जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने बीमा क्लेम को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी की रिट याचिका खारिज कर दी है।
साथ ही हाईकोर्ट ने कंपनी को 8 लाख 67 हजार 230 रुपए का बीमा क्लेम देने का आदेश बरकरार रखा है।
यह राशि राजस्थान ग्रामीण बैंक की शोभासर शाखा में हुई डकैती में हुए नुकसान की भरपाई के लिए दी जानी है।
हाईकोर्ट ने राशि पर 4 मार्च 2019 से 6 फीसदी ब्याज देने और 20 हजार रुपए हर्जाना अदा करने का आदेश भी बरकरार रखा है।
मामला 4 जनवरी 2019 को राजस्थान ग्रामीण बैंक की शोभासर शाखा में हुई डकैती से जुड़ा है।
बीमा कंपनी ने क्लेम का विरोध करते हुए कहा था कि बैंक ने RBI की सुरक्षा गाइडलाइन का पालन नहीं किया था।
जबिक बैंक की ओर से कहा गया कि पॉलिसी लेने से पहले ही कंपनी को बता दिया गया था कि शाखा में CCTV, अलार्म बेल और सुरक्षा गार्ड या गनमैन की व्यवस्था नहीं है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने फैसला सुनातु हुए कहा कि बीमा कंपनी को पॉलिसी जारी करने से पहले ही बैंक की सुरक्षा व्यवस्था की कमियों की जानकारी थी। इसके बावजूद कंपनी ने प्रीमियम लिया और बीमा पॉलिसी जारी की।
ऐसे में डकैती के बाद वही सुरक्षा कमियां बताकर बीमा क्लेम से इनकार नहीं किया जा सकता।
डकैती में बैंक को हुआ था आर्थिक नुकसान
राजस्थान ग्रामीण बैंक की शोभासर शाखा में 4 जनवरी 2019 को डकैती हुई थी। इसमें बैंक को 8 लाख 67 हजार 230 रुपए का नुकसान हुआ।
बैंक ने इस नुकसान की भरपाई के लिए यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी से बीमा क्लेम मांगा। लेकिन बीमा कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम देने से इनकार कर दिया कि बैंक में जरूरी सुरक्षा इंतजाम नहीं थे।
कंपनी ने कहा कि शाखा में CCTV कैमरे और सुरक्षा गार्ड या गनमैन नहीं थे और RBI की सुरक्षा गाइडलाइन का पालन नहीं किया गया था।
इसके बाद बैंक ने चूरू की स्थाई लोक अदालत में मामला उठाया। लोक अदालत ने बीमा कंपनी को नुकसान की राशि देने का आदेश दिया।
बीमा कंपनी इसी आदेश के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट पहुंची थी।
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कंपनी को पहले से पता थी बैंक की सुरक्षा व्यवस्था
बीमा कंपनी की ओर से हाईकोर्ट में कहा गया कि बैंक परिसर के अंदर और बाहर CCTV कैमरे नहीं लगाए गए थे। इसके अलावा बैंक में कोई सुरक्षा गार्ड भी तैनात नहीं था।
कंपनी का तर्क था कि आरबीआई की सुरक्षा गाइडलाइन का पालन नहीं होने के कारण बैंक ने खुद अपनी सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर रखा।
ऐसे में चोरी, डकैती या किसी अन्य घटना से हुए नुकसान के लिए बीमा कंपनी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
वहीं बैंक के मुताबिक बीमा पॉलिसी लेने से पहले बैंक ने प्रस्तावना प्रपत्र में अपनी सुरक्षा व्यवस्था की पूरी जानकारी दी थी।
इसमें साफ बताया गया था कि बैंक की शाखाओं में CCTV कैमरे और अलार्म बेल नहीं हैं। बैंक ने यह भी बताया था कि शाखाओं में गनमैन या सुरक्षा गार्ड तैनात नहीं है।
यानी पॉलिसी जारी करने से पहले ही बीमा कंपनी के सामने बैंक की सुरक्षा व्यवस्था की पूरी जानकारी थी।
इसके बावजूद बीमा कंपनी ने बैंक से प्रीमियम लिया और पॉलिसी जारी कर दी।
इसके बाद 4 जनवरी 2019 को शोभासर शाखा में डकैती हुई और बैंक को आर्थिक नुकसान हुआ।
डकैती के बाद बीमा कंपनी ने किया क्लेम से इनकार
डकैती के बाद जब बैंक ने बीमा कंपनी से नुकसान की भरपाई मांगी तो कंपनी ने सुरक्षा व्यवस्था को आधार बना लिया।
बीमा कंपनी की दलील थी कि बैंक में CCTV कैमरे नहीं थे और सुरक्षा गार्ड या गनमैन भी तैनात नहीं था।
कंपनी ने कहा कि RBI की सुरक्षा गाइडलाइन का पालन नहीं होने के कारण डकैती से हुए नुकसान की जिम्मेदारी उस पर नहीं डाली जा सकती।
बीमा कंपनी ने अपनी दलील के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के कुछ पुराने फैसलों का भी हवाला दिया।
सुरक्षा में कमियों के बावजूद जारी की पॉलिसी
