जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने GST कार्यवाही को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बिना डिजिटल या भौतिक हस्ताक्षर के जारी किया गया शो-कॉज नोटिस और आदेश कानून की नजर में वैध नोटिस या आदेश नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल GST पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड कर देना या उस पर रेफरेंस नंबर होना, उसकी कानूनी वैधता के लिए पर्याप्त नहीं है।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने M/s Mayur Timber व अन्य कंपनियों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है।
इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ जारी शो-कॉज नोटिस, उसके आधार पर पारित आदेश तथा बैंक खाते से रिकवरी के लिए जारी FORM GST DRC-13 को रद्द कर दिया।
हालांकि, विभाग को कानून के अनुसार नए सिरे से कार्रवाई करने की छूट दी गई है।
क्यों महत्वपूर्ण है फैसला
फैसले के जरिए कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि GST की paperless व्यवस्था में भी authentication की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है।
केवल पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड करना और reference number जनरेट होना पर्याप्त नहीं है।
करदाता के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के लिए वैध authentication और सुनवाई का अवसर दोनों जरूरी हैं।
क्या था पूरा मामला?
M/s Mayur Timber ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 13 जून 2024 के शो-कॉज नोटिस और 15 अक्टूबर 2024 को CGST Act की धारा 74 के तहत पारित आदेश को चुनौती दी थी।
विभाग ने याचिकाकर्ता पर ₹3,13,894 का GST, ₹4,26,002 ब्याज और ₹3,13,894 की पेनल्टी निर्धारित की थी।
आरोप था कि फर्म ने वास्तविक रूप से माल प्राप्त किए बिना ₹3,13,894 का Input Tax Credit (ITC) ले लिया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि शो-कॉज नोटिस और बाद का आदेश न तो डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित था और न ही भौतिक रूप से।
इसके अलावा दस्तावेज GST पोर्टल के सामान्य “Notices and Orders” सेक्शन के बजाय “Additional Notices and Orders” में अपलोड किए गए थे।
याचिकाकर्ता को आदेश की जानकारी तब मिली, जब विभाग ने 20 अगस्त 2025 को बैंक को FORM GST DRC-13 जारी कर उसके खाते से ₹9,00,820 की वसूली के निर्देश दिए। बैंक ने अगले दिन उसे इसकी जानकारी दी।
कोर्ट के सामने सबसे अहम सवाल
खंडपीठ ने मामले में मूल सवाल तय किया—क्या ऐसा शो-कॉज नोटिस और adjudication order, जिस पर न डिजिटल हस्ताक्षर हो और न भौतिक हस्ताक्षर, कानून की नजर में कायम रह सकता है?
कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि शो-कॉज नोटिस, रिमाइंडर और impugned order में किसी भी प्रकार का डिजिटल या भौतिक हस्ताक्षर नहीं था। हालांकि दस्तावेजों पर सिस्टम द्वारा जनरेट किए गए reference numbers मौजूद थे।
Rule 26(3) को कोर्ट ने माना अनिवार्य
हाईकोर्ट ने Rule 26(3) of the CGST Rules, 2017 का उल्लेख करते हुए कहा कि इस प्रावधान में “shall” शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए यह प्रावधान अनिवार्य प्रकृति का है।
इसके तहत नोटिस, सर्टिफिकेट और आदेश को इलेक्ट्रॉनिक रूप से जारी करने के साथ-साथ Digital Signature Certificate, E-Signature या बोर्ड द्वारा अधिसूचित किसी अन्य वैध verification mode से authenticate करना आवश्यक है।
कोर्ट ने साफ किया कि document का electronic generation और उसका authentication दो अलग-अलग और cumulative requirements हैं।
केवल पोर्टल पर दस्तावेज तैयार हो जाना authentication की आवश्यकता को पूरा नहीं करता।
“डिजिटल सिग्नेचर केवल औपचारिकता नहीं”
कोर्ट ने GST व्यवस्था की प्रकृति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि GST एक paperless regime है, जहां दस्तावेज इलेक्ट्रॉनिक रूप में बनाए, भेजे और प्राप्त किए जाते हैं।
ऐसे सिस्टम में डिजिटल सिग्नेचर वही भूमिका निभाता है, जो कागजी व्यवस्था में भौतिक हस्ताक्षर निभाता था।
पीठ ने कहा कि signature कोई “empty formality” या महज procedural nicety नहीं है, बल्कि यही वह माध्यम है जिससे इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज को कानूनी अस्तित्व और binding character मिलता है।
