जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर सेंट्रल जेल में न्यायिक अभिरक्षा के दौरान बंदी रूपाराम की मौत के मामले में राज्य सरकार को 25 लाख रुपए मुआवजा देने के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि जेल में हुई इस मौत को फिलहाल सामान्य या आत्महत्या का मामला मानकर बंद नहीं किया जा सकता। शरीर पर मिली चोटों और मौत से पहले की परिस्थितियों का जवाब अभी स्पष्ट नहीं है।
हाईकोर्ट ने डीजीपी को आदेश की प्रति मिलने के 48 घंटे के अंदर संबंधित थाने में एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं।
साथ ही जांच ऐसे पुलिस अधिकारी से कराने को कहा है जो आरपीएस स्तर से कम का न हो।
जस्टिस फरजंद अली ने मृतक रूपाराम की पत्नी लीला की याचिका पर यह आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि मौत हत्या थी या नहीं और इसके लिए कौन जिम्मेदार है, यह अभी तय नहीं किया जा रहा है। इसका फैसला आपराधिक जांच में होगा।
जेल में तबीयत बिगड़ी, अस्पताल में मृत घोषित
मामला 2 जुलाई 2025 का है। करीब 41 वर्षीय रूपाराम जोधपुर सेंट्रल जेल में न्यायिक हिरासत में बंद थे।
जेल में तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें महात्मा गांधी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
इसके बाद पोस्टमार्टम और मेडिकल जांच में उनके शरीर पर सात एंटीमॉर्टम चोटें मिलीं।
इनमें चेहरे के दाहिने हिस्से पर दो कटे हुए घाव, सिर पर चोट और गर्दन की मांसपेशियों में खून जमा होने की बात सामने आई।
मेडिकल बोर्ड के मुताबिक ये चोटें मौत से करीब छह घंटे के अंदर लगी थीं। बोर्ड ने मौत को सिर और गर्दन पर लगी चोटों के संयुक्त असर से जोड़ा।
वहीं हिस्टोपैथोलॉजी जांच में ऐसा कोई गंभीर कोरोनरी ब्लॉकेज नहीं मिला, जिससे हार्ट अटैक को मौत का साफ कारण माना जा सके।
रूपाराम की पत्नी लीला देवी ने मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया। उनकी ओर से अधिवक्ता अभिषेक अखावत ने पैरवी की।
याचिका में परिवार की ओर से मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की गई थी।
इसके लिए एसआईटी या सीबीआई से जांच कराने और परिवार को मुआवजा देने की मांग भी रखी गई।
यह भी पढ़ें: तलाक के बाद भी चलेगा शादी के दौरान हुई कथित क्रूरता का केस, राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला; पति की याचिका खारिज
CCTV में दिखी इलाज में देरी
मामला हाईकोर्ट के सामने आने के बाद मौत से जुड़े रिकॉर्ड, न्यायिक जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जेल के सीसीटीवी फुटेज समेत दूसरे रिकॉर्ड देखे गए।
इनसे रूपाराम की मौत की परिस्थितियों को लेकर कई सवाल सामने आए।
हाईकोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज भी देखा। इसमें रूपाराम की हालत बिगड़ने के बाद साथी बंदी उन्हें संभालते और मदद करते दिखाई दिए। लेकिन उस समय मेडिकल मदद नहीं मिली।
रिकॉर्ड के मुताबिक जब रूपाराम को गंभीर हालत में जेल डिस्पेंसरी लाया गया, उस समय वहां कोई डॉक्टर या मेडिकल स्टाफ मौजूद नहीं था।
करीब 17 मिनट बाद मेडिकल अधिकारी वहां पहुंचे। इसके बाद रूपाराम को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उसे बचा नहीं सके।
हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया कहा कि अगर मेडिकल इमरजेंसी के समय उन्हें तुरंत और पर्याप्त इलाज मिल जाता तो उनकी जान बचने की संभावना थी।
हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि पोस्टमार्टम में रूपाराम के शरीर पर सात चोटें मिली थीं, लेकिन सीसीटीवी फुटेज से यह साफ नहीं हो सका कि ये चोटें कब और कैसे लगीं।
फुटेज में उनके चेहरे का दाहिना हिस्सा भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।
यानी सीसीटीवी से इलाज में हुई देरी तो सामने आई, लेकिन शरीर पर मिली चोटों की पूरी तस्वीर साफ नहीं हो सकी।
यही वजह है कि हाईकोर्ट ने मौत की परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच को जरूरी माना।
समय पर इलाज न मिलने पर सवाल
हाईकोर्ट ने सिर्फ रूपाराम के शरीर पर मिली चोटों को ही गंभीर नहीं माना। कोर्ट ने जेल में उनकी हालत बिगड़ने के बाद उन्हें मिली मेडिकल मदद पर भी सवाल उठाए।
रिकॉर्ड के मुताबिक जेल डिस्पेंसरी में ईसीजी मशीन मौजूद थी, लेकिन रूपाराम का ईसीजी नहीं किया गया।
उनकी हालत गंभीर होने के बावजूद उन्हें जरूरी मेडिकल मदद देने की कोशिश नहीं की गई और सीधे अस्पताल भेज दिया गया।
हाईकोर्ट ने माना कि जेल में किसी बंदी की हालत अचानक बिगड़ने पर तुरंत मेडिकल मदद मिलना जरूरी है।
ऐसे में यह भी जांचना जरूरी है कि रूपाराम को समय पर और पर्याप्त इलाज मिला था या नहीं।