हाईकोर्ट ने मामले में बीमा कंपनी की इसी दलील को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि बैंक ने बीमा लेने से पहले ही प्रस्तावना प्रपत्र में सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी कमियों की जानकारी दे दी थी।
ऐसे में बीमा कंपनी के पास पॉलिसी जारी करने से पहले यह कहने का मौका था कि बैंक पहले जरूरी सुरक्षा इंतजाम पूरे करे।
अगर कंपनी को CCTV, अलार्म बेल या सुरक्षा गार्ड की मौजूदगी जरूरी लगती थी तो वह पॉलिसी जारी करने से पहले बैंक से इन शर्तों को पूरा करने के लिए कह सकती थी।
लेकिन कंपनी ने ऐसा नहीं किया। उसने जानकारी मिलने के बाद प्रीमियम लिया और पॉलिसी जारी कर दी।
हाईकोर्ट ने इसी बिंदु को अहम माना। कोर्ट ने कहा कि पॉलिसी जारी करने के बाद बीमा कंपनी अब अलग रुख नहीं अपना सकती।
अगर कंपनी को लगता था कि आरबीआई की सुरक्षा गाइडलाइन का पालन जरूरी है तो पॉलिसी जारी करने से पहले बैंक को जरूरी सुरक्षा इंतजाम पूरे करने के लिए कहा जा सकता था।
प्रीमियम लेने के बाद क्लेम से नहीं बच सकती कंपनी
विवाद मुख्य रूप से इस बात पर था कि क्या सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी आरबीआई की गाइडलाइन का पालन नहीं होने के कारण बीमा कंपनी भुगतान से बच सकती है।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर कहा कि इस मामले में बैंक ने पॉलिसी लेने से पहले ही अपनी सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति कंपनी के सामने रख दी थी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कंपनी के पास पॉलिसी जारी करने से पहले बैंक को यह कहने का विकल्प था कि RBI की सुरक्षा गाइडलाइन के मुताबिक जरूरी इंतजाम किए जाएं। लेकिन कंपनी ने उस समय पॉलिसी जारी करने से इनकार नहीं किया।
बीमा कंपनी ने बैंक की सुरक्षा व्यवस्था की कमियों की जानकारी होने के बावजूद पॉलिसी जारी की थी। ऐसे में डकैती के बाद उन्हीं कमियों को आधार बनाकर बैंक का क्लेम रोकना सही नहीं है।
हाई कोर्ट ने ‘प्रॉमिसरी एस्टॉपल’ का भी जिक्र किया
हाईकोर्ट ने इस मामले में ‘प्रॉमिसरी एस्टॉपल’ के सिद्धांत का भी जिक्र किया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी ने बैंक की ओर से दी गई सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी देखने के बाद प्रीमियम स्वीकार किया और पॉलिसी जारी की।
ऐसे में बाद में नुकसान होने पर वह उसी जानकारी के आधार पर अपना रुख नहीं बदल सकती।
आसान भाषा में कहें तो कंपनी को पहले से पता था कि बैंक में CCTV, अलार्म बेल और सुरक्षा गार्ड की व्यवस्था नहीं है। इसके बावजूद उसने बीमा पॉलिसी जारी की।
इसलिए डकैती के बाद इन कमियों को आधार बनाकर बीमा क्लेम से बचने की कोशिश नहीं की जा सकती।
स्थाई लोक अदालत का फैसला बरकरार
बैंक ने बीमा कंपनी से नुकसान की भरपाई नहीं मिलने के बाद चूरू की स्थाई लोक अदालत का रुख किया था।
स्थाई लोक अदालत ने बैंक के पक्ष में फैसला देते हुए बीमा कंपनी को 8 लाख 67 हजार 230 रुपए की नुकसान राशि देने का निर्देश दिया था।
बीमा कंपनी इसी फैसले को चुनौती देकर राजस्थान हाईकोर्ट पहुंची थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि स्थाई लोक अदालत ने पूरे मामले और उपलब्ध रिकॉर्ड को देखते हुए उचित और कारणों वाला आदेश दिया है। इसलिए उसमें हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है।
बीमा कंपनी की याचिका खारिज
हाईकोर्ट ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी की रिट याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही चूरू की स्थाई लोक अदालत का फैसला भी बरकरार रहा।
अब बीमा कंपनी को ग्रामीण बैंक को 8 लाख 67 हजार 230 रुपए का भुगतान करना होगा।
इस राशि पर 4 मार्च 2019 से 6 फीसदी ब्याज और 20 हजार रुपए हर्जाना देने का आदेश भी कायम रहेगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी पॉलिसी जारी करने से पहले सुरक्षा व्यवस्था को लेकर आपत्ति कर सकती थी।
लेकिन कमियों की जानकारी होने के बावजूद प्रीमियम लेकर पॉलिसी जारी करने के बाद उन्हीं कमियों को क्लेम रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
