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GST मामले में कंपनियों को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत, कार्यवाही से पूर्व CGST अधिनियम की धारा 169 के अनुसार विधिसम्मत ढंग से नोटिस भेजना जरूरी

A two-judge bench of the Rajasthan High Court orders relief in a GST matter, holding that improper service of notice under Section 169 of the CGST Act invalidates forced tax recovery and directs unfreezing of bank accounts.

जयपुर, 25 अगस्त। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में GST से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए GST धारा 169 CGST अधिनियम, 2017 के तहत नोटिस की सही सेवा न होने के आधार पर याचिकाकर्ता को राहत प्रदान की है.

राजस्थान हाईकोर्ट ने ये स्पष्ट किया हैं कि विभाग द्वारा कोई भी जबरन वसूली की कार्यवाही करने से पूर्व, नोटिस की सेवा CGST अधिनियम की धारा 169 के अनुसार विधिसम्मत ढंग से की जानी चाहिए.

जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित कि खंडपीठ ने यह आदेश लक्ष्य ब्रिक्स और अनिल अग्रवाल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं.

खातों को किया अनफ्रीज

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इंकम टैक्स विभाग द्वारा याचिकाकर्ता कंपनी से कि जा रही टैक्स वसूली की कार्यवाही पर रोक लगा दी हैं.

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को बैंक खातों पर कि गयी फ्रीज करने की कार्यवाही से भी राहत देते हुए बैंक खातों को अनफ्रीज करने के आदेश दिए हैं.

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में चूँकि नोटिस की सेवा विधिसम्मत तरीके से नहीं की गई थी, इसलिए याचिकाकर्ता के बैंक खातों को अनफ्रीज़ किया जा रहा हैं

हाईकोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता को तीन महिनें का समय दिया हैं जिससे वह सक्षम अपील प्राधिकरण के समक्ष अपील दायर कर सकें.

नोटिस भेजना अनिवार्य

याचिकाकर्ता कि ओर से अधिवक्ता प्रियांशा गुप्ता ने दलील पेश करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को CGST अधिनियम की धारा 169 के अनुसार नोटिस देने की सेवा की विधि का पालन नहीं किया गया.

विभाग द्वारा केवल पोर्टल पर नोटिस अपलोड कर देना पर्याप्त सेवा नहीं मानी जा सकती. इस तरह के मामलों में नोटिस भेजना अनिवार्य है वो चाहे रजिस्टर्ड ईमेल या रजिस्टर्ड डाक के माध्यम से किया जाए.

हाईकोर्ट ने कहा एकतरफा आदेश

खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को केवल पोर्टल पर नोटिस अपलोड किए जाने की वजह से जानकारी नहीं मिल पाई, और वे अपना पक्ष नहीं रख सके.

इसके परिणामस्वरूप एकतरफा आदेश पारित करते हुए याचिकाकर्ता के बैंक खाते सीज़ कर दिए गए, जिससे व्यवसाय पूरी तरह प्रभावित हुआ.

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने मूल राशि ₹1,29,584/- पहले ही जमा कर दी है, जबकि ब्याज सहित कुल देय राशि ₹3,53,778/- है.

इसलिए याचिकाकर्ता से बकाया वसूली पर रोक लगायी जाती हैं.

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