नई दिल्ली: अडानी समूह से जुड़ी कंपनी और राजस्थान सरकार की बिजली कंपनी के बीच चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) बदल दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जज जस्टिस अरुण मिश्रा को आर्बिट्रेटर पद से हटाते हुए उनकी जगह जस्टिस संजय किशन कौल को नया एकमात्र आर्बिट्रेटर नियुक्त कर दिया।
खास बात यह रही कि यह फैसला दोनों पक्षों की आपसी सहमति से लिया गया, ताकि आगे किसी तरह का विवाद या कानूनी अड़चन खड़ी न हो।
दरअसल राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस अरुण मिश्रा को मध्यस्थ नियुक्त किया था। अब उनकी जगह सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल को नया मध्यस्थ नियुक्त किया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 3 अगस्त 2026 को यह आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि राजस्थान सरकार की ओर से मध्यस्थ बदलने के लिए दी गई दलील को वह कानूनी तौर पर सही नहीं मानता।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के 3 जुलाई के आदेश को संशोधित कर जस्टिस संजय किशन कौल को मध्यस्थ नियुक्त कर दिया।
मामला राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और पारसा कांटा कोलियरीज लिमिटेड के बीच विवाद से जुड़ा है। राजस्थान की बिजली कंपनी ने जस्टिस अरुण मिश्रा की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
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जस्टिस अरुण मिश्रा की नियुक्ति पर आपत्ति क्यों?
राजस्थान हाईकोर्ट ने 3 जुलाई 2026 को इस विवाद की सुनवाई के लिए जस्टिस अरुण मिश्रा को मध्यस्थ नियुक्त किया था।
इसके बाद राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
राजस्थान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति पर आपत्ति जताते हुए पुराने मामले का हवाला दिया।
उनकी दलील थी कि जस्टिस अरुण मिश्रा सुप्रीम कोर्ट के जज रहते हुए पहले भी इन्हीं पक्षों और इसी करार से जुड़े एक विवाद की सुनवाई कर चुके हैं।
पुराना विवाद कोयले की कीमत बढ़ने, तय लागत और एस्क्रो खाते में रखी रकम जैसे मुद्दों से जुड़ा था।
इस मामले में मध्यस्थता के बाद 2015 में फैसला आया था। बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने उस फैसले में दखल दिया और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
मई 2019 में जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने उस मामले पर फैसला दिया था।
इस पुराने फैसले का हवाला देते हुए राजस्थान की बिजली कंपनी ने मौजूदा मामले में जस्टिस मिश्रा को मध्यस्थ बनाए जाने पर सवाल उठाया।
राजस्थान सरकार की दलील
राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि पुराने और मौजूदा विवाद का संबंध एक ही करार से है।
उन्होंने कहा कि करार भी वही है, प्रावधान भी वही हैं और दोनों पक्ष भी वही हैं।
यानी राजस्थान की बिजली कंपनी का कहना था कि जिस करार को लेकर पहले सुप्रीम कोर्ट के सामने विवाद आया था, उसी से जुड़े मौजूदा विवाद में जस्टिस अरुण मिश्रा को मध्यस्थ बनाना उचित नहीं होगा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की इस दलील को सही नहीं माना। कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि मध्यस्थ बदलने के लिए दिया गया आधार कानूनी तौर पर टिकाऊ नहीं है।
दोनों पक्षों में बनी सहमति
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों से पूछा कि क्या वे किसी दूसरे व्यक्ति को मध्यस्थ नियुक्त करने पर सहमत हो सकते हैं।
पारसा कांटा कोलियरीज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव बनर्जी ने शुरुआत में मध्यस्थ बदलने का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि जस्टिस अरुण मिश्रा को हाईकोर्ट ने नियुक्त किया है और पुराने मामले का फैसला कई साल पहले हो चुका है।
उन्होंने यह भी दलील दी कि जस्टिस मिश्रा खुद सुप्रीम कोर्ट के सामने मौजूद नहीं हैं। ऐसे में उनके खिलाफ उठाई जा रही आपत्ति पर उनका पक्ष भी नहीं सुना जा सकता।
इसके बाद सुनवाई के दौरान दोनों पक्ष दूसरे मध्यस्थ के नाम पर सहमत हो गए।
दोनों ओर से कुछ नाम सामने रखे गए और अंतिम नाम चुनने का फैसला सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया गया।
इसके बाद कोर्ट ने जस्टिस संजय किशन कौल को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के 3 जुलाई के आदेश में भी इसी के मुताबिक बदलाव कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों बदला मध्यस्थ?
