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विरोध-प्रदर्शन में हर पुलिसकर्मी की पहचान हो अनिवार्य: NEET प्रदर्शन में घायल छात्रा सुप्रीम कोर्ट पहुंची, पुलिसकर्मी के लिए नेम बैज और एक समान भीड़ नियंत्रण नीति की मांग

Injured NEET Protester Moves Supreme Court Seeking Mandatory Police Identification

नई दिल्ली: नीट-यूजी 2026 विवाद को लेकर दिल्ली में हुए ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के दौरान घायल होने का दावा करने वाली एक छात्रा ने सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दाखिल की है।

याचिका में मांग की गई है कि प्रदर्शन के दौरान ड्यूटी पर तैनात सभी पुलिसकर्मियों के लिए नेम बैज और पहचान संख्या दिखाना जरूरी किया जाए।

साथ ही पूरे देश में भीड़ नियंत्रण के लिए एक समान स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) लागू करने का निर्देश दिया जाए, ताकि भविष्य में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग और जवाबदेही से जुड़े विवाद न हों।

याचिका में दावा किया गया है कि 20 जुलाई को दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान कई पुलिसकर्मी बिना नेम बैज या पहचान चिह्न के तैनात थे।

इससे किसी भी कथित गलत कार्रवाई के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करना मुश्किल हो जाता है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट नियम बनाना जरूरी है।

यह आवेदन उस लंबित मामले में दायर किया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट पहले ही केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और कई अन्य राज्यों से जवाब मांग चुका है।

मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होनी है।

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क्या है छात्रा का दावा?

यह याचिका आईआईटी पटना की छात्रा तोशिवा यादव ने दाखिल की है।

उन्होंने कहा है कि वह 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर निकाले गए प्रदर्शन में शामिल थीं। प्रदर्शन खत्म होने के बाद लौटते समय उन पर पुलिसकर्मियों ने हमला किया।

याचिका के अनुसार, पुलिसकर्मी वर्दी में थे, लेकिन उनके नेम बैज या पहचान संख्या नहीं लगी थी।

छात्रा का दावा है कि उनके सिर के पीछे गहरी चोट लगी, जिसके कारण उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा और टांके लगाने पड़े।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शन के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया।

कई छात्रों पर बार-बार लाठियां चलाई गईं, कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए और कुछ प्रदर्शनकारी बेहोश भी हो गए।

याचिका में यह भी कहा गया है कि कथित तौर पर कुछ लोग बिना वर्दी के भी पुलिस के साथ कार्रवाई में शामिल थे।

ऐसे लोगों की पहचान, उनकी भूमिका और अधिकार की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए, ताकि कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति केवल पहचान छिपाने की वजह से जवाबदेही से बच न सके।

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क्या-क्या आरोप लगाए गए?

याचिका में छात्रा ने कई गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं।

इसमें दावा किया गया है कि प्रदर्शन के दौरान कीलों लगी लाठियों का इस्तेमाल किया गया।

कुछ मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा गया है कि कथित तौर पर बिजली वाले बैरिकेड, पैलेट गन और शॉक बैटन का भी इस्तेमाल हुआ, जिससे कई प्रदर्शनकारी घायल हुए।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि महिला प्रदर्शनकारियों के साथ भी मारपीट की गई।

एक अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त पर एक महिला राहगीर को थप्पड़ मारने का भी आरोप लगाया गया है।

हालांकि, ये सभी आरोप याचिका में लगाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन दावों की सत्यता पर कोई राय नहीं दी है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार देता है।

इसलिए प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई कानून के दायरे में, जरूरत के मुताबिक और परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए।

याचिका में यह भी कहा गया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita- BNSS), के तहत भीड़ को तितर-बितर करने की शक्ति का इस्तेमाल मनमाने तरीके से या जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग के साथ नहीं किया जा सकता।

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सुधार के लिए सुझाए भी दिए

याचिकाकर्ता ने सिर्फ शिकायत ही नहीं की, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कई अहम सुझाव भी दिए हैं।

इनमें शामिल हैं-

  • पूरे देश में भीड़-नियंत्रण के लिए एक समान और सार्वजनिक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार किया जाए।
  • ड्यूटी पर तैनात सभी पुलिसकर्मियों के लिए नेम बैज और और पहचान संख्या अनिवार्य हो। ताकि किसी शिकायत की स्थिति में उनकी पहचान आसानी से हो सके।
  • हर घायल व्यक्ति का तुरंत मेडिकल परीक्षण और इलाज सुनिश्चित किया जाए।
  • पुलिस द्वारा बल प्रयोग की हर घटना की अनिवार्य रिपोर्टिंग हो और बल प्रयोग की हर घटना का रिकॉर्ड तैयार किया जाए।
  • नागरिकों के अधिकारों और बल प्रयोग की सीमाओं को लेकर पुलिसकर्मियों को संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप प्रशिक्षण दिया जाए।

याचिकाकर्ता का कहना है कि इन सुझावों का उद्देश्य पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है, ताकि भविष्य में प्रदर्शन के दौरान इस तरह के विवाद और आरोप सामने न आएं।

सुप्रीम कोर्ट पहले क्या कह चुका है?

यह हस्तक्षेप आवेदन Himanshu v. Union of India & Ors. मामले में दायर किया गया है, जो पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

इस मामले में नीट-यूजी 2026 विवाद के दौरान छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई को चुनौती दी गई है।

पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और कई अन्य राज्यों से जवाब मांगा था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ फिलहाल कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।

साथ ही प्रदर्शन से जुड़े सीसीटीवी फुटेज, वीडियो रिकॉर्डिंग और अन्य आधिकारिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का आदेश दिया था, ताकि मामले की निष्पक्ष जांच हो सके।

इसी मामले में पैलेट गन से घायल होने का दावा करने वाले कुछ प्रदर्शनकारियों की याचिका भी लंबित है।

अब आईआईटी पटना की छात्रा तोशिवा यादव की यह हस्तक्षेप याचिका भी उसी मामले में शामिल हो गई है।

मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट इन सभी याचिकाओं पर एक साथ विचार करेगा।

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