नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा से जुड़े पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज) कानून को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई बच्चा किसी स्कूल शिक्षक, हेडमिस्ट्रेस या अन्य जिम्मेदार व्यक्ति को यौन उत्पीड़न की शिकायत करता है, तो वह खुद उसकी जांच करके यह तय नहीं कर सकता कि घटना हुई या नहीं।
ऐसे मामलों में तुरंत पुलिस या संबंधित प्राधिकरण को सूचना देना कानूनी जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपनी ओर से जांच कर शिकायत दबाना या यह निष्कर्ष निकाल लेना कि कुछ नहीं हुआ, कानून के उद्देश्य के खिलाफ है।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने एक स्कूल की हेडमिस्ट्रेस के खिलाफ बंद हो चुका मुकदमा फिर से शुरू करने का आदेश दिया।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि:
‘पॉक्सो कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है और इस कानून का उद्देश्य बच्चों के खिलाफ यौन अपराध की शिकायत मिलते ही तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित करना है। अगर किसी बच्चे की शिकायत मिलने के बाद पहले निजी जांच की अनुमति दी जाए, तो इससे कानून का मकसद ही कमजोर पड़ जाएगा।’
स्कूल ने खुद जांच की, पुलिस को सूचना नहीं दी
मामला एक आठ वर्षीय छात्रा से जुड़ा है। आरोप था कि स्कूल के ही एक वरिष्ठ छात्र ने उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। बच्ची ने सबसे पहले अपनी बड़ी बहन को पूरी घटना बताई।
बाद में यह जानकारी उसकी एक सहेली, स्कूल की हेड गर्ल और आखिर में स्कूल की हेडमिस्ट्रेस तक पहुंची।
आरोप है कि हेडमिस्ट्रेस ने पुलिस को सूचना देने के बजाय अपने स्तर पर मामले की जांच शुरू कर दी।
उन्होंने बच्ची की शारीरिक स्थिति देखी, आरोपी छात्र से पूछताछ की, कुछ दिनों तक दोनों बच्चों पर नजर रखी और आखिर में यह निष्कर्ष निकाल लिया कि कोई घटना नहीं हुई। इतना ही नहीं, छात्रों से भी इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहने के लिए कहा गया।
बाद में मामला पुलिस तक पहुंचा और पीड़िता की मां की शिकायत पर स्कूल प्रशासन के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू हुई।
ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने क्यों दी थी राहत?
मामले में ट्रायल कोर्ट ने स्कूल की हेडमिस्ट्रेस, प्रिंसिपल, कुछ शिक्षकों और छात्रावास वार्डन को आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया था।
कोर्ट का मानना था कि उनके पास ऐसा कोई ठोस आधार या जानकारी नहीं थी, जिससे यह माना जा सके कि पॉक्सो कानून के तहत कोई अपराध हुआ है।
इसके बाद मामला गुवाहाटी हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही माना और कहा कि स्कूल प्रशासन के पास ऐसा कोई पक्का आधार नहीं था जिससे यह माना जाए कि पॉक्सो कानून के तहत अपराध हुआ है।
इसके बाद पीड़िता की मां ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
‘वेरिफिकेशन’ थ्योरी को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के इस नजरिए को गलत माना। कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो कानून की धारा 19 में कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि शिकायत मिलने के बाद संबंधित व्यक्ति पहले अपने स्तर पर जांच करे और उसके बाद तय करे कि पुलिस को सूचना देनी है या नहीं।
कानून के तहत बच्चे से यौन उत्पीड़न की विश्वसनीय जानकारी मिलते ही इसकी सूचना देना अनिवार्य है।
कोर्ट ने साफ कहा कि अगर कोई बच्चा सीधे किसी शिक्षक, हेडमिस्ट्रेस या अन्य जिम्मेदार व्यक्ति को अपने साथ हुए यौन अपराध की जानकारी देता है, तो इतनी जानकारी ही पुलिस को सूचना देने के लिए पर्याप्त है।
बाद में यह कहना कि अपनी जांच में कुछ नहीं मिला, इसलिए रिपोर्ट नहीं की, कानून के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो कानून का उद्देश्य बच्चों की तुरंत सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
यदि हर स्कूल, संस्था या अधिकारी पहले खुद जांच करने लगेगा, तो शिकायत दर्ज होने में देरी होगी और कई मामलों में महत्वपूर्ण सबूत भी खत्म हो सकते हैं।
कानून में ‘नॉलेज’ का मतलब क्या है- कोर्ट ने समझाया
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो कानून की धारा 19 में इस्तेमाल किए गए ‘नॉलेज’ शब्द का मतलब भी स्पष्ट किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘नॉलेज’ का मतलब केवल अपनी आंखों से अपराध होते देखना नहीं है।
अगर किसी जिम्मेदार व्यक्ति को पीड़ित बच्चा खुद घटना की जानकारी देता है, तो उसे यह मानना होगा कि उसके पास अपराध की जानकारी है और उस पर तुरंत रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी लागू हो जाती है।