इस मामले में सबसे अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की ओर से मध्यस्थ बदलने के लिए दी गई दलील को कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना।
यानी कोर्ट ने यह नहीं कहा कि जस्टिस अरुण मिश्रा की नियुक्ति गलत थी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में साफ कहा गया कि मध्यस्थ बदलने के लिए जो आधार राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम की ओर से रखा गया था, कोर्ट उसे कानूनी तौर पर सही नहीं मानता।
लेकिन सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से जस्टिस संजय किशन कौल को मध्यस्थ नियुक्त करने पर सहमति दे दी।
इसके बाद कोर्ट ने हाईकोर्ट के पुराने आदेश में इसी आधार पर बदलाव कर दिया।
यानी जस्टिस अरुण मिश्रा को हटाने का आधार यह नहीं बना कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति को गलत पाया। मध्यस्थ बदलने का रास्ता दोनों पक्षों की सहमति से निकला।
विवाद खत्म करने की कोशिश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह चिंता भी जताई कि अगर मध्यस्थ की नियुक्ति को लेकर सवाल बना रहा तो बाद में मध्यस्थता की पूरी प्रक्रिया के दौरान यह मुद्दा बार-बार उठ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट नहीं चाहता था कि किसी पूर्व जज की नियुक्ति को लेकर विवाद आगे भी चलता रहे और बाद में मध्यस्थता के फैसले को चुनौती देने की कार्यवाही में भी यही सवाल सामने आए।
यानी सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि जस्टिस अरुण मिश्रा की नियुक्ति गलत थी।
बल्कि दोनों पक्षों की सहमति से ऐसा रास्ता निकाला गया, जिससे मध्यस्थ की नियुक्ति को लेकर मौजूदा विवाद ही खत्म हो जाए।
यह बात सुप्रीम कोर्ट के लिखित आदेश से भी साफ होती है।
कोर्ट ने एक तरफ कहा कि मध्यस्थ बदलने के लिए दी गई दलील कानूनी तौर पर सही नहीं है, वहीं दूसरी तरफ दोनों पक्षों की सहमति के आधार पर जस्टिस संजय किशन कौल को नया मध्यस्थ नियुक्त कर दिया।
अडानी और राजस्थान सरकार का क्या है विवाद?
पारसा कांटा कोलियरीज लिमिटेड में अडानी एंटरप्राइजेज और राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम की हिस्सेदारी है।
इसमें अडानी एंटरप्राइजेज की 74 प्रतिशत और राजस्थान सरकार की बिजली कंपनी की 26 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
कंपनी का काम कोयले के विकास, खनन और परिवहन से जुड़ा है। इसी कारोबारी संबंध से जुड़े अलग-अलग मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच विवाद सामने आए हैं और मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू हुई।
मौजूदा मामले में विवाद के निपटारे के लिए मध्यस्थ की नियुक्ति का सवाल पहले राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचा था।
हाईकोर्ट ने जस्टिस अरुण मिश्रा को एकमात्र आर्बिट्रेटर नियुक्त किया।
राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम ने इस नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मध्यस्थता की कार्यवाही जस्टिस संजय किशन कौल के सामने होगी।
हाईकोर्ट का आदेश बदला
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के 3 जुलाई के आदेश को संशोधित करते हुए जस्टिस अरुण मिश्रा की जगह जस्टिस संजय किशन कौल को मध्यस्थ नियुक्त कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि मध्यस्थ बदलने के लिए राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम की ओर से दिया गया आधार कानूनी तौर पर टिकाऊ नहीं था। जस्टिस कौल की नियुक्ति दोनों पक्षों की आपसी सहमति से हुई।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम की विशेष अनुमति याचिका का निपटारा कर दिया।
अब दोनों पक्षों के बीच विवाद की मध्यस्थता जस्टिस संजय किशन कौल करेंगे।