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अवैध खनन के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला- खनिज ढोने वाले वाहन नहीं छूटेंगे आसानी से, NGT की क्षतिपूर्ति समेत खनिज कीमत व कंपाउंडिंग फीस जमा करना जरूरी

Rajasthan HC Rejects 72 Pleas on Release of Vehicles Seized in Illegal Mining Cases

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जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने अवैध खनन से जुड़े मामलों में जब्त वाहनों को छोड़ने की मांग पर बड़ा फैसला दिया है। अवैध खनन और खनिजों के अवैध परिवहन के मामलों में अब केवल जमानत या सुपुर्दगी पर वाहन छुड़ाना पर्याप्त नहीं होगा।

ऐसे मामलों में वाहन की रिहाई के लिए खनिज की कीमत, कंपाउंडिंग फीस और एनजीटी द्वारा निर्धारित पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति राशि जमा करना जरूरी होगा।

राजस्थान में अवैध खनन और खनिज परिवहन पर सख्ती बढ़ाते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस अवैध गतिविधि में इस्तेमाल होने वाले वाहनों और मशीनों की रिहाई केवल सामान्य कानूनी प्रक्रिया के आधार पर नहीं की जा सकती। पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई और अवैध खनन से जुड़े आर्थिक लाभ को समाप्त करना भी कार्रवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हाईकोर्ट ने एक साथ 72 याचिकाएं खारिज करते हुए साफ कर दिया कि कुर्की की कार्रवाई शुरू होने के बाद जब्त वाहन को केवल निजी मुचलके या सुपुर्दगी के आधार पर वापस नहीं दिया जा सकता।

आदेश के अनुसार, अवैध खनन या बिना वैध अनुमति खनिज परिवहन में पकड़े गए वाहन को छोड़ने से पहले संबंधित व्यक्ति को खनिज की कीमत, निर्धारित कंपाउंडिंग फीस और NGT के आदेशों के तहत पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति अथवा जुर्माना जमा करना होगा।

वाहन छोड़ने के लिए नियमों के तहत तय आर्थिक शर्तों को पूरा करना होगा।

जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू ने कहा कि सिर्फ यह वजह पर्याप्त नहीं है कि वाहन से जुड़ा आपराधिक मामला अभी कोर्ट में लंबित है।

अपराध का मुकदमा अपनी जगह चलेगा और जब्त वाहन से जुड़ी कुर्की की कार्रवाई अपने नियमों के तहत आगे बढ़ सकती है।

यानी अवैध खनन में पकड़े गए वाहन को सिर्फ यह कहकर नहीं छुड़ाया जा सकेगा कि आपराधिक मामला अभी चल रहा है।

अगर कुर्की की कार्रवाई शुरू हो चुकी है तो वाहन की रिहाई के लिए कानून के मुताबिक तय रकम और दूसरी जरूरी शर्तें पूरी करनी होंगी।

जब्त वाहन छोड़ने से हाईकोर्ट का इनकार

मामला राजस्थान के अलग-अलग जिलों में अवैध खनन और खनिजों के अवैध परिवहन से जुड़े मामलों का है।

इन मामलों में पुलिस या खनन विभाग ने वाहन जब्त किए थे।

कई मामलों में वाहनों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के साथ-साथ राजस्थान लघु खनिज रियायत नियमों के तहत कुर्की की कार्रवाई भी शुरू की गई थी।

वाहन मालिकों ने निचली अदालतों में आवेदन देकर जब्त वाहन छोड़ने की मांग की थी।

उनका कहना था कि वाहन को निजी सुरक्षा, जमानत या सुपुर्दगी के आधार पर छोड़ा जा सकता है और खनन विभाग की रकम जमा करना वाहन की रिहाई के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता।

कई मामलों में निचली अदालतों ने वाहन छोड़ने की मांग वाली अर्जियां खारिज कर दी थीं।

इसके बाद वाहन मालिकों ने इन आदेशों को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने सभी मामलों को एक साथ सुनते हुए जब्त वाहनों की रिहाई को लेकर कानून की स्थिति साफ की।

निजी मुचलके पर वाहन छोड़ने की दलील ठुकराई

वाहन मालिकों की ओर से दलील दी गई कि जब आपराधिक केस अभी खत्म नहीं हुआ है तो वाहन को लंबे समय तक रोककर नहीं रखा जाना चाहिए।

यह भी कहा गया कि कुछ मामलों में कुर्की की प्रक्रिया पूरी तरह शुरू नहीं हुई थी। ऐसे में निजी मुचलका लेकर वाहन वापस किया जा सकता है।

दलील यह भी थी कि नियमों में अपराध का समझौता करने की व्यवस्था है। इसलिए वाहन की रिहाई के लिए हर मामले में पूरी रकम पहले जमा कराना जरूरी नहीं होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक केस और वाहन की कुर्की दो अलग प्रक्रियाएं हैं। एक प्रक्रिया के लंबित होने से दूसरी प्रक्रिया खत्म नहीं हो जाती।

कुर्की शुरू होने के बाद नियम और सख्त

हाईकोर्ट ने राजस्थान लघु खनिज रियायत नियम, 2017 के तहत वाहन जब्ती और कुर्की की प्रक्रिया को देखा।

नियमों के मुताबिक अवैध खनन या खनिजों के अवैध परिवहन में वाहन पकड़े जाने के बाद खनिज की कीमत और दूसरी देनदारियों का निर्धारण किया जा सकता है।