कोर्ट के मुताबिक, अगर ‘नॉलेज’ को सिर्फ पक्के सबूत तक सीमित कर दिया जाए, तो पोक्सो कानून बेअसर हो जाएगा, क्योंकि बच्चों के साथ ऐसे अपराध अक्सर बंद कमरों में होते हैं और और तुरंत सबूत मिलना मुश्किल होता है।
ऐसे मामलों में प्रत्यक्ष प्रमाण मिलने का इंतजार करना या पूरी तरह निश्चित होने के बाद ही पुलिस को सूचना देना, पॉक्सो कानून की मंशा के खिलाफ होगा।
‘जांच करना पुलिस का काम, स्कूल का नहीं’
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि पॉक्सो कानून किसी स्कूल, संस्था या अन्य व्यक्ति को यह अधिकार नहीं देता कि वह पहले अपने स्तर पर जांच करे और फिर तय करे कि पुलिस को सूचना देनी है या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि किसी घटना की सच्चाई क्या है, यह पता लगाना जांच एजेंसियों का काम है।
स्कूल या संस्था की भूमिका केवल इतनी है कि शिकायत मिलते ही बिना देरी किए संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी दे।
कोर्ट ने कहा कि अगर शिकायत मिलने के बाद पहले निजी जांच की जाएगी, तो जरूरी सबूत खत्म हो सकते हैं और आरोपी को उसका फायदा मिल सकता है।
इसलिए पॉक्सो कानून में घटना की तुरंत रिपोर्ट करना सबसे जरूरी माना गया है।
लोअर कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले पलटे
इस मामले में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने स्कूल प्रशासन को राहत देते हुए यह माना था कि उनके पास पर्याप्त ‘नॉलेज’ नहीं था, क्योंकि उनकी जांच में कुछ साबित नहीं हुआ।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों फैसलों को गलत ठहराते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने कानून की सही व्याख्या नहीं की और दोनों कोर्ट्स ने डिस्चार्ज आवेदन पर सुनवाई के दौरान ही “मिनी ट्रायल” कर दिया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि डिस्चार्ज आवेदन पर सुनवाई के दौरान दोनों कोर्ट्स ने उपलब्ध साक्ष्यों का गहराई से मूल्यांकन कर दिया, जबकि इस चरण में सिर्फ यह देखना होता है कि रिकॉर्ड में मुकदमा चलाने लायक प्रथम दृष्टया आधार है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि :
डिस्चार्ज के चरण में कोर्ट का काम सिर्फ यह देखना होता है कि रिकॉर्ड में मुकदमा चलाने के लिए पहली नजर में (प्राइमा फेसी) पर्याप्त आधार है या नहीं। इस समय पूरे साक्ष्यों का मूल्यांकन कर अंतिम फैसला नहीं दिया जा सकता।
अंतिम फैसला: सिर्फ हेडमिस्ट्रेस के खिलाफ फिर चलेगा मुकदमा
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पाया कि बच्ची ने घटना की जानकारी सीधे स्कूल की हेडमिस्ट्रेस को दी थी। इसलिए उनके खिलाफ पॉक्सो कानून की धारा 21 के तहत मुकदमा फिर से चलाया जाएगा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने प्रिंसिपल, अन्य शिक्षकों और छात्रावास वार्डन को राहत बरकरार रखी और उनके खिलाफ मुकदमा फिर से शुरू करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि पीड़िता ने घटना की जानकारी सीधे उन्हें दी थी।
इसलिए सिर्फ स्कूल प्रशासन का हिस्सा होने या बाद में घटना की जानकारी मिलने के आधार पर उनके खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्ची की बहन, उसकी सहेली और स्कूल की हेड गर्ल उस समय स्वयं नाबालिग थीं।
पॉक्सो कानून के तहत ऐसे बच्चों पर सूचना न देने की आपराधिक जिम्मेदारी लागू नहीं होती है।
देशभर के स्कूल और संस्थानों के लिए अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ इस एक मामले तक सीमित नहीं है। इसका असर देश के सभी स्कूलों, छात्रावासों, आवासीय संस्थानों और उन सभी जगहों पर पड़ेगा, जहां बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी होती है।
इन सभी को यह ध्यान रखना होगा कि यदि किसी बच्चे से यौन उत्पीड़न की शिकायत मिलती है, तो उसे दबाने या पहले अपने स्तर पर जांच करने के बजाय तुरंत पुलिस को सूचना देना उनकी कानूनी जिम्मेदारी है।
कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी बच्चे की ओर से यौन उत्पीड़न की शिकायत मिलती है, तो संबंधित अधिकारी यह नहीं कह सकता कि उसने पहले अपने स्तर पर जांच की और उसे कुछ नहीं मिला। कानून ऐसी किसी निजी जांच की अनुमति नहीं देता।
इस फैसले से साफ हो गया है कि पॉक्सो कानून के तहत किसी बच्चे से यौन उत्पीड़न की शिकायत मिलते ही सबसे पहले उसकी सूचना पुलिस को देना जरूरी है। घटना की जांच करना पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों का काम है।
अगर कोई जिम्मेदार व्यक्ति शिकायत की रिपोर्ट करने के बजाय खुद जांच करता है या मामला दबाने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ भी पॉक्सो कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है।