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प्रथागत उत्तराधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: उरांव जनजाति में चाचा अपनी भतीजी के पति को ‘घर दामाद’ बनाकर नहीं दे सकता पैतृक संपत्ति का अधिकार

Supreme Court Upholds Mineral ASP Calculation Rules, Rejects Kirloskar Ferrous Challenge

नई दिल्ली: आदिवासी समुदायों की प्रथागत उत्तराधिकार व्यवस्था को लेकर स्पष्ट कानूनी सिद्धांत तय करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उरांव (ओरांव) जनजाति की प्रथागत उत्तराधिकार व्यवस्था पर बड़ा फैसला सुनाया है।

उरांव जनजाति की पैतृक संपत्ति से जुड़े एक विवाद में कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का चाचा (अंकल-इन-लॉ) अपनी भतीजी के पति को ‘घर दामाद’ (घर में रहने वाला दामाद) के रूप में मान्यता देकर उत्तराधिकार का अधिकार नहीं दे सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी कोई मान्य प्रथा साबित नहीं हुई है जो इस तरह की व्यवस्था को वैध ठहराती हो। किसी प्रथा के नाम पर तभी संपत्ति का अधिकार मिल सकता है, जब वह समुदाय की मान्य परंपरा के अनुरूप हो और उसका स्पष्ट प्रमाण भी हो।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी जनजाति की मान्य प्रथा का दायरा बढ़ाकर नए उत्तराधिकार अधिकार नहीं बनाए जा सकते। अगर कोई व्यक्ति प्रथागत कानून (कस्टमरी लॉ) के आधार पर पैतृक संपत्ति पर दावा करता है, तो उसे पहले यह साबित करना होगा कि उसका दावा उसी मान्य प्रथा के दायरे में आता है।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने उरांव जनजाति से जुड़े एक पैतृक संपत्ति विवाद में झारखंड हाईकोर्ट समेत तीनों निचली कोर्टों के फैसले रद्द कर दिए।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उरांव समुदाय की मान्य प्रथा के तहत कोई चाचा अपनी भतीजी के पति को ‘घर दामाद’ बना सकता है। इसलिए इस आधार पर पैतृक संपत्ति पर अधिकार नहीं दिया जा सकता।

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‘घर दामाद’ से शुरू हुआ पैतृक संपत्ति का विवाद

यह विवाद उरांव (ओरांव) समुदाय के एक परिवार की पैतृक जमीन को लेकर था। परिवार के मुखिया सुखू उरांव के तीन बेटे थे- धुंगरू, लेदुरा और भोला। धुंगरू के बेटे बेजला उरांव ने दावा किया कि लेदुरा और भोला की मृत्यु के बाद परिवार में वही सबसे नजदीकी पुरुष रिश्तेदार हैं, इसलिए पैतृक संपत्ति पर उनका अधिकार बनता है।

दूसरी ओर प्रतिवादियों का कहना था कि लेदुरा की कोई संतान नहीं थी। भोला की एक बेटी बुधैन थी। इसलिए लेदुरा ने अपनी भतीजी बुधैन के पति पुनई को ‘घर दामाद’ के रूप में अपने परिवार में रख लिया था।

उनका दावा था कि इसी वजह से पुनई को लेदुरा की संपत्ति पर अधिकार मिल गया और बाद में वही अधिकार उसकी पत्नी और परिवार को मिला। उन्होंने वर्ष 1975 के एक दस्तावेज का भी सहारा लिया, जिसे कभी बंटवारा तो कभी लीज से जुड़ा दस्तावेज बताया गया।

ट्रायल कोर्ट, प्रथम अपीलीय कोर्ट और बाद में झारखंड हाईकोर्ट ने भी प्रतिवादियों के पक्ष को स्वीकार कर लिया। इसके बाद बेजला उरांव ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

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सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कोर्ट के फैसले क्यों पलटे?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या उरांव समुदाय की प्रथा के तहत कोई चाचा अपनी भतीजी के पति को घर दामाद बना सकता है।

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई भरोसेमंद सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि ऐसी कोई मान्य प्रथा मौजूद है। निचली कोर्टों ने यह मान लिया कि पुनई घर दामाद था, लेकिन यह नहीं देखा कि उसे घर दामाद बनाने वाला व्यक्ति कानून और समुदाय की प्रथा के अनुसार ऐसा करने का अधिकार रखता था या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी प्रथा का दावा करने वाले व्यक्ति पर ही उसे साबित करने की जिम्मेदारी होती है। सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि ऐसी परंपरा है। यह भी दिखाना होगा कि वह लंबे समय से चली आ रही, स्पष्ट और समुदाय में मान्य प्रथा है। इस मामले में प्रतिवादी ऐसा नहीं कर पाए।

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‘घर दामाद’ की अवधारणा और उसकी सीमाएं बताई