हस्ताक्षर क्यों जरूरी है? कोर्ट ने गिनाए तीन कारण
कोर्ट ने Rule 26(3) में authentication की आवश्यकता के तीन महत्वपूर्ण उद्देश्य बताए—
पहला—प्रामाणिकता: हस्ताक्षर यह सुनिश्चित करता है कि दस्तावेज वास्तव में proper officer की ओर से जारी हुआ है।
दूसरा—जवाबदेही: हस्ताक्षर उस अधिकारी की पहचान और जिम्मेदारी तय करता है, जिसने नोटिस या आदेश जारी किया है।
तीसरा—मनमानी पर नियंत्रण: हस्ताक्षर यह दर्शाता है कि किसी designated authority ने दस्तावेज जारी करने से पहले अपना दिमाग लगाया है और आदेश उसके application of mind का परिणाम है।
पीठ ने कहा कि unsigned document पर कार्रवाई होने की स्थिति में ये तीनों सुरक्षा-उद्देश्य विफल हो जाते हैं।
“Reference Number authentication नहीं है”
राज्य की ओर से दलील दी गई कि दस्तावेजों पर system-generated reference number मौजूद था और इससे उनकी authenticity सुनिश्चित होती है।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि reference number या Document Identification Number का उद्देश्य दस्तावेज को सिस्टम में track और catalogue करना है। यह proper officer द्वारा authentication का प्रमाण नहीं है।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी थी—
किसी दस्तावेज को ट्रैक करने के लिए दिया गया नंबर, उसके authentication का विकल्प नहीं हो सकता। Rule 26(3) signature के माध्यम से authentication की मांग करता है।
बिना हस्ताक्षर का नोटिस और आदेश “कानून की नजर में” क्या है?
हाईकोर्ट ने इससे भी आगे जाकर कहा कि जिस शो-कॉज नोटिस और आदेश पर न डिजिटल हस्ताक्षर हैं और न भौतिक हस्ताक्षर, वह कानून की नजर में नोटिस और आदेश ही नहीं है।
पीठ ने इसे केवल ऐसी procedural irregularity नहीं माना, जिसे बाद में ठीक किया जा सके।
कोर्ट के अनुसार यह कमी मामले की जड़ तक जाती है और कार्रवाई करने के अधिकार को ही प्रभावित करती है।
ऐसे दस्तावेजों पर आधारित सभी consequential proceedings भी उसी के साथ समाप्त हो जाएंगी।
सुनवाई का अवसर न देना भी गंभीर खामी
कोर्ट ने पाया कि unsigned documents केवल पोर्टल के “Additional Notices and Orders” सेक्शन में अपलोड किए गए थे और याचिकाकर्ता को किसी अन्य तरीके से उनकी सेवा नहीं की गई।
नतीजा यह हुआ कि याचिकाकर्ता को कार्यवाही की जानकारी ही नहीं थी। उसे demand का पता तब चला जब बैंक ने उसके खाते की attachment के संबंध में जानकारी दी।
पीठ ने माना कि authenticated और properly communicated notice के अभाव के कारण personal hearing की तारीख को लेकर भी miscommunication हुआ और याचिकाकर्ता सुनवाई में उपस्थित नहीं हो सका। कोर्ट ने इसे CGST Act की Section 75(4) के तहत personal hearing के अधिकार के विपरीत माना।
Alternative remedy की दलील भी नहीं चली
राज्य की ओर से यह भी दलील दी गई कि याचिकाकर्ता के पास Section 107 के तहत appeal का प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध था और इसलिए writ petition maintainable नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जहां principles of natural justice का उल्लंघन हुआ हो, वहां alternative remedy की उपलब्धता writ jurisdiction के रास्ते में बाधा नहीं बनती।
हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?
खंडपीठ ने 13 जून 2024 का शो-कॉज नोटिस रद्द कर दिया।
इसके परिणामस्वरूप 15 अक्टूबर 2024 का consequential order और 20 अगस्त 2025 का FORM GST DRC-13 recovery notice भी रद्द कर दिया गया।
हालांकि कोर्ट ने GST विभाग को कानून के अनुसार नए सिरे से कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है।
विभाग अब विधि के अनुरूप duly authenticated नया शो-कॉज नोटिस जारी कर सकता है और याचिकाकर्ता को effective opportunity of hearing देने के बाद fresh order पारित कर सकता है।
मेरिट पर कोर्ट ने कोई राय नहीं दी
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके आदेश को मूल GST demand की merits पर कोई राय नहीं माना जाएगा।
ITC की कथित गलत availment समेत merits से जुड़े सभी मुद्दे competent authority द्वारा कानून के अनुसार तय किए जाने के लिए खुले रखे गए हैं।