जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने नर्सिंग ऑफिसर भर्ती से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि अगर किसी अभ्यर्थी ने सरकारी अस्पताल में सरकार से स्वीकृत पद पर काम किया है, तो सिर्फ इस आधार पर उसके अनुभव को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसका वेतन सीधे सरकार के बजाय किसी ट्रस्ट या एनजीओ के जरिए मिला था।
सरकार की दलील थी कि याचिकाकर्ताओं को वेतन सीधे सरकार से नहीं मिला, इसलिए उनका अनुभव बोनस मार्क्स के लिए मान्य नहीं है। राजस्थान हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि :
‘अगर किसी अभ्यर्थी ने सरकारी अस्पताल में काम किया है, तो सिर्फ इस आधार पर उसका अनुभव नहीं नकारा जा सकता कि उसे सैलरी किसी एनजीओ या ट्रस्ट के माध्यम से मिली थी। कोर्ट ने कहा कि असली मायने उस काम के अनुभव का है, न कि भुगतान के तरीके का।’
हाईकोर्ट ने कहा कि भर्ती में बोनस मार्क्स इसलिए दिए जाते हैं, ताकि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में काम करने का अनुभव रखने वाले उम्मीदवारों को उसका फायदा मिल सके। इसलिए वेतन किसके जरिए मिला, यह अनुभव से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता।
जस्टिस डॉ. नुपुर भाटी की एकलपीठ ने यह फैसला नर्सिंग ऑफिसर भर्ती-2023 से जुड़े अभ्यर्थियों की याचिका पर सुनाया। कोर्ट ने उनकी उम्मीदवारी रद्द करने का आदेश निरस्त करते हुए राज्य सरकार को अनुभव के आधार पर बोनस मार्क्स देने और मेरिट के अनुसार दोबारा नियुक्ति पर विचार करने का निर्देश दिया।
अगर बोनस मार्क्स मिलने के बाद अभ्यर्थी मेरिट में आते हैं और अन्य सभी शर्तें पूरी करते हैं, तो उन्हें आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति देने को कहा गया है।
अनुभव प्रमाणपत्र पर शुरू हुआ पूरा विवाद
याचिकाकर्ताओं ने नर्सिंग ऑफिसर भर्ती-2023 के तहत आवेदन किया था। उन्होंने भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लिया, दस्तावेजों का सत्यापन कराया और प्रोविजनल मेरिट लिस्ट में अपनी श्रेणी के कटऑफ से अधिक अंक भी हासिल किए।
लेकिन अंतिम मेरिट लिस्ट जारी होने से पहले उनके अनुभव प्रमाणपत्र स्वीकार नहीं किए गए। इसके बाद 24 जुलाई 2025 के आदेश से उनकी उम्मीदवारी यह कहते हुए रद्द कर दी गई कि उनका वेतन सीधे राज्य सरकार से नहीं, बल्कि एक चैरिटेबल ट्रस्ट के जरिए दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे अक्टूबर 2019 से पाली जिले के घाणेराव स्थित स्म्त. मोहिनी देवी जुगराज हिंगड़ राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सरकार से स्वीकृत पदों पर कार्यरत थे। यह अस्पताल पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत संचालित हो रहा था।
उनका कहना था कि नियुक्ति सरकार की मंजूरी से हुई थी, उन्होंने कोविड-19 जैसे कठिन दौर में भी सरकारी अस्पताल में सेवाएं दीं और केवल वेतन ट्रस्ट के माध्यम से मिलने से उनका अनुभव खत्म नहीं हो सकता।
NGO से वेतन मिलने पर भी मिलेगा बोनस मार्क्स का लाभ: हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि भर्ती नियमों में अनुभव के आधार पर बोनस मार्क्स देने का उद्देश्य उन उम्मीदवारों को अतिरिक्त लाभ देना है, जिन्होंने सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में काम करते हुए व्यावहारिक अनुभव हासिल किया है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में यह विवाद नहीं है कि याचिकाकर्ताओं ने सरकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सरकार से स्वीकृत पदों पर काम किया था। इसलिए केवल इस वजह से उनके अनुभव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उनका वेतन ट्रस्ट के जरिए दिया गया था।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार की मंजूरी से बनी प्रशासनिक व्यवस्था के तहत यदि वेतन किसी ट्रस्ट या चैरिटेबल संस्था के माध्यम से दिया गया है, तो इससे सरकारी अस्पताल में प्राप्त अनुभव का महत्व कम नहीं हो जाता।
