था और सरकार उसका सीलबंद कवर पहले ही खोल चुकी थी। इसलिए उसे मिली राहत बरकरार रखी गई।
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने यह फैसला राज्य सरकार की अपील पर सुनाया। कोर्ट ने सिंगल जज के उस हिस्से को कानून के मुताबिक सही नहीं माना, जिसमें कहा गया था कि सस्पेंशन खत्म होने के बाद, भले ही कर्मचारी के खिलाफ क्रिमिनल केस लंबित हो, उसका सीलबंद कवर खोलकर प्रमोशन पर विचार किया जा सकता है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला राजस्थान सरकार और डॉ. अनिल कुमार पालीवाल के बीच चल रहे विवाद से जुड़ा है।
यह मामला सरकारी कर्मचारी डॉ. अनिल कुमार पल्लीवाल के प्रमोशन से जुड़ा है। प्रमोशन नहीं मिलने पर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उनकी याचिका पर सिंगल जज ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।
सिंगल जज ने 28 मार्च 2025 को दिए अपने फैसले में कहा था कि अगर किसी सरकारी कर्मचारी का सस्पेंशन खत्म हो गया है, तो उसके खिलाफ क्रिमिनल केस चल रहा हो, तब भी प्रमोशन के लिए रखा गया सीलबंद कवर खोला जा सकता है। इसी फैसले को राज्य सरकार ने डिवीजन बेंच में चुनौती दी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि सिंगल जज ने 2008 के सर्कुलर के क्लॉज 12.7 की व्याख्या गलत तरीके से की थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सर्कुलर की क्लॉज 12.7 केवल विभागीय जांच से जुड़े मामलों पर लागू होती है। लेकिन जब किसी कर्मचारी के खिलाफ क्रिमिनल केस चल रहा हो, तो उसकी स्थिति अलग होती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी कर्मचारी के खिलाफ क्रिमिनल केस अभी भी चल रहा है, तो सिर्फ सस्पेंशन खत्म होने की वजह से उसे प्रमोशन नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामलों में सीलबंद कवर नहीं खोला जा सकता, क्योंकि इससे सरकारी व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
सीलबंद लिफाफा प्रक्रिया पर कोर्ट के क्या कहा ?
राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि ‘सीलबंद लिफाफा प्रोसीजर’ किन मामलों में और किस स्थिति में लागू होगा।
हाईकोर्ट के अनुसार:
- यह प्रक्रिया मुख्य रूप से तब लागू होती है जब कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच या आपराधिक मामला गंभीर स्तर पर हो।
- केवल प्रारंभिक जांच (प्रिलिमिनरी इन्क्वायरी) के आधार पर इसे लागू नहीं किया जा सकता।
- लेकिन अगर चार्जशीट या चार्ज मेमो जारी हो चुका है, तब यह प्रक्रिया सही मानी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
राजस्थान हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.वी. जनकीरामन का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि सीलबंद कवर प्रक्रिया तभी लागू होती है, जब कर्मचारी को विभागीय चार्जशीट मिल चुकी हो या क्रिमिनल केस में चार्जशीट कोर्ट में दाखिल हो चुकी हो।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि केवल शुरुआती जांच या आरोपों के आधार पर कर्मचारी का प्रमोशन नहीं रोका जा सकता। लेकिन जब विभागीय कार्रवाई या आपराधिक मुकदमा औपचारिक रूप से शुरू हो जाए, तब सीलबंद कवर की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि:
- सिर्फ जांच या क्रिमिनल केस लंबित होने की वजह से किसी कर्मचारी का प्रमोशन नहीं रोका जा सकता।
- लेकिन अगर कर्मचारी के खिलाफ चार्जशीट या चार्ज मेमो जारी हो चुका है, तो प्रमोशन रोका जा सकता है।
- सिर्फ प्रिलिमिनरी इन्क्वायरी के आधार पर कर्मचारी को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता, क्योंकि ऐसी जांच कई बार लंबे समय तक चलती रहती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इसी कानूनी सिद्धांत को ध्यान में रखकर इस मामले का फैसला सुनाया गया।
हाईकोर्ट ने सिंगल जज का फैसला क्यों बदला?
हाईकोर्ट ने कहा कि सिंगल जज ने विभागीय जांच और क्रिमिनल केस में फर्क नहीं किया और विभागीय जांच और क्रिमिनल केस को एक जैसा मान लिया, जबकि कानून दोनों को अलग-अलग तरीके से देखता है।
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ सस्पेंशन खत्म होने की वजह से सीलबंद कवर नहीं खोला जा सकता। अगर ऐसा किया गया तो जिन कर्मचारियों के खिलाफ क्रिमिनल केस अभी भी चल रहे हैं, उन्हें भी प्रमोशन मिल जाएगा। इसलिए सिंगल जज का यह नजरिया कानून के मुताबिक सही नहीं है।
डॉ. पालीवाल को हाईकोर्ट से राहत कैसे मिली?
सुनवाई के दौरान कर्मचारी की ओर से कोर्ट को बताया गया कि अब वह क्रिमिनल केस से बरी हो चुका है। इसके बाद राज्य सरकार ने उसका सीलबंद कवर भी खोल दिया और उसे राहत दे दी।
हालांकि, सुनवाई के दौरान डॉ. पालीवाल क्रिमिनल केस से बरी हो चुके थे और सरकार उनका सीलबंद कवर भी खोल चुकी थी। इसलिए डिवीजन बेंच ने कहा कि सिंगल जज का कानूनी नजरिया सही नहीं था, लेकिन डॉ. पल्लीवाल को मिल चुकी राहत वापस नहीं ली जाएगी।
इसलिए राज्य सरकार की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सिंगल जज के फैसले का संबंधित हिस्सा रद्द कर दिया गया, लेकिन डॉ. पल्लीवाल को मिली राहत बरकरार रखी गई।
सरकारी कर्मचारियों पर फैसले का असर
राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला प्रमोशन और अनुशासन से जुड़े नियमों को संतुलित करने वाला है। कोर्ट ने एक तरफ प्रशासनिक अनुशासन को प्राथमिकता दी, वहीं दूसरी तरफ कर्मचारी के अधिकारों की भी रक्षा की।
राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन से जुड़े मामलों में अहम।
कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि:
- ‘सीलबंद लिफाफा’ कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गंभीर प्रक्रिया है।
- इसे लागू करने के लिए ठोस आधार होना जरूरी है।
- हर मामले में तथ्यों के अनुसार ही निर्णय लिया जाएगा।
इससे साफ हो गया है कि केवल सस्पेंशन खत्म होने से प्रमोशन का अधिकार नहीं बन जाता। अगर कर्मचारी के खिलाफ चार्जशीट के बाद क्रिमिनल केस लंबित है, तो सीलबंद कवर खोलने की मांग आसानी से स्वीकार नहीं की जाएगी।
यह फैसला विभागीय जांच और क्रिमिनल केस के बीच कानूनी अंतर भी स्पष्ट करता है। साथ ही, सरकारी विभागों और निचली कोर्टों के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि प्रमोशन से जुड़े मामलों में दोनों तरह की कार्यवाही को अलग-अलग आधार पर देखा जाएगा। भविष्य में ऐसे कई मामलों में इस फैसले का हवाला दिया जा सकता है।