नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के प्रयास (आईपीसी की धारा 307) से जुड़े मामलों पर बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि सिर्फ किसी व्यक्ति को गंभीर या जानलेवा चोट लग जाने से हत्या के प्रयास का अपराध साबित नहीं हो जाता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:
‘सिर्फ यह दिखाना काफी नहीं है कि किसी को गंभीर या जानलेवा चोट लगी है। पुलिस और प्रोसिक्यूशन को यह भी साबित करना होगा कि हमला करने वाले की मंशा सचमुच उसकी जान लेने की थी। अगर हत्या करने की मंशा साबित नहीं होती, तो सिर्फ गंभीर चोट या मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आईपीसी की धारा 307 नहीं लगाई जा सकती।’
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने तीन दोषियों की धारा 307 के तहत हुई सजा रद्द कर उसे धारा 325 (गंभीर चोट पहुंचाने) में बदल दिया।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमैकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि हत्या के प्रयास के मामलों में सबसे अहम सवाल यह होता है कि आरोपी की मंशा क्या थी। केवल मेडिकल रिपोर्ट में चोट को ‘जानलेवा’ बताया जाना या पीड़ित की हालत गंभीर होना अपने आप धारा 307 लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
झगड़े से शुरू हुआ मामला, हत्या के प्रयास तक पहुंचा?
यह मामला हरियाणा के रेवाड़ी जिले का है। जून 2000 में अमर सिंह नाम के रेलवे कर्मचारी ने गांव में एक झगड़े के दौरान बीच-बचाव करने की कोशिश की। आरोप था कि इसी दौरान रोशन लाल, सज्जन सिंह और सत्य प्रकाश ने लाठियों से उन पर हमला कर दिया। हमले में उनके सिर और शरीर पर गंभीर चोटें आईं। बाद में इलाज के दौरान डॉक्टरों ने चोटों को जान के लिए खतरनाक बताया। इसके बाद पुलिस ने पहले दर्ज एफआईआर में धारा 307 भी जोड़ दी।
ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपियों को हत्या के प्रयास और आपराधिक धमकी का दोषी मानते हुए सात-सात साल की सजा सुनाई। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद तीनों दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने बताया कब लागू होगी धारा 307?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हत्या के प्रयास का मामला तभी बनेगा, जब यह साबित हो जाए कि आरोपी किसी की जान लेना चाहता था।
कोर्ट ने कहा कि धारा 307 तभी लागू होगी, जब यह साबित हो कि आरोपी की मंशा किसी की जान लेने की थी। सिर्फ यह कह देना कि पीड़ित को गंभीर या जानलेवा चोट लगी, काफी नहीं है। आरोपी की मंशा भी साफ तौर पर साबित करनी होगी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि
‘अगर प्रोसिक्यूशन यह साबित नहीं कर पाता कि आरोपी किसी की जान लेना चाहता था या उसे यह जानकारी थी कि उसके हमले से निश्चित रूप से मौत हो सकती है, तो धारा 307 के तहत उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।‘
किन आधारों पर तय होगी हत्या की मंशा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी की मंशा सीधे दिखाई नहीं देती, इसलिए उसे मामले की परिस्थितियों से समझा जाता है। कोर्ट ने बताया कि इन बातों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा—
- हमला किस हथियार से किया गया।
- घटना के समय आरोपी क्या कह रहा था।
- हमले के पीछे कोई पुरानी दुश्मनी या मकसद था या नहीं।
- शरीर के किस हिस्से पर हमला किया गया।
- चोट कितनी गंभीर थी।
- हमला किस तरह और कितनी ताकत से किया गया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल साधारण चोट आने से धारा 307 खत्म नहीं हो जाती। अगर बाकी परिस्थितियों से हत्या की मंशा साबित होती है, तो धारा 307 लागू हो सकती है। वहीं, सिर्फ गंभीर चोट होने से भी धारा 307 अपने आप लागू नहीं होगी। हर मामले के तथ्यों के आधार पर आरोपी की मंशा अलग से साबित करनी होगी।
इस मामले में हत्या की मंशा क्यों नहीं मानी गई?
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद माना कि हमला तीनों आरोपियों ने ही किया था और इससे पीड़ित को गंभीर चोटें भी आईं। लेकिन कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि आरोपी पहले से हत्या करने की योजना बनाकर आए थे या उनकी मंशा उसकी जान लेने की थी।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में दोनों पक्षों के बीच किसी पुरानी दुश्मनी का भी जिक्र नहीं है। घटना अचानक उस समय हुई, जब पीड़ित किसी दूसरे झगड़े में बीच-बचाव करने पहुंचा था। ऐसे में यह हमला पहले से बनाई गई योजना का हिस्सा नहीं था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपियों के पास साधारण लाठियां थीं, जिन्हें इस मामले के तथ्यों में जान लेने वाला हथियार नहीं माना जा सकता। रिकॉर्ड में यह भी नहीं मिला कि आरोपियों ने लगातार इतनी बेरहमी से हमला किया हो, जिससे साफ तौर पर हत्या की मंशा दिखाई दे। इसलिए सिर्फ यह तथ्य कि बाद में चोट जानलेवा साबित हुई, धारा 307 लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हत्या के प्रयास का आरोप साबित नहीं हुआ, लेकिन आरोपियों ने पीड़ित को गंभीर चोट जरूर पहुंचाई थी। मेडिकल रिकॉर्ड से यह साफ था कि पीड़ित के सिर की हड्डियों में फ्रैक्चर हुआ और उसे लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। इसलिए यह मामला धारा 325 के तहत गंभीर चोट पहुंचाने का बनता है।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आरोपियों की धारा 307 के तहत हुई दोषसिद्धि को बदलकर धारा 325 में कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तीनों आरोपी जितनी सजा अब तक काट चुके हैं, वही पर्याप्त होगी। लेकिन उन्हें 50-50 हजार रुपये का जुर्माना देना होगा, जो पीड़ित को मिलेगा। अगर जुर्माना जमा नहीं किया गया, तो छह महीने की अतिरिक्त साधारण कैद भुगतनी होगी।
क्यों अहम है यह फैसला?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साफ है कि हत्या के प्रयास का मामला सिर्फ चोट की गंभीरता देखकर तय नहीं किया जा सकता। जांच एजेंसियों और कोर्ट को यह भी देखना होगा कि आरोपी की असली मंशा क्या थी।
अगर यह साबित नहीं होता कि आरोपी वाकई किसी की जान लेना चाहता था, तो सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आईपीसी की धारा 307 नहीं लगाई जा सकती।
यह फैसला ऐसे सभी मामलों के लिए अहम है, जहां किसी झगड़े में गंभीर चोट लगने के बाद सीधे हत्या के प्रयास की धारा जोड़ दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि धारा 307 लगाने के लिए चोट से ज्यादा अहम आरोपी की मंशा और घटना की पूरी परिस्थितियां हैं।