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि उरांव समुदाय में ‘घर दामाद’ रखने की प्रथा मौजूद है। लेकिन हर मामला उसी प्रथा के दायरे में आए, यह जरूरी नहीं है।

कोर्ट ने एस.सी. रॉय की पुस्तक “द उरांव ऑफ छोटानागपुर” का हवाला देते हुए कहा कि उरांव जनजाति की मान्य प्रथा के अनुसार किसी ‘घर दामाद’ को पैतृक संपत्ति का अधिकार तभी मिल सकता है, जब उसे परिवार के आखिरी पुरुष सदस्य या उसकी विधवा ने घर दामाद के रूप में स्वीकार किया हो।

इस मामले में पुनई को कथित रूप से लेदुरा ने ‘घर दामाद’ बनाया था। जबकि वह बुधैन का पिता नहीं, बल्कि चाचा था। रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि उरांव समुदाय की मान्य प्रथा किसी चाचा को अपनी भतीजी के पति को ‘घर दामाद’ बनाने का अधिकार देती है। इसलिए प्रतिवादियों का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

प्रथा को मान्यता और संपत्ति का अधिकार किसे मिलेगा ?

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में प्रथागत कानून (कस्टमरी लॉ) को साबित करने के सिद्धांत भी बताए। कोर्ट ने इस फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि किसी समुदाय की प्रथा का दावा कैसे साबित किया जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि किसी भी प्रथा को मान्यता तभी मिल सकती है, जब यह साबित हो कि वह लंबे समय से लगातार चली आ रही है, समुदाय में स्वीकार की जाती है और उसके बारे में स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं।

सिर्फ कुछ लोगों के बयान या अनुमान के आधार पर किसी प्रथा को कानून नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी प्रथा को लेकर पहले ही न्यायिक मान्यता मिल चुकी है तो हर मामले में उसे दोबारा साबित करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन जहां प्रथा की सीमा या दायरा विवादित हो, वहां उसका स्पष्ट प्रमाण देना जरूरी होगा।

‘प्रथागत कानून’ साबित करना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी समुदाय की प्रथा के आधार पर पैतृक संपत्ति पर अधिकार का दावा करता है, तो सिर्फ उस प्रथा का होना काफी नहीं है। यह भी साबित करना होगा कि उसका मामला उसी प्रथा के दायरे में आता है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि:

  • ‘घर दामाद’ की प्रथा उरांव समुदाय में मौजूद है, इसमें कोई विवाद नहीं।
  • लेकिन यह साबित नहीं हुआ कि चाचा (अंकल-इन-लॉ) ऐसा कर सकता है।
  • गवाहों के बयान भी इस मुद्दे पर एकसमान नहीं थे।

कोर्ट ने कहा कि केवल यह कहना कि किसी प्रथा पर रोक नहीं है, पर्याप्त नहीं है। जो पक्ष किसी परंपरा का दावा करता है, उसे ही प्रथागत कानून यानी परंपरा साबित करना होता है।

अंतिम फैसला: निकटतम पुरुष रिश्तेदार को अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ‘घर दामाद’ वाला दावा साबित नहीं हुआ। ऐसे में उरांव समुदाय की मान्य प्रथा के अनुसार संपत्ति परिवार के सबसे नजदीकी पुरुष रिश्तेदार को मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस मामले में बेजला उरांव ही परिवार के सबसे नजदीकी पुरुष रिश्तेदार हैं। चूंकि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर पाए कि पुनई को उरांव जनजाति की मान्य प्रथा के तहत वैध रूप से घर दामाद बनाया गया था, इसलिए पैतृक संपत्ति पर उनका दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने बेजला उरांव की अपील स्वीकार कर झारखंड हाईकोर्ट, प्रथम अपीलीय कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले रद्द कर दिए। साथ ही बेजला उरांव के पक्ष में मुकदमे का फैसला सुनाया।

आदिवासी समुदायों के लिए अहम फैसला

यह फैसला सिर्फ एक परिवार के जमीन विवाद तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि आदिवासी समुदायों की परंपराओं का सम्मान किया जाएगा, लेकिन किसी भी व्यक्ति को उन प्रथाओं का फायदा तभी मिलेगा, जब वह यह साबित कर सके कि उसका दावा वास्तव में उसी मान्य परंपरा के दायरे में आता है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि प्रथागत कानून का दायरा बढ़ाकर नए अधिकार नहीं बनाए जा सकते। अगर किसी प्रथा का दावा किया जाता है, तो उसका स्पष्ट और भरोसेमंद प्रमाण देना होगा।

यही वजह है कि इस फैसले को उरांव समुदाय सहित उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां पैतृक संपत्ति का विवाद प्रथागत कानून के आधार पर तय होता है।

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