जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने टोंक में राजस्थान हाउसिंग बोर्ड की आवासीय योजना के लिए किए गए भूमि अधिग्रहण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट ने वर्ष 2017 में पारित भूमि अधिग्रहण अवार्ड को रद्द करते हुए उसके आधार पर हुई पूरी अधिग्रहण कार्रवाई निरस्त कर दी।
इस फैसले से राजस्थान हाउसिंग बोर्ड को बड़ा झटका लगा है, जबकि जमीन मालिकों के पक्ष में फैसला आया है।
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि कानून में तय समय सीमा खत्म होने के बाद पारित किया गया अवार्ड मान्य नहीं माना जा सकता।
अगर सरकार यह नहीं बता सके कि देरी क्यों हुई या समय सीमा बढ़ाने का कोई कानूनी आधार क्या था, तो ऐसे अवार्ड के आधार पर की गई पूरी भूमि अधिग्रहण कार्रवाई भी रद्द करनी होगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि 1 जनवरी 2014 तक भूमि अधिग्रहण का अवार्ड पारित नहीं हुआ था, तो उसके बाद की पूरी प्रक्रिया नए भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के तहत ही चलेगी।
ऐसे मामलों में सरकार के लिए नए कानून में तय समय सीमा के भीतर अवार्ड पारित करना जरूरी है।
लेकिन संबंधित अधिकारियों ने करीब 3 साल बाद, 1 मार्च 2017 को अवार्ड पारित किया, जो कानून में निर्धारित अवधि से काफी बाद का था। इसलिए यह अवार्ड और इसके आधार पर हुई पूरी भूमि अधिग्रहण कार्रवाई कानूनन टिक नहीं सकती।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने दिनेश चौरसिया समेत अन्य याचिकाकर्ताओं की रिट और रिव्यू याचिकाएं स्वीकार करते हुए 1 मार्च 2017 के अवार्ड को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने इस अवार्ड के आधार पर हुई पूरी भूमि अधिग्रहण कार्रवाई भी निरस्त कर दी।
हाई कोर्ट ने माना कि यह अवार्ड उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 की धारा 24(1)(a) और धारा 25 के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए पारित किया गया था।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद टोंक में राजस्थान हाउसिंग बोर्ड की एक आवासीय योजना के लिए जमीन अधिग्रहण से जुड़ा है। अधिग्रहण की कार्रवाई पुराने भूमि अधिग्रहण कानून, 1894 के तहत शुरू की गई थी और आवश्यक अधिसूचनाएं भी जारी कर दी गई थीं।
हालांकि, पूरे मामले में सबसे अहम तथ्य यह रहा कि नया भूमि अधिग्रहण कानून एक जनवरी 2014 से लागू हो गया, लेकिन उस तारीख तक संबंधित जमीन का अवार्ड पारित नहीं हुआ था।
इसके बावजूद जिला प्रशासन ने करीब 3 साल बाद, 1 मार्च 2017 को अवार्ड पारित कर दिया। कई जमीन मालिकों ने इसे कानून के खिलाफ बताते हुए राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नया कानून लागू होने के बाद सरकार तय समय सीमा के भीतर अवार्ड पारित नहीं कर सकी। इसलिए बाद में जारी किया गया अवार्ड और उसके आधार पर की गई पूरी भूमि अधिग्रहण कार्रवाई कानून के मुताबिक वैध नहीं रह गई।
याचिकाकर्ताओं ने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि जब एक जनवरी 2014 तक अवार्ड पारित नहीं हुआ था, तब पूरा मामला नए भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 24(1)(a) के तहत आ गया। इस स्थिति में आगे की सारी कार्रवाई नए कानून के अनुसार ही होनी थी।
उन्होंने कोर्ट को बताया कि नए कानून की धारा 25 स्पष्ट रूप से कहती है कि ऐसे मामलों में कलेक्टर को 12 महीने के भीतर अवार्ड पारित करना होगा। यानी अधिकतम 31 दिसंबर 2014 तक अवार्ड जारी हो जाना चाहिए था।
लेकिन यहां अवार्ड 1 मार्च 2017 को जारी किया गया। यानी कानून में तय समय सीमा खत्म होने के काफी बाद। इसलिए यह अवार्ड शुरू से ही अवैध था और इसके आधार पर पूरी भूमि अधिग्रहण कार्रवाई भी टिक नहीं सकती।
हाईकोर्ट ने समय सीमा को माना अहम
हाईकोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में 1 जनवरी 2014 तक भूमि अधिग्रहण का अवार्ड पारित नहीं हुआ था, उन पर नए भूमि अधिग्रहण कानून के नियम लागू होंगे। यानी उसके बाद की पूरी प्रक्रिया पुराने नहीं, बल्कि नए कानून के तहत ही पूरी करनी होगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अवार्ड पारित करने की समय सीमा भी नए कानून से तय होगी। इसके लिए सरकार को 1 जनवरी 2014 से तय अवधि के भीतर ही अवार्ड जारी करना जरूरी था।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर सरकार तय समय सीमा के भीतर अवार्ड पारित नहीं करती और देरी का कोई कानूनी आधार भी नहीं बता पाती, तो बाद में जारी किया गया अवार्ड कानूनन मान्य नहीं माना जा सकता।
