सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त लगाने के लिए कारण बताना जरूरी, एकमात्र वारिसों से मांगी गई ₹2.25 करोड़ की सिक्योरिटी हाईकोर्ट ने हटाई; इंडेम्निटी बॉन्ड से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने के लिए ₹2.25 करोड़ की सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त लगाए जाने के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 375 के तहत सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त लगाना न्यायालय का विवेकाधीन अधिकार है। इसे हर मामले में नियमित या यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसी शर्त लगाई जाती है तो न्यायालय को उसके पीछे उचित कारण और औचित्य दर्ज करना होगा। कोर्ट ने कहा कि सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त कोई स्वचालित या अनिवार्य शर्त नहीं है।
विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहां मृतक के उत्तराधिकारी स्पष्ट हों, कोई प्रतिद्वंद्वी दावेदार सामने नहीं आया हो और उत्तराधिकार का अधिकार साक्ष्य के आधार पर निर्धारित हो चुका हो, वहां बड़ी राशि की सिक्योरिटी की शर्त लगाने के औचित्य पर न्यायालय को विचार करना होगा।
हालांकि न्यायालय जरूरत पड़ने पर सुरक्षा मांग सकता है, लेकिन इसके लिए मामले के तथ्यों के आधार पर न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करना होगा और आदेश में उचित कारण दर्ज करना होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक विवेकाधिकार का इस्तेमाल कारणों के साथ होना चाहिए और केवल परंपरागत या यांत्रिक तरीके से किसी शर्त को लागू नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सुदेश बंसल ने अजय सरीन और संजय सरीन की ओर से दायर याचिकाओं को स्वीकार करते हुए ₹2.25 करोड़ की सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त को अनुचित और अत्यधिक कठोर माना।
हाईकोर्ट ने जिला न्यायाधीश, जयपुर महानगर प्रथम के 16 मार्च 2026 के आदेश को रद्द करने का आदेश दिया है।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं की सहमति को देखते हुए उन्हें ₹2.25 करोड़ का संयुक्त इंडेम्निटी बॉन्ड तथा लिखित अंडरटेकिंग प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है।
क्या था पूरा मामला
यह पूरा मामला एमआरएफ कंपनी से जुड़े शेयरों का है।
याचिकाकर्ता अजय सरीन और संजय सरीन स्वर्गीय अश्वनी कुमार सरीन के पुत्र हैं। अश्वनी कुमार सरीन का निधन 15 अक्टूबर 2016 को हुआ था। उनकी पत्नी यानी याचिकाकर्ताओं की माता का निधन उनसे पहले 1 अक्टूबर 2015 को हो चुका था।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनके पिता के अलावा परिवार में कोई अन्य प्राकृतिक उत्तराधिकारी अथवा कानूनी प्रतिनिधि नहीं था।
स्वर्गीय अश्वनी कुमार सरीन के नाम MRF Limited के शेयर थे। इन शेयरों का मूल्य प्राप्त करने के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की आवश्यकता थी।
इसी उद्देश्य से दोनों भाइयों ने 17 फरवरी 2024 को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 के तहत जिला न्यायाधीश, जयपुर महानगर प्रथम के समक्ष उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था।
अनुमति, लेकिन ₹2.25 करोड़ की शर्त
जिला अदालत ने आवेदन पर नोटिस जारी किए और याचिकाकर्ताओं के साक्ष्य भी दर्ज किए गए। इसके बाद जिला न्यायाधीश ने 24 जनवरी 2025 को याचिकाकर्ताओं के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश दिया।
आदेश में मृतक अश्वनी कुमार सरीन के नाम दर्ज MRF Limited के शेयरों का उल्लेख किया गया।
आदेश के अनुसार 111 शेयरों का मूल्य ₹1,52,12,233.65 तथा 50 शेयरों का मूल्य ₹68,52,357.50 था। इस प्रकार कुल शेयरों का मूल्य ₹2,20,64,591.15 बताया गया।
जिला न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं को अपने-अपने हिस्से के अनुसार आवश्यक न्याय शुल्क जमा करने के बाद संयुक्त रूप से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया।
लेकिन इसके साथ ही दोनों भाइयों को ₹2,25,00,000 का वचनपत्र और इसी राशि का सिक्योरिटी बॉन्ड प्रस्तुत करने की शर्त लगा दी।
आदेश में यह भी कहा गया था कि यदि भविष्य में उक्त संपत्ति का कोई अन्य दावेदार सामने आता है तो याचिकाकर्ता न्यायालय के आदेश के अनुसार प्राप्त पूरी राशि ब्याज सहित वापस करने के लिए बाध्य होंगे।
याचिकाकर्ताओं की पूरी दलील क्या थी
हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता श्रेय प्रधान और शुभम अरोड़ा पेश हुए।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील थी कि जिला न्यायाधीश द्वारा ₹2.25 करोड़ का सिक्योरिटी बॉन्ड प्रस्तुत करने की शर्त अत्यधिक, कठोर और अनुचित है।