वाहन मालिक को नियमों के तहत रकम जमा कर वाहन छुड़ाने का रास्ता दिया जाता है।

लेकिन अगर मामला आगे बढ़कर कुर्की की कार्रवाई तक पहुंच गया है तो केवल निजी मुचलका देकर वाहन वापस लेने का रास्ता नहीं रहेगा।
यही अंतर हाईकोर्ट के इस फैसले में अहम है।

हाईकोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का जिक्र किया

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर अपने पहले के कई फैसलों को भी देखा।

हाईकोर्ट ने साफ किया कि अगर किसी वाहन के खिलाफ कुर्की की कार्रवाई शुरू हो चुकी है तो उसे सिर्फ निजी मुचलके या सुपुर्दगी के आधार पर नहीं छोड़ा जा सकता।

वहीं, अगर अभी कुर्की की कार्रवाई शुरू नहीं हुई है तो संबंधित कोर्ट वाहन छोड़ते समय बैंक गारंटी जैसी शर्त लगा सकती है। इससे बाद में तय होने वाली रकम की वसूली सुनिश्चित की जा सकेगी।

हाईकोर्ट ने जितेंद्र मीणा, किशोर सिंह, नारायण गाडरी, चैनाराम और गिरिराज मीणा से जुड़े अपने पुराने फैसलों का भी हवाला दिया।

इन फैसलों में भी साफ किया गया था कि कुर्की शुरू होने के बाद वाहन की रिहाई को खनिज की कीमत, जुर्माने और दूसरी देनदारियों से अलग नहीं किया जा सकता।

अवैध खनन पर SC के आदेश का भी हवाला

हाईकोर्ट ने अवैध खनन के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखा।

हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का हवाला दिया।

इसमें अवैध खनन को रोकने के लिए सख्त कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि अवैध खनन में इस्तेमाल होने वाले वाहनों को मामूली शर्तों पर वापस छोड़ दिया गया तो इससे ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने का मकसद कमजोर हो सकता है।

कोर्ट ने यह भी देखा कि कुछ मामलों में वाहन पहले भी अवैध खनन या खनिजों के अवैध परिवहन में पकड़े जा चुके थे।

ऐसे मामलों में राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेशों के तहत वाहन की कीमत के 50 प्रतिशत तक जुर्माना लगाने की स्थिति भी सामने आई थी।

पुलिस की जब्ती हो या खनन विभाग की कार्रवाई

इन मामलों में सभी वाहन एक ही एजेंसी ने जब्त नहीं किए थे।

कुछ मामलों में पुलिस ने वाहन पकड़े थे। कुछ में खनन विभाग ने कार्रवाई की थी। केस रिकॉर्ड में मोटर वाहन कानून के तहत हुई जब्ती से जुड़े मामले भी हैं।

कई मामलों में अवैध खनन और खनिजों के परिवहन को लेकर आपराधिक केस भी दर्ज थे।

लेकिन हाईकोर्ट ने साफ किया कि एफआईआर या आपराधिक केस की मौजूदगी से वाहन की कुर्की से जुड़ी कार्रवाई अपने आप खत्म नहीं होती।

यानी वाहन किसने पकड़ा, इससे यह नहीं बदलता कि आगे की कार्रवाई संबंधित खनन नियमों के तहत होगी।

राशि और मुआवजे की शर्त से बचना आसान नहीं

हाईकोर्ट ने माना कि वाहन की रिहाई केवल आपराधिक केस के आधार पर तय नहीं की जा सकती।

मामले की परिस्थितियों के अनुसार खनिज की कीमत, नियमों के तहत तय रकम और राष्ट्रीय हरित अधिकरण की ओर से तय मुआवजे जैसी देनदारियां भी सामने आ सकती हैं।

अगर वाहन मालिक आपराधिक केस को चुनौती देना चाहता है तो वह उसका कानूनी अधिकार है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जब्त वाहन को सभी आर्थिक शर्तों से मुक्त करके वापस कर दिया जाए।

कोर्ट ने इसी वजह से उन निचली अदालतों के आदेशों में दखल नहीं दिया, जिनमें जरूरी राशि पूरी किए बिना वाहन छोड़ने से इनकार किया गया था।

72 याचिकाओं पर एक साथ फैसला

हाईकोर्ट ने इस कॉमन जजमेंट के जरिए कुल 72 याचिकाओं का निपटारा किया।

इनमें अलग-अलग जिलों और अलग-अलग वाहनों से जुड़े मामले शामिल थे। केस रिकॉर्ड में जोधपुर, नागौर, भीलवाड़ा, बालोतरा, बांसवाड़ा समेत कई जगहों से जुड़े मामलों का विवरण है।

कोर्ट ने सभी याचिकाओं में उठाए गए मुख्य सवाल पर विचार करने के बाद राहत देने से इनकार कर दिया।

निचली अदालतों के वे आदेश बरकरार रहे जिनमें वैधानिक आर्थिक शर्तें पूरी नहीं होने के कारण वाहनों को छोड़ने से मना किया गया था।

आपराधिक केस फिर भी चलता रहेगा

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी साफ किया कि याचिकाएं खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित आपराधिक मामले खत्म हो गए।

जिन मामलों में आपराधिक कार्यवाही लंबित है, वह अपने कानून के मुताबिक जारी रहेगी।

इसी तरह कुर्की की कार्रवाई भी संबंधित नियमों के तहत आगे बढ़ सकती है।

यानी हाईकोर्ट ने सिर्फ वाहनों की रिहाई से जुड़ी मांग पर फैसला दिया है। इससे मूल आपराधिक मामले के नतीजे पर कोई फैसला नहीं हुआ है।

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