यही कारण है कि इस मामले में एक मार्च 2017 को पारित अवार्ड को वैध नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी सहारा लिया
हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का भी विस्तार से उल्लेख किया।
हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के ‘एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, गोसीखुर्द प्रोजेक्ट, महाराष्ट्र विदर्भ सिंचाई विकास निगम बनाम महेश एवं अन्य’ (2022) फैसले का सहारा लिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि जिन मामलों में 1 जनवरी 2014 तक भूमि अधिग्रहण का अवार्ड पारित नहीं हुआ था, उनकी आगे की पूरी प्रक्रिया नए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत ही चलेगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अवार्ड पारित करने की समय सीमा भी नए कानून की धारा 25 से तय होगी। इसलिए पुराने कानून का सहारा लेकर समय सीमा बढ़ाने या तय अवधि के बाद अवार्ड पारित करने को सही नहीं ठहराया जा सकता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि टोंक भूमि अधिग्रहण मामले में 1 मार्च 2017 को पारित अवार्ड कानून के अनुरूप नहीं था। इसलिए इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय किए गए सिद्धांत पूरी तरह लागू होते हैं।
सरकार की दलील भी ठुकराई
राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों का कहना था कि इस मामले में पारित अवार्ड वैध है और भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई रद्द नहीं की जा सकती।
लेकिन हाईकोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने कहा कि सरकार ऐसा कोई कानूनी आधार नहीं बता सकी, जिससे यह माना जाए कि अवार्ड पारित करने की तय समय सीमा बढ़ाई जा सकती थी या देरी को कानून के तहत सही ठहराया जा सकता था।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब 1 जनवरी 2014 तक अवार्ड पारित नहीं हुआ था और बाद में 1 मार्च 2017 को अवार्ड जारी किया गया, तो यह साफ है कि अवार्ड कानून में तय समय सीमा के बाद पारित हुआ।
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून की अनिवार्य समय सीमा का पालन किए बिना पारित अवार्ड को केवल इस आधार पर सही नहीं माना जा सकता कि प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इसलिए इस मामले में सरकार की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती।
अंतिम फैसला
सभी पक्षों की दलीलें और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज देखने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने सभी रिट याचिकाएं और रिव्यू याचिकाएं मंजूर कर लीं।
हाईकोर्ट ने 1 मार्च 2017 को पारित भूमि अधिग्रहण अवार्ड को रद्द करते हुए कहा कि यह भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 की धारा 24(1)(a) और धारा 25 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं था। इसलिए यह कानून की नजर में टिक नहीं सकता।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने इस अवार्ड के आधार पर हुई पूरी भूमि अधिग्रहण कार्रवाई भी रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि जब अवार्ड ही वैध नहीं है, तो उसके आधार पर की गई आगे की कार्रवाई भी बरकरार नहीं रखी जा सकती।
हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े सभी लंबित आवेदन भी निस्तारित कर दिए और इस फैसले की प्रति सभी संबंधित मामलों के रिकॉर्ड पर रखने के निर्देश दिए।
हाईकोर्ट के इस फैसले से यह भी साफ हो गया है कि जिन भूमि अधिग्रहण मामलों में 1 जनवरी 2014 तक अवार्ड पारित नहीं हुआ था, उनमें सरकार तय समय सीमा के बाद अवार्ड जारी नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में नए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत निर्धारित समय सीमा का पालन करना अनिवार्य होगा।