उनका कहना था कि जिला न्यायाधीश ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र देने के मूल आदेश में यह बताने का कोई कारण नहीं दिया कि इतनी बड़ी राशि की सिक्योरिटी की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार धारा 375 के तहत सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त लगाना न्यायालय का विवेकाधिकार है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करते समय प्रत्येक मामले में बिना किसी कारण के सिक्योरिटी बॉन्ड मांगना अनिवार्य हो जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान मामले में दोनों याचिकाकर्ता मृतक के पुत्र और एकमात्र जीवित प्राकृतिक उत्तराधिकारी हैं। कोई अन्य दावेदार सामने नहीं आया है। इसलिए ₹2.25 करोड़ की सिक्योरिटी की शर्त लगाने का कोई ठोस आधार नहीं था।
सिक्योरिटी बॉन्ड देने में असमर्थता जताई
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि वे इतनी बड़ी राशि का सिक्योरिटी बॉन्ड उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं हो पाए।
इसी कारण उन्होंने 16 मार्च 2026 को जिला न्यायाधीश के समक्ष आवेदन देकर सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त हटाने का अनुरोध किया।
उनका कहना था कि यह शर्त उनके लिए आर्थिक रूप से अत्यधिक कठिन है और मामले की परिस्थितियों में इसकी आवश्यकता भी नहीं है।
लेकिन जिला न्यायाधीश ने 16 मार्च 2026 को उनका आवेदन खारिज कर दिया।
इसके बाद दोनों भाइयों ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की और 24 जनवरी 2025 के आदेश में लगाई गई सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त हटाने तथा 16 मार्च 2026 के आदेश को रद्द करने की मांग की।
इंडेम्निटी बॉन्ड देने की पेशकश
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के समक्ष वैकल्पिक प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने कहा कि यदि अदालत पूरी तरह सिक्योरिटी की व्यवस्था समाप्त करना उचित नहीं समझती है तो वे ₹2.25 करोड़ का इंडेम्निटी बॉन्ड देने के लिए तैयार हैं।
इसके अलावा वे जिला न्यायाधीश द्वारा पहले से निर्देशित लिखित अंडरटेकिंग यानी कमिटमेंट बॉन्ड भी प्रस्तुत करने को तैयार हैं।
इस तरह याचिकाकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि वे भविष्य में किसी वैध दावेदार के सामने आने की स्थिति में न्यायालय के निर्देशों का पालन करने के लिए सुरक्षा देने को तैयार हैं, लेकिन इतनी बड़ी राशि का सिक्योरिटी बॉन्ड प्रस्तुत करना उनके लिए संभव नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला
याचिकाकर्ताओं की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट के Rajesh Kumar Sharma & Ors. Vs. Estate of Late Raj Pal Sharma & Ors. मामले का हवाला दिया गया।
इस फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने धारा 375 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए कहा था कि सिक्योरिटी प्रस्तुत करना न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है।
उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाला व्यक्ति सिक्योरिटी देने से छूट की मांग भी कर सकता है।
इसके अलावा Arvind Nanda Vs. State, 2020 SCC OnLine Del 2922 के फैसले का भी हवाला दिया गया। उसमें दिल्ली हाईकोर्ट ने विभिन्न पूर्व निर्णयों पर विचार करते हुए कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए थे।
इन सिद्धांतों के अनुसार—
इंडेम्निटी या सिक्योरिटी की शर्त लगाना न्यायालय के विवेक पर निर्भर है। यदि न्यायालय को लगता है कि मृतक के कर्ज या संभावित अन्य दावेदारों के कारण सुरक्षा आवश्यक है तो शर्त लगाई जा सकती है।
प्रत्येक उत्तराधिकार प्रमाण पत्र मामले में यांत्रिक तरीके से सिक्योरिटी या जमानत मांगना आवश्यक नहीं है।
यदि कोई पक्ष सिक्योरिटी से छूट मांगता है तो न्यायालय को मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए। सिक्योरिटी की शर्त लगाना अनिवार्य नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के Smt. Alka Singhania Vs. Smt. Shilpi Agarwal मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें परिस्थितियों के आधार पर सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त हटा दी गई थी।
एमआरएफ का पक्ष
इस मामले में प्रतिवादी MRF Limited की ओर से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी किए जाने की कार्यवाही का कोई विरोध नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में विशेष रूप से दर्ज किया कि MRF Limited की ओर से याचिकाकर्ताओं के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी किए जाने की कार्यवाही पर कोई आपत्ति या विरोध नहीं किया गया।