हाईकोर्ट ने पुराने फैसले का दिया हवाला
हाई कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा नया नहीं है। इससे पहले गोविंद दायमा बनाम राजस्थान सरकार मामले में भी राजस्थान हाईकोर्ट यही फैसला दे चुका है।
उस मामले में लैब टेक्नीशियनों को केवल इसलिए बोनस मार्क्स नहीं दिए गए थे क्योंकि उनका वेतन एक एनजीओ के जरिए दिया गया था। बाद में हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया और राज्य सरकार की अपील भी खारिज हो गई।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में भले ही अभ्यर्थी नर्सिंग स्टाफ हैं और अस्पताल पीपीपी मॉडल पर संचालित हो रहा था, लेकिन कानूनी सवाल बिल्कुल वही है।
कोर्ट ने कहा कि जब सरकारी स्वास्थ्य संस्थान में वास्तविक सेवा देना और अनुभव हासिल करना विवादित नहीं है, तब केवल वेतन के स्रोत को आधार बनाकर बोनस मार्क्स से वंचित नहीं किया जा सकता।
‘वेतन का स्रोत नहीं, सरकारी अस्पताल में काम का अनुभव अहम‘
कोर्ट ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया में ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि उम्मीदवार ने वास्तव में सरकारी अस्पताल में काम किया या नहीं।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि:
‘जब यह साबित हो जाए कि उम्मीदवार ने सरकार से मंजूर पद पर सरकारी अस्पताल में काम किया है और उसका अनुभव प्रमाणपत्र भी सही पाया गया है, तो सिर्फ वेतन के भुगतान का तरीका उसके अनुभव को नकारने का आधार नहीं बन सकता।’
कोर्ट ने कहा कि वेतन का स्रोत तभी अहम हो सकता है, जब इस बात पर संदेह हो कि उम्मीदवार ने वास्तव में सरकारी अस्पताल में काम किया भी था या नहीं। लेकिन जब सरकारी अस्पताल में उसकी सेवा और अनुभव पर कोई विवाद ही नहीं है, तो सिर्फ वेतन ट्रस्ट या एनजीओ के जरिए मिलने के आधार पर बोनस मार्क्स से इनकार नहीं किया जा सकता।
केवल भुगतान के तरीके के आधार पर बोनस मार्क्स से इनकार करना भर्ती नियमों के उद्देश्य के खिलाफ होगा।
रिजेक्शन आदेश रद्द, बोनस मार्क्स के साथ फिर होगी मेरिट तय
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने 24 जुलाई 2025 का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसके जरिए याचिकाकर्ताओं की उम्मीदवारी खारिज की गई थी।
कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को उनके कार्य अनुभव के आधार पर बोनस मार्क्स दिए जाएं।
इसके बाद यदि बोनस मार्क्स जोड़ने पर वे मेरिट सूची में आते हैं और अन्य सभी पात्रता शर्तें पूरी करते हैं, तो उन्हें आठ सप्ताह के भीतर नर्सिंग स्टाफ/नर्सिंग ऑफिसर के पद पर नियुक्ति दी जाए।
फैसले का असर
यह फैसला केवल इस भर्ती तक सीमित नहीं है। राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि सरकारी अस्पतालों में सरकार से स्वीकृत पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों के अनुभव को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि उनका वेतन किसी एनजीओ, ट्रस्ट या पीपीपी व्यवस्था के तहत मिला था।
यह फैसला उन भर्ती प्रक्रियाओं के लिए अहम है, जहां सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों को अनुभव के आधार पर बोनस मार्क्स दिए जाते हैं। साथ ही, यह आदेश यह भी स्पष्ट करता है कि भर्ती में उम्मीदवार के वास्तविक कार्य अनुभव को प्राथमिकता दी जाएगी, न कि केवल वेतन के भुगतान के तरीके को।