मौत को सामान्य बताकर मामला खत्म नहीं होगा
हाईकोर्ट ने साफ किया कि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि रूपाराम की हत्या हुई थी।
लेकिन शरीर पर मिली चोटों और दूसरे रिकॉर्ड को देखते हुए उनकी मौत को सामान्य या आत्महत्या मानकर मामला बंद भी नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि चोटें कैसे लगीं और उनकी मौत किन परिस्थितियों में हुई, इसका जवाब जांच में सामने आना जरूरी है।
यह चोट किसी दूसरे व्यक्ति से लगी, खुद लगी या किसी दूसरी वजह से हुई, अभी यह तय नहीं हुआ है।
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि रूपाराम की मौत के लिए किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय होगी या नहीं, यह जांच से सामने आएगा।
लेकिन जेल में बंद व्यक्ति की सुरक्षा और उसकी हालत बिगड़ने पर समय पर इलाज की जिम्मेदारी राज्य की है।
यानी जांच में किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी साबित न भी हो, तब भी राज्य अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता।।
FIR में देरी पर हाईकोर्ट सख्त
रूपाराम की पत्नी की ओर से शिकायत देने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं होने पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि हिरासत में किसी व्यक्ति की मौत हो और उसके शरीर पर चोटें भी मिलें तो मामले की जांच जरूरी है।
हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक को 48 घंटे के भीतर एफआईआर दर्ज कराने और जांच आरपीएस स्तर से कम रैंक के अधिकारी को नहीं सौंपने का निर्देश दिया है।
परिवार को 25 लाख रुपए मुआवजा
साथ ही हाईकोर्ट ने रूपाराम की मौत के लिए राज्य की जिम्मेदारी को देखते हुए परिवार को 25 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है।
यह रकम उनकी पत्नी और अन्य परिजनों को 60 दिन के अंदर देनी होगी।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि मुआवजा देने का आदेश किसी अधिकारी को मौत के लिए दोषी ठहराने का फैसला नहीं है।
आपराधिक जिम्मेदारी जांच के बाद ही तय होगी।
जेल में मेडिकल सुविधा सुधारने के निर्देश
रूपाराम की मौत के मामले के साथ हाईकोर्ट ने जेल की स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी ध्यान दिया।
हाईकोर्ट ने जेल में 24 घंटे मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
मेडिकल यूनिट में जरूरी दवाएं, उपकरण और ईसीजी की सुविधा रखने को कहा गया है।
इसके अलावा सीसीटीवी निगरानी बढ़ाने, पर्याप्त शौचालय और पीने के पानी की व्यवस्था सुधारने के निर्देश भी दिए गए हैं।
हाईकोर्ट ने जेल में पर्याप्त मेडिकल स्टाफ की व्यवस्था को लेकर मुख्य सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग और गृह विभाग के अधिकारियों को मिलकर फैसला लेने को कहा है।
60 दिन बाद कोर्ट देखेगा रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने जेल और स्वास्थ्य विभाग को अपने निर्देशों पर हुई कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने का भी आदेश दिया है।
60 दिन बाद दोनों विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को अनुपालन रिपोर्ट के साथ हाईकोर्ट के सामने उपस्थित होना होगा।
यानी सिर्फ आदेश जारी होने के बाद मामला खत्म नहीं होगा।
हाईकोर्ट यह भी देखेगा कि उसके निर्देशों पर वास्तव में क्या कार्रवाई की गई और जेल की व्यवस्थाओं में कितना सुधार हुआ।
मामले को आगे की सुनवाई और आदेश के पालन की समीक्षा के लिए 30 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध किया गया है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने रूपाराम की मौत को हत्या नहीं माना है।
हाईकोर्ट ने सिर्फ इतना साफ किया है कि शरीर पर मिली चोटों और इलाज से जुड़े सवालों के रहते इसे सामान्य मौत मानकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता।
अब एफआईआर और जांच से मौत की असली परिस्थितियां सामने आएंगी।
FIR से खुलेगा मौत का राज
अब मामले का सबसे अहम हिस्सा रूपाराम की मौत की स्वतंत्र जांच है।
हाईकोर्ट ने संबंधित थाने में 48 घंटे के भीतर एफआईआर दर्ज करने और जांच आरपीएस स्तर से कम रैंक के अधिकारी को नहीं सौंपने का निर्देश दिया है।
यानी परिवार को 25 लाख रुपए का मुआवजा देने के साथ कोर्ट ने मौत की परिस्थितियों की जांच का रास्ता भी खोल दिया है।
अब जांच में यह सामने आएगा कि रूपाराम को चोटें कैसे लगीं, उन्हें समय पर इलाज क्यों नहीं मिला और उनकी मौत की असली वजह क्या थी।
जेल व्यवस्था को लेकर दिए गए निर्देशों का मकसद भी यही है कि हिरासत में बंद लोगों को समय पर इलाज, सुरक्षा और जरूरी सुविधाएं मिल सकें।