साथ ही, जिला न्यायाधीश के 24 जनवरी 2025 के उस आदेश को, जहां तक याचिकाकर्ताओं के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने का संबंध था, आगे चुनौती नहीं दी गई थी और वह हिस्सा अंतिम रूप ले चुका था।
इसलिए हाईकोर्ट के सामने विवाद का दायरा भी सीमित था। अदालत को यह तय करना था कि केवल ₹2.25 करोड़ की सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त बरकरार रखी जाए या उसे हटाया जाए।
आदेश में प्रतिवादी की ओर से इस मुद्दे पर कोई अलग विस्तृत विरोधी दलील दर्ज नहीं है। इसलिए MRF के पक्ष से कोई ऐसी अतिरिक्त आपत्ति या तथ्य नहीं जोड़ा जा सकता, जो आदेश में दर्ज नहीं है।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
जस्टिस सुदेश बंसल ने मामले के तथ्यों और कानून पर विस्तार से सुनवाई के बाद पाया कि याचिकाकर्ताओं के पिता का निधन वर्ष 2016 में हो चुका था और मामले में उनके दावे के विरुद्ध कोई प्रतिद्वंद्वी दावेदार सामने नहीं आया।
जिला न्यायाधीश ने साक्ष्य दर्ज करने के बाद स्वयं यह पाया था कि दोनों याचिकाकर्ता मृतक के जीवित प्राकृतिक उत्तराधिकारी और पुत्र हैं तथा वे मृतक के नाम दर्ज शेयरों का मूल्य प्राप्त करने के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के हकदार हैं।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से यह देखा कि 24 जनवरी 2025 के आदेश में सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त लगाने का कोई कारण नहीं बताया गया था।
अदालत ने कहा कि जिला न्यायाधीश ने एक ओर लिखित अंडरटेकिंग यानी कमिटमेंट बॉन्ड मांगा और दूसरी ओर उसी के साथ ₹2.25 करोड़ की सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त लगा दी, लेकिन यह नहीं बताया कि अतिरिक्त सिक्योरिटी की आवश्यकता क्यों महसूस हुई।
कारण दर्ज करने चाहिए थे
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 375 के तहत जिला न्यायाधीश के पास विवेकाधीन शक्ति जरूर है, लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल करते समय उचित कारण दर्ज करना आवश्यक है।
जस्टिस सुदेश बंसल ने कहा कि जब किसी आवेदक को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र देने के लिए सिक्योरिटी बॉन्ड प्रस्तुत करने की शर्त लगाई जाती है तो न्यायालय को कम से कम कुछ औचित्य या कारण दर्ज करने चाहिए कि संबंधित मामले में ऐसी सुरक्षा क्यों जरूरी है।
कारण दर्ज नहीं, सिक्योरिटी ‘अनुचित’
अदालत ने यह भी नोट किया कि जब याचिकाकर्ताओं ने 16 मार्च 2026 को सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त हटाने का आवेदन दिया, तब उसे खारिज करते समय भी जिला न्यायाधीश ने कोई स्वीकार्य या उचित कारण नहीं बताया।
हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा तथ्यों में ₹2.25 करोड़ की सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त अनुचित और अत्यधिक कठोर है।
अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले और बाद के दिल्ली तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णयों में व्यक्त कानून के सिद्धांतों से सहमति जताई।
जस्टिस बंसल ने माना कि धारा 375 के तहत विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए जिला न्यायाधीश को सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त लगाने के पीछे कारण दर्ज करना चाहिए था। इस मामले में ऐसा नहीं किया गया।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने ₹2.25 करोड़ की सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त तय करने के जिला न्यायाधीश के 16 मार्च 2026 के आदेश को रद्द कर दिया।
हालांकि, चूंकि याचिकाकर्ता स्वयं ₹2.25 करोड़ का इंडेम्निटी बॉन्ड देने के लिए तैयार थे, इसलिए अदालत ने उसी को पर्याप्त सुरक्षा के रूप में स्वीकार किया।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को ₹2.25 करोड़ का सिक्योरिटी बॉन्ड प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होगी। दोनों याचिकाकर्ता संयुक्त रूप से ₹2.25 करोड़ का इंडेम्निटी बॉन्ड प्रस्तुत करेंगे।
दोनों याचिकाकर्ताओं को जिला न्यायाधीश के 24 जनवरी 2025 के आदेश के अनुसार लिखित अंडरटेकिंग/कमिटमेंट बॉन्ड भी प्रस्तुत करना होगा।
इन शर्तों की पूर्ति के बाद जिला न्यायाधीश याचिकाकर्ताओं के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करेंगे।
हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ रिट याचिका स्वीकार कर ली तथा 16 मार्च 2026 के जिला न्यायाधीश के आदेश को निरस्त कर दिया।